Saturday, 3 October 2020

का बतलाईं कहै सुनै में सरम लगत हौ गांधी जी ...



(गांधी जयंती के विशेष संदर्भ में)जन्मजयंती के अवसर पर महात्मा गांधी का केवल स्मरण पर्याप्त नहीं है।आज गांधी को उसी तरह से जीने की जरूरत है जैसे उनको आज ही के दिन पैदा हुए पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने जिया।अगर हम सचमुच गांधी से प्रेम करते हैं तो उनके बताए मार्ग पर चलने की आवश्यकता है अर्थात सरल जीवन जीने की कठिन साधना करना होगा।गांधी के सिद्धांतों की दुहाई देते हुए उसके ठीक विपरीत व्यवहार करना और निजी स्वार्थ के लिए जानबूझकर उसकी गलत व्याख्या प्रस्तुत करना समाज को छलना है।गांधी ने प्राचीन धर्मग्रन्थों का गहनता से अध्ययन किया था।श्रीमद्भगवद्गीता उनकी प्रिय पुस्तक थी जिसका वे नियमित वाचन करते थे तथा निष्काम कर्मयोग के सिद्धांत को जीवन में आत्मसात कर लिया था।उन्होंने जीवनपर्यन्त अपनी संस्कृति को जानने की कोशिश की,त्याग के महात्म को समझा और उसे जिया।सेवा का वरण किया समीकरण बैठाने में अपनी ऊर्जा का उपयोग नहीं किया बल्कि सत्य का प्रयोग किया।इसके बाद भी अगर गांधी में कोई दोष ढूंढता है तो यही कहा जायेगा कि उसके पास ज्ञानचक्षु का अभाव है।सनातन धर्म में जो चीज गलत समझ में आयी उसके परिष्करण के लिए प्रयास किया लेकिन धर्मांतरण नहीं किया।सनातन धर्म की मर्यादा का अनुपालन करते हुए गांधी अन्य धर्मावलम्बियों को सहज स्वीकार थे तथा अन्य धर्मावलम्बी  गांधी को।देश को आजाद कराने के साथ वे समाज मे व्याप्त बुराइयों को समाप्त कर स्वस्थ समाज गढ़ने के लिए प्रयासरत रहे।विस्तीर्ण चिंतन के कारण वर्णाश्रम व्यवस्था में व्याप्त दोषों का निवारण उनका लक्ष्य था मगर वे वर्णाश्रम व्यवस्था को ही समाप्त कर देना नहीं चाहते थे।दुनियां में कोई भी व्यवस्था दोषरहित नहीं है।कुछ न कुछ कमियां होती हैं।उन कमियों को चिन्हित करके दूर करने की कोशिश करना चाहिए।उन्होंने आजादी दिलाने के अलावा जीवनभर भारतीय समाज की उन कमियों को चिन्हित करने और दूर करने का काम भी किया जो भारतीय समाज के माथे का कलंक थीं।जाति विहीन समाज की बात करने वाले गांधी का नाम तो जपते हैं लेकिन प्राचीन धर्मग्रंथों का विरोध करते हैं,संस्कृत भाषा का विरोध करते हैं,शास्त्रीय परम्पराओं का विरोध करते हैं और जातीय अस्मिता के आधार पर अपनी गोलबंदी भी जारी रखते हैं।समाज के ऐसे स्वार्थी तत्वों द्वारा लोक की बात करते हुए वेद का विरोध करना पाखंड नहीं है तो और क्या है।गांधी ने पाखंड का विरोध किया स्वस्थ परम्परा का नहीं।उन्होंने जाति आधारित भेदभाव मिटाने का यत्न किया जाति व्यवस्था समाप्त करना उनका लक्ष्य नहीं था। वे लोक और वेद को साथ साथ लेकर चलते थे क्योंकि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।गांधी के अनुसार 'अस्पृश्यता की बुराई से खीझकर वर्ण-व्यवस्था का ही नाश करना उतना ही गलत होगा ,जितना कि शरीर में कोई कुरूप-वृद्धि हो जाय तो शरीर का या फसल में ज्यादा घास-पात उगा हुआ दिखे तो फसल का ही नाश कर डालना।इसलिए अस्पृश्यता का नाश तो जरूर करना है।सम्पूर्ण जाति(वर्ण)व्यवस्था को बचाना हो तो समाज में बढ़ी हुई इस हानिकारक बुराई को दूर करना ही होगा....ज्यों ही अस्पृश्यता नष्ट होगी,जाति व्यवस्था स्वयं शुद्ध हो जाएगी,..।'  उनको पारम्परिक तरीके के गांव प्रिय थे जो आत्मनिर्भर , स्वावलम्बी और स्वायत्तशासी हों।आज कोरोना की चपेट में आने पर गांवों ने ही देश को सम्हाला है।गांव की शक्ति का ,सामाजिक तानेबाने का बोध गांधी को बखूबी था।कुछ लोग उस समय भी गांव के स्वरूप को ठीक नहीं समझते थे क्योंकि एकांगी दृष्टि के कारण उन्हें गांव का सहकार और सौंदर्य नहीं दिखता था।उनका जोर शहरीकरण ,औद्योगिकरण पर था।उनका मानना था कि गांव समाप्त होंगे तो जाति अपने आप  समाप्त हो जाएगी।लेकिन अंधाधुंध शहरीकरण ने सहकार को समाप्त करके जीवन को अभिशप्त बना दिया यह भी किसी से छिपा नहीं है।शहरी जीवन में असमानता, भेदभाव भी खूब बढ़ा है।केवल जातिविहीन समाज बनाने के उद्देश्य से शहरीकरण की ओर उन्मुख होने वाला चिंतन सदैव अप्रासंगिक था।इस देश के लिए गांधी का मार्ग अपरिहार्य है।सामाजिक समरसता के लिए गांधी को अमल में लाने की आवश्यकता है।उनके अनुसार ,'इतिहास की दृष्टि से जाति प्रथा को भारतीय समाज की प्रयोगशाला में किया गया मनुष्य का ऐसा प्रयोग कहा जा सकता है,जिसका उद्देश्य समाज के विविध वर्गों का पारस्परिक अनुकूलन और संयोजन था।' जाति मिटाने की बात करने वाले  इस देश में जातियों के सम्मेलन करने लगे,संविधान में जातिगत आरक्षण का उल्लेख कहीं भी न होने के बावजूद जातिगत आरक्षण राजनीतिक स्वार्थ में बंटना शुरू हो गया और इसका नामकरण सामाजिक न्याय कर दिया गया।अपनी अपनी जाति के मतदाताओं को सहेजने का काम करने वाले सामाजिक न्याय के योद्धा हो गए।देश पीछे छूट गया।कैलाश गौतम के शब्दों में 'का बतलाईं कहै सुनै में सरम लगत हव गांधी जी/तोहरे घर क रामै मालिक सबै कहत हौ गांधी जी।' हत्या, बलात्कार, अपहरण, लूट,आगजनी, हिंसा जैसे अमानवीय कृत्य आएदिन हो रहे हैं।हाल में ही हाथरस की घटना ने समूचे देश को शर्मसार कर  दिया है।इस कठिन घड़ी में गांधी का याद आना स्वाभाविक है।मजे की बात यह भी है कि गांधी पर सबका दावा है,गांधी भी सबके हैं लेकिन गांधी का कोई नहीं ।प्रकृति के साथ जीवन जीना ही गांधी को जीना है तथा विकृति के साथ जीना मानवता के विरुद्ध जीना है,गांधी के विरुद्ध जाना है।गांधी मानवता के पुजारी थे। गांधी के जन्मदिन पर प्रकृति के साथ जीने का संकल्प कोरोना ही नहीं अन्य आपदाओं से लड़ने की शक्ति देगा तथा उनके विचारों की शक्ति बढ़ते वैमनस्य,हिंसा ,घृणा को दूर करेगी।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
असिस्टेन्ट प्रोफेसर, अंग्रेजी
श्री म. रा. दा.पी.जी.कालेज,भुड़कुड़ा,गाजीपुर

