Friday, 24 December 2021

समानता के बिना आजादी निरर्थक है,अधूरी है,बेकार है-श्री मनोज सिन्हा


इन दिनों जम्बू कश्मीर के महामहिम उपराज्यपाल श्री मनोज सिन्हा अपने गृहजनपद गाजीपुर( लहुरी काशी )में तीन दिन के प्रवास पर हैं।24 दिसम्बर को उन्होंने उत्थान फाउंडेशन द्वारा आयोजित "विकसित वैभवशाली भारत निर्माण में समाज के अंतिम व्यक्ति की अनिवार्य सहभागिता"विषयक संगोष्ठी को सम्बोधित किया तथा 25 दिसम्बर को जखनियां में एक विद्यालय के वार्षिकोत्सव में भाग लेने के उपरांत सिद्धपीठ हथियाराम मठ पर मां वृद्धम्बिका का दर्शन पूजन करेंगे।इसके पश्चात मठ के महन्थ और जूना अखाड़ा के वरिष्ठ महामंडलेश्वर स्वामी भवानीनन्दन यति महाराज का आशीर्वाद प्राप्त करके दिल्ली के लिए प्रस्थान करेंगे।मोहनपुरवा से महामहिम बनने की उनकी यात्रा अत्यंत संघर्षो भरी रही है।जिले से लेकर राष्ट्रीय राजनीति तक का तेवर और कलेवर तो बदला लेकिन एक चीज में कोई परिवर्तन नहीं हुआ,और वह है श्री मनोज सिन्हा की राजनीतिक प्रतिबद्धता।गृह जनपद हो,दिल्ली हो या जम्बू कश्मीर ऐसा प्रतीत होता है कि मानस के रचयिता सन्त कवि तुलसीदास की यह उक्ति  "निसिचर हीन करहुँ महि भुज उठाय प्रण कीन्ह" श्री सिन्हा के राजनीतिक जीवन का ध्येय बन गया है।जिले का प्रतिनिधित्व करते हुए उन्होंने राजनीति को अपराधियों के चंगुल से मुक्त कराने की दिशा में न्यायालय और जनता के न्यायालय दोनों जगह निर्भीक तरीके से निरन्तर प्रयास किया जिसके परिणामस्वरूप अब गाजीपुर का वातावरण बदलने लगा है।2018 में जिस विश्वामित्र मेडिकल कालेज की आधारशिला रखी गई थी अब उसका लोकार्पण हो चुका है।गाजीपुर से पटना ग्रीन फील्ड एक्सप्रेस वे बनाने का काम शुरू हो चुका है।ये बड़े बदलाव के कुछ उदाहरण हैं।उनके चरित्रबल,आत्मविश्वास, रचनाधर्मिता का संज्ञान लेकर केंद्रीय नेतृत्व ने उन्हें 2020 में गुरूतर दायित्व सौंपा जिसे स्वीकार करते हुए वे स्वयं को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकास यज्ञ में गाजीपुर का सिपाही बताते हुए पूरी निष्ठा और क्षमता से अहर्निश लगे हुए हैं।उत्थान फाउंडेशन में संगोष्ठी को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा की वे देश में जहां भी होते हैं गाजीपुर का गर्जन हैं।उनके अंदर जो चिन्गारी निरन्तर जलती है,वास्तव में वह गाजीपुर की है।मेरे लिए इससे बड़ा कोई परिचय नहीं है कि मैं आपका अपना हूँ और चालीस लाख के परिवार का एक सदस्य हूँ।निष्ठा, प्रेम,साहस,विनम्रता,और सहिष्णुता गाजीपुर की मिट्टी के साथ मेरे शरीर में इस तरह चिपकी है कि तमाम कठिनाइयों के बावजूद मेरा कदम एक पल भी कहीं डगमगाया नहीं।वर्ष 2014 में जनता के कारण एक बड़ा परिवर्तन देश में हुआ।ऐसा लगता है कि यह परिवर्तन देश के गरीबों के कारण हुआ।समानता के बिना आजादी निरर्थक है,अधूरी है,बेकार है।सामाजिक न्याय और आर्थिक न्याय के बिना समानता का कोई अर्थ नहीं है।डॉ. लोहिया को उधृत करते हुए वे अपने सम्बोधन में कहते हैं कि सांप को छेड़ना नहीं चाहिए और छेड़ दिया तो छोड़ना नहीं चाहिए।इस देश में चंद लोगों ने जरूरी मुद्दों को छेड़ा तो लेकिन छोड़ भी दिया।विकास की कतार में खड़े आखिरी व्यक्ति तक पहुंचने की सिर्फ नारेबाजी हुई।अपने वक्तव्य के अंत में याददाश्त को कमजोर बताते हुए आगाह करना नहीं भूले कि लक्ष्य बड़ा होने पर समाज को छोटे छोटे स्वार्थों की तिलांजलि देना सीखना होगा अन्यथा पीढ़ियों को दुष्परिणाम भुगतना पड़ेगा। आज जन आकांक्षाओं पर खरा उतरने की कोशिश करते हुए श्री सिन्हा आतंकवाद की समाप्ति के लिए पूर्णतया प्रतिबद्ध हैं और विकास की पटकथा लिखते हुए आगे बढ़ रहे हैं।जनता का विश्वास जीतना उन्हें आता है।संवाद की शक्ति को वे भलीभांति जानते हैं तथा स्थानीय लोगों से रिश्ता बनाने के क्रम में कश्मीरी भी सीख रहे हैं।आज सामान्य आदमी के लिए भी राजभवन के दरवाजे खुले हुए हैं तो इसका श्रेय श्री मनोज सिन्हा को जाता है।

डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र 

असिस्टेंट प्रोफेसर (अंग्रेजी)

पी जी कालेज भुड़कुड़ा,गाजीपुर