Monday, 14 September 2020

व्यापक दृष्टिकोण और तकनीक का प्रयोग हिंदी को बनाएगा विश्वव्यापी


आज हिंदी दिवस है और इसे मनाने की परिपाटी देश में 14 सितम्बर 1953 से शुरू हुई ।हिंदी के हिमायती सभा संगोष्ठियों के माध्यम से इस दिन हिंदी का गुणानुवाद करते हुए इसे वैश्विक स्तर पर स्थापित करने की चर्चा करते हैं। पिछली बार के हिंदी दिवस से इस बार का आयोजन भिन्न होगा क्योंकि इस बार सबकुछ  आभासी पटल पर होगा।वैश्विक महामारी कोरोना के कारण स्कूल,कॉलेज, रेल सब बंद हैं।कवि सम्मेलनों और संगोष्ठियों में लोगों का इस बार इकट्ठा होकर हिंदी के प्रति प्रेम और समर्थन प्रदर्शित करना सम्भव नहीं है।हिंदी के प्रसार के लिए कुछ न कुछ प्रयास निरन्तर चल रहा है लेकिन यह पर्याप्त नहीं है।इतना सब कुछ होने के बाद भी हिंदी को लेकर गम्भीर प्रयास और ठोस नीतियों की आवश्यकता है।हम आजादी के पचहत्तर साल मनाने की ओर अग्रसर हैं लेकिन राष्ट्र भाषा हिंदी को वह सम्मान नहीं दे पाए जिसकी वह अधिकारिणी है।तकनीक के प्रयोग ने हिंदी को विश्वव्यापी बनाने में अप्रतिम योगदान दिया है।इन दिनों ई पत्रिकाओं का प्रकाशन हो रहा है,वेबिनार का आयोजन हो रहा है ,फेसबुक और व्हाट्सएप द्वारा हिंदी में अभिव्यक्ति हो रही है तथा संचार माध्यमों के बल पर व्याख्यान का सजीव प्रसारण भी हो रहा है।हिंदी का प्रयोग निःसन्देह बढ़ा है लेकिन भाषा के स्तर में अत्यधिक गिरावट आई है। भाषा के प्रयोग से उसका प्रवाह बना रहता है लेकिन भाषा के मर्म को समझना अत्यंत आवश्यक है।किसी भी भाषा को पहचान और प्रतिष्ठा उस भाषा मे रचे गए साहित्य से प्राप्त होती है।हिंदी की साहित्य सम्पदा विशाल है और अभिव्यक्ति की सामर्थ अद्वितीय है।इसी कारण हिंदी ने विदेशी विद्वानों को अपनी ओर आकृष्ट किया।बेल्जियम के फादर कामिल बुल्के यहां आने के बाद हिंदी और हिंदुस्तान के हो कर रह गए।उन्होंने हिंदी के लिए जो कार्य किया वह मील का पत्थर साबित हुआ।वे 'राम कथा उतपत्ति और विकास' का चार भागों और इक्कीस अध्याय में सृजन कर अमरत्व को प्राप्त किये।भारत का हिंदी में विरचित सन्त साहित्य सदैव विदेशियों के आकर्षण का केंद्र रहा है।सुर, कबीर ,तुलसी ,मीरा ,जायसी, रसखान,रविदास, नानक, मलूक ,दादू फरीद सहित अनेक सगुण और निर्गुण धारा के कवियों ने हिंदी को ऊंचाई दी और ज्ञान भक्ति प्रेम का संदेश दिया ।आजमगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार और हिंदी सेवी श्री जगदीश प्रसाद बरनवाल ने विदेशी विद्वानों का हिंदी प्रेम शीर्षक से पुस्तक लिखी है जिसमें उन्होंने उनके अवदान को रेखांकित किया है।वर्ष 2008 में एक जर्मन युवक तिल लुगे ने शुभा मुद्गल द्वारा प्रस्तुत भजन से रीझ कर हिंदी में शोध की ठानी।अपने शोध के सिलसिले में वह गाजीपुर स्थित निर्गुनिया सन्तों की तपस्थली भुड़कुड़ा आ पहुंचा।वह युवक निर्गुनियां सन्त बूला, गुलाल और भीखा से बेहद प्रभावित था।कारण यह कि सन्त कवियों ने सही और खरी बातों को निर्भीकता के साथ समाज के सामने समय समय पर रखा है।उन्होंने बिगाड़ के डर से सत्य कहने से परहेज नहीं किया। जो लोग आज अपने को हिंदी सेवी कहते हैं उन्हें इस बात का अवश्य स्मरण रखना चाहिए कि निज भाषा के समर्थन में बोलने से अन्य भाषाभाषियों के प्रति विद्वेष ध्वनित न हो।देश के भीतर और बाहर गैर हिंदी भाषी क्षेत्र के लोगों संग आत्मीयता ,उनके साहित्य का हिंदी में रूपांतरण ,हिंदी में रचे गए साहित्य का उनकी भाषा में रूपांतरण एक दूसरे को नजदीक ले आएगा और आत्मीयता बढ़ेगी।इससे भाषाई समझ विकसित होने के साथ राष्ट्र भाषा के विकास में सहायता मिलेगी।हिंदी के बढ़ते प्रभाव का ही परिणाम है कि धोती,कुर्ता,पायजामा जैसे बहुत से शब्द अंग्रेजी भाषा में शामिल कर लिए गए हैं और स्टेशन, बैंक, प्लेटफॉर्म जैसे अंग्रेजी भाषा के शब्दों का हिन्दीकरण हो गया है।अगर हिन्दी भाषियों के व्यवहार में अन्य भाषाभाषियों के प्रति दुराग्रह,घृणा,विद्वेष का भाव ध्वनित होगा तो इससे हिंदी की स्वीकार्यता को  नुकसान होगा।एक तरफ हिंदी को वैश्विक मंच पर समृद्ध साहित्यिक विरासत के आधार पर स्थापित करने की वकालत हो रही है तो वहीं अपने ही देश में हिन्दी मानस को दो धड़ों में बांट कर एक दूसरे के खिलाफ खड़ा कर लड़ाने का प्रयास भी खूब चल रहा है।मानवीय मूल्यों से युक्त सर्वकालिक श्रेष्ठ साहित्य को आलोचना और प्रगतिशीलता के नाम पर कुंठा की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया जा रहा है।वर्तमान में सगुण साहित्य और साहित्यकारों पर दलित विरोधी,स्त्री विरोधी,साम्प्रदायिक होने का आरोप लगाकर निर्गुण साहित्य और साहित्यकारों को ढाल या मुखौटा के रूप में स्वार्थी तत्वों द्वारा अपने समर्थन में प्रयोग किया जा रहा है।कबीर ने रूढ़ियों के खिलाफ आवाज बुलंद की उसमें क्या हिन्दू और क्या मुसलमान,सब बराबर हैं उनकी दृष्टि में।लेकिन कबीर का नाम लेकर सगुण सन्त साहित्य की आलोचना करने वाले रूढ़ियों के खिलाफ न बोलकर आस्था  पर प्रहार करते दिखते हैं।जिस ग्रन्थ में 'परहित सरिस धरम नहिं भाई' का स्वर सुनाई देता हो उसे कैसे लांछित किया जा सकता है?अगर हम स्वार्थ और संकीर्णता से बाहर निकलकर सोचेंगे तो हिंदी का विकास तय है।अन्यथा प्राचीन साहित्यिक विरासत को नए लेखकों और आलोचकों द्वारा अमान्य घोषित करना हिंदी के प्रसार में बाधक बनेगा।यह तर्क बेबुनियाद है कि स्त्री स्त्री के बारे ,में दलित दलित के बारे में, हिंदी पढ़ने पढ़ाने बोलने वाला हिंदी के बारे में सटीक अभिव्यक्ति कर सकता है।ऐसी सोच रखने वाले लेखक हिंदी के साथ छल कर रहे हैं।अगर साहित्य मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति है तो इसके लिए स्त्री ,पुरुष ,दलित ,गैर दलित, हिंदी बोलने समझने वाला ,गैर हिन्दी भाषी की जगह मनुष्य होना पर्याप्त है।मुंशी प्रेमचंद का कायस्थ होना दलित सम्वेदनाओं की अभिव्यक्ति में कैसे बाधक हो सकता है भला?उनका कथा साहित्य उनकी गहन अंतर्दृष्टि और संवेदना का जीवंत उदाहरण है ।आधुनिक युग मे हरिवंशराय बच्चन और रघुवीर सहाय का नामोल्लेख करना समीचीन होगा।उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी का अध्यापन किया और हिदी की सेवा किये।डॉ. रामविलास शर्मा अंग्रेजी से एम. ए. थे और हिंदी साहित्य का सबसे प्रामाणिक इतिहास उन्होंने लिखा।अज्ञेय एक प्रगतिशील कवि और लेखक के रूप जाने जाते हैं लेकिन उन्होंने अंग्रेजी विषय मे परास्नातक की उपाधि प्राप्त की थी।उन्होंने पत्रकारिता,सम्पादन और लेखन हिंदी में किया।हिंदी को सिर्फ हिंदी पट्टी या हिंदी बोलने वालों तक सीमित करके देखना इसके विकास में बाधक तो है ही इसके साथ अन्याय भी होगा।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
असिस्टेन्ट प्रोफेसर,अंग्रेजी
श्री म. रा. दा. पी.जी.कालेज भुड़कुड़ा, गाजीपुर।

Wednesday, 26 August 2020

महामण्डलेश्वर स्वामी भवानीनन्दन यति का सिद्धपीठ हथियाराम में राधाष्टमी के दिन मनाया गया अवतरण दिवस



सिद्धपीठ हथियाराम के महन्थ ,पूज्यपाद, महामण्डलेश्वर भवानीनन्दन यति महाराज का अवतरण दिवस भादों मास के शुक्लपक्ष अष्टमी तिथि को समारोह पूर्वक मनाया जाता है।इस वर्ष कोरोना महामारी के कारण भिन्न प्रकार की परिस्थितियां हैं ।यद्यपि आपका जन्म देवभूमि उत्तराखंड में हुआ था किंतु पूर्व आश्रम में आपने वेद और व्याकरण की शिक्षा गुरुकुल पद्धति से काशी में रहकर प्राप्त की।हथियाराम मठ के तत्कालीन महन्थ स्वामी बालकृष्ण यति जी का सानिध्य और आशीर्वाद आपको प्राप्त हुआ। 26वें पीठाधीश्वर के रूप में सिद्धपीठ हथियाराम गाजीपुर की धरती पर 23 फरवरी 1996को आपका आगमन हुआ। भारतवर्ष में विभिन्न स्थानों पर ऋषियों मुनियों ने साधना की है।काशी परिक्षेत्र में स्थित यह आध्यात्मिक केंद्र भी लगभग आठ सौ वर्षों से अपनी आभा विखेर रहा है।समय समय पर यहां दिव्य आत्माओं का जगत कल्याणार्थ अभ्युदय हुआ और उन्होंने पारम्परिक तरीके से जन सामान्य के बीच जाकर  सन्मार्ग पर चलने की शिक्षा दी।हमारे यहां ऋषि शब्द अत्यधिक प्रचलित है।ऋषि वह व्यक्ति है जिसने अनुभूति से जाना हो अर्थात रियलाइजेशन या साक्षात्कार किया हो ।भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार क्या करना है और क्या नहीं करना है इसके लिए शास्त्र प्रमाण हैं 'तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ' लेकिन शास्त्र के लिए प्रमाण अनुभूति है।जिन्हें अनुभूति नहीं हुई उनको  बताने समझाने का कार्य ऋषियों ने और उनके द्वारा रचे गए शास्त्रों ने किया है।भवानीनन्दन यति जी एक सिद्ध साधक और अनुभोक्ता के रूप में धर्म संस्कृति को बचाये और बनाये रखने हेतु सतत प्रयत्नशील हैं।आप त्याग ,करुणा और श्रद्धा की त्रिवेणी हैं।आपने अथक परिश्रम से गौरवशाली परम्परा का निर्वहन करते हुए समाज को दिशा देने का यत्न किया है।उनका मानना है कि विद्वत्ता प्राप्त करने से ज्यादा महत्वपूर्ण है हम सज्जनता को अंगीकार करें।जिस कार्य को रावण शास्त्र का ज्ञाता होते हुए भी नहीं कर सका उसे शबरी ने सहज प्राप्त कर लिया।हिन्दू मान्यताओं के अनुसार आदि शंकराचार्य ने  अखाड़ों को बनाया तथा साधुओं और सन्यासियों को कुछ अखाड़ों में बांटा गया।जूना अखाड़ा सबसे बड़ा अखाड़ा है ।इस अखाड़े में सन्यासियों की संख्या चार लाख से भी ज्यादा है।स्थापना के समय अखाड़ों का मुख्य उद्देश्य देश के प्राचीन मंदिरों और धार्मिक लोगों को अन्य धर्मों के आक्रमणकारियों से बचना था।भवानीनन्दन यति जी जूना अखाड़े के वरिष्ठ महामण्डलेश्वर के रूप में राम मंदिर आंदोलन की गतिविधियों से जुड़े रहे और आजदिन भी सनातन धर्म की ध्वजा लेकर धार्मिक अनुष्ठानों द्वारा  देश के कोने कोने में भटके हुए लोगों को मानवता की राह दिखा रहे हैं।उनका अवतरण दिवस मठ के अनुयायियों के लिए एक उत्सव का दिन है।स्वामी भवानीनन्दन यति जी का आध्यात्मिक व्यक्तित्व अत्यंत प्रिय एवं विशाल है।ईश्वर एवं धर्म के प्रति रागात्मक वृत्ति बनाये रखने में इनका सानिध्य दीर्घ काल तक प्रेरणादायी बना रहे।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
असिस्टेन्ट प्रोफेसर, अंग्रेजी
श्री म. रा. दा.पी.जी.कालेज,भुड़कुड़ा, गाजीपुर


Wednesday, 12 August 2020

जम्मूकश्मीर में लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना होगी नवनियुक्त उपराज्यपाल की शीर्ष प्राथमिकता

पिछले दिनों मोदी मंत्रिमंडल के साथी रहे श्री मनोज सिन्हा को जम्मू कश्मीर का उपराज्यपाल नियुक्त किया गया।यह नियुक्ति राष्ट्रीय राजनीति की एक महत्वपूर्ण घटना है।यह एक अहम संवैधानिक दायित्व है जिसके लिए धोती कुर्ता और गमछा में साधारण से दिखने वाले असाधारण प्रतिभा सम्पन्न श्री सिन्हा को उपयुक्त समझा गया।राजनीतिक मंचों और सदन के पटल पर भाषा की शालीनता के माध्यम से अपनी जवाबदेही का एहसास कराने वाले श्री मनोज सिन्हा का व्यक्तित्व राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा के केंद्र में रहा है।भारतीय राजनेताओं को मोटे तौर पर दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है ।एक वह वर्ग जो विरासत को सम्हालते हुए राजनीति के मैदान में अपना दखल और दबदबा रखता है और अपनी राजनीतिक विरासत को आने वाली पीढ़ी को सुपुर्द करने का अभिलाषी है।दूसरा वह वर्ग है जो संघर्ष की कोख से पैदा हुआ है और राष्ट्रीय क्षितिज पर न केवल धूमकेतु की तरह दिखा और ओझल हो गया,बल्कि अपने काम की बदौलत स्वयं को हार जीत से आगे ले जाकर अपनी प्रासंगिकता बनाये हुए है।उसे अपने बच्चों को राजनीति में स्थापित करने की चिंता नहीं रहती।बेदाग छवि उसकी अपनी कमाई है।जनता से उसी की भाषा में सीधा,सहज संवाद स्थापित करना उसका राजनीतिक कौशल है।राजनीति को अपराधियों के चंगुल से मुक्त कराने का जिसका मिशन हो।कथनी और करनी में अंतर वाली राजनीतिक संस्कृति को समाप्त करने पर उसका पूरा जोर रहता हो।सीधे तौर पर कहा जाय कि राजनीति उनके लिए तिजारत नहीं सेवा का माध्यम है।इन खूबियों से युक्त कोई और नहीं वह मनोज सिन्हा ही हैं जिन्होंने अपने राजनीति की शुरुआत छात्र जीवन से की। उनके शिक्षक पिता पुत्र के  राजनीति में प्रवेश से प्रसन्न नहीं थे परन्तु नियति को कौन जानता है? छात्र संघ का पहला चुनाव हारने के बाद वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के बैनर तले वर्ष 1982 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के छात्र संघ अध्यक्ष चुने गए और यही उनके राजनीति में उतरने का प्रस्थान विंदु बना।यद्यपि आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी ने वर्ष 1996 के लोकसभा चुनाव में श्री मनोज सिन्हा को गाजीपुर से प्रत्यासी के रूप में मैदान में उतारा और वे जीत दर्ज कर पहली बार सांसद बने।1999 में दुबारा गाजीपुर लोकसभा के लिए चुने गए और अपनी विकास निधि का जनहित के लिए भरपूर प्रयोग करने के अलावा  तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी के संरक्षकत्व में राजनीति की अन्य बारीकियों के साथ दलगत सीमा से परे स्वीकार्यता का गुण सीखा।2004 का चुनाव भाजपा और श्री मनोज सिन्हा के लिए अनुकूल परिणाम नहीं दिया लिहाजा पार्टी सत्ता से बाहर हो गई।सत्ता का वनवास झेल रही भारतीय जनता पार्टी ने एक दशक बाद वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जोरदार वापसी की और मनोज जी भी गाजीपुर से चुनाव जीतकर मंत्रिमंडल में जगह बनाने में कामयाब हुए।उन्होंने भारत सरकार के संचार राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार और रेल राज्यमंत्री के रूप में पद और गोपनीयता की  शपथ लेकर विभिन्न परियोजनाओं के माध्यम से राष्ट्रीय फलक पर काम करते हुए समूचे पूर्वांचल की तस्वीर बदलने का विशेष प्रयास आरम्भ किया जिसका परिणाम जल्द ही सतह पर दिखने लगा।फलतः मनोज सिन्हा एक जननेता और विकास पुरूष के रूप में लोगों के दिलोदिमाग पर छा गए। उनके काम को देखकर धुर राजनीतिक विरोधी भी भले ही उनकी आलोचना करते हों लेकिन उनके कामों की अनदेखी नहीं कर सकते। सबका साथ सबका विकास की थीम पर काम करते हुए जिस तरह से श्री सिन्हा ने भारत सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं को ईमानदारी से जमीन पर उतारने का प्रयास किया उससे वर्ष 2019 में गाजीपुर से मिली चुनावी असफलता के बावजूद केंद्रीय नेतृत्व का विश्वास और भरोसा बरकरार रखने में वे कामयाब रहे।उपराज्यपाल के रूप में प्रशासनिक अनुभव वाले व्यक्ति का स्थानापन्न एक सुलझे राजनीतिक अनुभव वाले व्यक्ति को बनाना यह संकेत देता है कि घाटी में सामाजिक ,सांस्कृतिक और लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना की दिशा में केंद्रीय नेतृत्व बेहद गम्भीर है।अपनी कार्यशैली से श्री मनोज सिन्हा ने हमेशा अपनी उपयोगिता साबित की है और विषम परिस्थितियों में भी यह सिद्ध किया है कि चुनौतियों से निपटना उन्हें भलीभांति आता है।जब जब उनके जीवन में ठहराव की स्थिति बनी और राजनीतिक पंडितों ने उनके पारी को समाप्त माना तब तब उन्होंने सारे अनुमान को झुठलाते हुए न केवल जोरदार वापसी की बल्कि आशातीत परिणाम भी दिए।उनको नजदीक से जानने वाले मानते हैं कि वे हार मानने वाले व्यक्ति नहीं हैं।स्वाभाविक रूप से राजनीति में नई जिम्मेदारी अपने साथ नई चुनौतियां भी लेकर आती है।धारा 370 समाप्त हुए एक वर्ष का समय बीत गया है तथा समरसता का वातावरण निर्मित करने के लिए इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत के सिद्धांत को अमलीजामा पहनाने का श्री सिन्हा के पास सुनहरा अवसर है।घाटी में अमन चैन स्थापित करना श्री सिन्हा के लिए शीर्ष प्राथमिकता होगी।इस उद्देश्य की प्राप्ति लोकतांत्रिक तरीके से ही सम्भव है।अलगाववादियों के मंसूबे को नाकाम करते हुए लोकतांत्रिक  प्रक्रिया की बहाली में उनका लंबा राजनीतिक अनुभव  सहायक सिद्ध होगा।केशर की क्यारी कहा जाने वाला कश्मीर बम ,बंदूक और ख़ून ख़राबा से मुक्त होगा।लम्बे समय से भययुक्त वातावरण में अभिशप्त जीवन जी रहे कश्मीरी नागरिकों को भयमुक्त कराने का जिम्मा श्री मनोज सिन्हा का होगा जिनके सरपरस्ती में  कश्मीरी नागरिक अपनी लोकतांत्रिक शक्तियों का प्रयोग करते हुए अपने सपनों में रंग भर सकेंगे।उम्मीद यही है कि  राजनीतिक स्वार्थ के कारण दोजख हो चुकी आम कश्मीरी  की जिंदगी नए बगवां के हाथों में पुनः जन्नत बनेगी।

डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
असिस्टेन्ट प्रोफेसर, अंग्रेजी
श्री म.रा. दा. पी.जी.कॉलेज, भुड़कुड़ा,गाजीपुर


Tuesday, 11 August 2020

Lord Krishna:An Apotheosis of Love and Bliss


Wishing you all a very happy Shri Krishna Janmashtami.According to our religious belief,Lord Krishna was born in the month of Bhadrapad on Ashtami Tithi .It was a rainy season.We are well acquainted with  the story of Lord krishna and his birth in jail.He is a very popular Hindu God  all over the world and is known by several names as Madhav, Yogeshvar,Kanha, Gopala Keshav, Muralidhar, Nandlala etc.His early childhood fascinates saints, creative artists, poets and authors ,and  his heroic deeds are the source of religious faith and inspiration to his devotees.We get the glimpse of Krishna in every child.The reason is that every child is innocent and full of love.Krishna is described as a 'Navneet Chore’.His preaching to Arjuna in the battlefield of Kurukshetra shows the path and removes all the confusion of mankind.He is against renunciation and gives emphasis on 'Karama'.He is a symbol of egolessness.His personality is multidimensional because of which he is called the master of sixty- four Kalas.He is a charioteer, cowman,musician, politician , philosopher, great lover,and saviour of mankind.Krishna is the embodiment of the virtue  and Kansha is the  embodiment of vice .The conflict between vice and virtue is inseperable in this world and finally ,virtue becomes victorious.'Dharma Sansthapanarthaya' means for the establishment of religious values Gods incarnate  upon the earth in every age . May Lord Krishna shower his blessings upon us all and fulfill  our aspirations  in our life.We are the seekers of pleasure and Krishna is another name for perpetual pleasure (परमानंद).All the lovers of Lord Krishna can attain permanent pleasure in their life with a pure heart.Once again a very happy Janmashtami to each and all.

Thursday, 6 August 2020

Glory Be to Lord Rama and Mother Sita!

Greetings to all the lovers of Sanatan Dharma.Laying the foundation stone of our dream temple of Lord Rama in Ayodhya is the fulfillment of long awaited public aspirations.Finally,after a long legal, social and political struggle, the devotees of Lord Rama witnessed this historical moment.Lord Rama is the embodiment of moral, social and ethical values.His ideal character makes him the hero  of mankind.Even the atheists  have high regard for the noble and ideal character of Lord Rama.Lord Ram is the ancestor of all Indians.The rich or the poor , a prince or a beggar  are all equal to him.He is merciful, benevolent,and protector of the weakest and the smallest creatures.We recite and remember the name of Lord Rama everywhere and in every condition.The name of Rama is very effective.It can remove physical and spiritual crisis of mankind.Today,as the successor of Rama ,we are over delighted to witness the unforgettable moment.Glory be to Lord Ram and Goddess Sita ! All hail to Lord Rama and Mother Sita !

Wednesday, 5 August 2020

मंदिर निर्माण का आरम्भ चिरप्रतीक्षित जनअभिलाषा के पूर्ण होने का दिन


अंततः हम सब भारतवासियों का शदियों से बहुप्रतीक्षित वह स्वर्णिम व ऐतिहासिक क्षण आ ही गया जब सनातन धर्म और हमारी संस्कृति के प्रतीक मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की जन्मस्थली अयोध्या में उनके भव्य मंदिर निर्माण का शुभारंभ आज होने जा रहा है। देश देशांतर में बसे राम के वंशजों के लिए यह एक ऐतिहासिक और आनन्ददायी क्षण है।इस दिवस को उत्सव की भांति  मनाने की तैयारी जोरों पर है।भारतीय जनमानस में राम इस कदर रचे बसे हैं कि सोते जगते उठते बैठते राम नाम का उच्चारण सुनाई देता है।यहां तक कि पूजा पद्धति से मुस्लिम धर्म को मानने वाले आल्हा गायक राम के नाम का गुणानुवाद कुछ इस तरह से करते हैं-सारे नामों में हरि नाम बड़ा प्यारा है/राजा दशरथ का ललन राम बड़ा प्यारा है।राम के नाम की मंदिरा पीयो पीने वालों/राम के नाम का जाम बड़ा प्यारा है।इस गीत को सुनकर राम को धर्म विशेष से जोड़ना कल भी गलत था और आज भी गलत है।जिस भावना से यह गीत पीढ़ियों से गया जा रहा है उससे यह सिद्ध होता है कि भगवान राम प्रत्येक भारतीय के पूर्वज हैं। यूँ कहें कि जीव जगत के लिए राम नाम औषधि है तो गलत नहीं होगा। निर्विवाद रूप से राम नाम ही सत्य है और सन्देह से परे है।जो निराकार निर्गुण उपासक हैं उनके लिए भी राम नाम पूंजी है 'राम मोर पूंजिया मोर धना निसबासर लागल रहू रे मना' जो लोग सगुण के उपासक हैं राम उनके लिए विष्णु का अवतार हैं और मर्यादापुरुषोत्तम कहे जाते हैं।डॉ लोहिया कहते हैं कि "ऐ भारत माता हमें राम का कर्म और वचन दो।हमें असीम मस्तिष्क और उन्मुक्त ह्रदय के साथ -साथ जीवन की मर्यादा से रचो"।तातपर्य यह कि हर आम और खास के जीवन को भगवान राम का व्यक्तित्व प्रभावित करता आ रहा है और अनन्त काल तक करता रहेगा।ग़ांधी राम राज्य की कल्पना लेकर चलते हैं तो उनके शिष्य और कुजात गाँधीवादी कहे जाने वाले डॉ लोहिया का सपना सीता- राम -राज का था।सीताराम राज की परिकल्पना को लेकर उन्होंने अपने जीवन काल में रामायण मेला का आयोजन चित्रकूट में किया।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कोख से जन्मे राजनीतिक संगठन भारतीय जनता पार्टी के लिए राम मंदिर निर्माण के साथ ही रामराज्य की स्थापना परम लक्ष्य है। राम राम अभिवादन के रूप में भारतीय समाज में चलन में है तो वहीं जय श्री राम का उदघोष विभिन्न सांस्कृतिक संगठनों में अजस्र ऊर्जा का संचार भी करता है।जूना अखाड़े के वरिष्ठ  महामण्डलेश्वर और राम मंदिर आंदोलन से जुड़े महन्थ भवानीनन्दन यति के अनुसार राम इस राष्ट्र का प्रतीक हैं ,सीता इस राष्ट्र की संस्कृति हैं ,लक्ष्मण इस देश का नागरिक और हनुमान सेना के सौर्य का प्रतीक हैं।राष्ट्र भारत मे आज ऐसा वतावरण तैयार हो चुका है कि मुस्लिम संगठनों की भावनाएं भव्य राममंदिर निर्माण के लिए व्यक्त हो रही हैं।मंदिर निर्माण का विरोध करने वाले आज अप्रासंगिक हो गए हैं।शिलान्यास और कार्य आरम्भ करने के मुहूर्त को लेकर की जा रही बेतुकी बयानबाजी पूर्णतया अर्थहीन है।तुलसी बाबा अपने ग्रन्थ श्रीरामचरितमानस में कहते हैं कि 'जाकी रही भावना जैसी....'राम के अस्तित्व को उस रूप में अंगीकार किया है ।कुल मिलाकर धर्मनिरपेक्ष और धर्मसापेक्ष दोनों चिंतन के केंद्र में राम विराजमान हैं।राम अमीर और गरीब सबके हैं तभी उनको 'गरीब नेवाजू' कहा जाता है।निर्गुनिया सन्त बूला साहेब जनभाषा में कहते हैं कि 'हमरे त राजा राम संघाती'। मंदिर निर्माण कार्यारम्भ के अवसर पर संम्पूर्ण देशवासियो को शुभकामना और अंत में 'सियाराम मय सब जग जानी, करउँ प्रणाम जोरि जुग पानी।

डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
असिस्टेन्ट प्रोफेसर, अंग्रेजी
पी. जी.कालेज,भुड़कुड़ा, गाजीपुर

Wednesday, 29 July 2020

पुण्यतिथि पर याद किये गए शिक्षाविद पं. रामप्रसाद मिश्र


(जखनियां)के. पी. पब्लिक स्कूल जाहीं, झोटना, गाजीपुर और स्वामीरामकृष्ण इण्टर कालेज जैसी संस्थाओं की नींव रखने वाले पं. रामप्रसाद मिश्र को 9वीं पुण्यतिथि के अवसर पर श्रद्धा पूर्वक याद किया गया।उन्होंने अपने जीवन मे पढ़ने और पढ़ाने का व्रत लिया था और जीवन पर्यंत इस व्रत का पालन करते रहे।आज  भौतिक रूप से वे हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके द्वारा प्रदीप्त संस्थाएं अज्ञानता के अंधेरे से लड़ते हुए उस व्रत को पूरा करने में लगी हैं।शिक्षा कभी भी उनके लिए धनार्जन का माध्यम नहीं रही।वे रुचि के साथ गणित और अंग्रेजी विषय की बारीकी को गहराई से समझने का प्रयास करते थे और सरलतम तरीके से विद्यार्थियों को समझाते थे।सादगी से परिपूर्ण उनके जीवन में शांति और सन्तोष का भाव दिखता था।आजकी पीढ़ी के शिक्षकों के लिए उनका व्यक्तित्व प्रेरणादायी है।जीवन की कठिन चुनौतियों का सामना करते हुए वे कभी निराश नहीं हुए।ऐसा लगता था कि असंभव शब्द उनके शब्दकोष में है ही नहीं।सेवानिवृत्ति के पश्चात उन्होंने यह महसूस किया कि केवल सरकारी  प्रयास से ग्रामीण विद्यार्थियों की समस्याओं का निदान सम्भव नहीं है। बालिकाओं के लिए गांव में ही समुचित शिक्षा के ध्येय को लेकर  विद्यालय की नींव रखे। वे प्रत्येक विद्यार्थी को पुत्रवत स्नेह देते थे।उनके द्वारा स्थापित मूल्य संस्था का पाथेय हैं।उक्त बातें वर्चुअल संगोष्ठी को सम्बोधित करते हुए विद्वान वक्ताओं ने कही।इस संगोष्ठी को प्रमुख रूप से डॉ. हरिनाथ मिश्र,डॉ. शोभना,श्री पारसनाथ राय, विचारक श्री दीपक मिश्रा ,श्री नंदलाल शर्मा श्री विनय मिश्र आदि ने सम्बोधित किया।कार्यक्रम का आरम्भ  प्रधानाचार्य श्री प्रमोद कुमार मिश्र द्वारा दीप प्रज्वलन एवं पुष्पांजलि के माध्यम से हुआ।कार्यक्रम के अंत मे वरिष्ठ शिक्षक श्री दुखहरन सिंह यादव नेअभिभावकों एवं अतिथियों के प्रति आभार ज्ञापित किया।

Thursday, 16 July 2020

K.P.Public School :A seat of Innovative Learning


Greetings to all the well-wishers on the auspicious occasion of the 15th anniversary of the foundation of theK.P.Public School, Jahin, Jhotana, Ghazipur.It is the result of unbreakable faith and love of the people of the region.K.P.Public School has been chasing new goals and dimensions ever since its inception .Our founder Pt. Ramprasad Mishra was an ideal teacher and great educationist of Ghazipur.He founded this school with the aim of providing quality education to the rural students.On the basis of his teaching experience as a government teacher, he realised that the government's endeavour is not enough.So, after his retirement ,he started his own efforts which latter on  resulted in the foundation of the school on 15th July 2005.At that time tin- shed rooms were there in the beginning.Now,the school has well trained and qualified teachers as well as good infrastructure.Swami Ramkrishna Inter College is its sister institution.Though this school is a co-educational in nature, rural girls are especially benefitted.Foundation day has special significance in the life of any institution.On this day the institution introspects,learns with experiences and tries to remove all the shortcomings.Quality education is the need of the society.Expected changes are necessary in education system.Pointing out the shortage of resources,the society cannot escape from its accountability.If someone is going to do a noble work for the sake of society with full committement and dedication,the society helps automatically.In the journey of one and a half decade this school has gained incredible support of every section of society and hope the same in future.Now,the use of technology is growing in  teaching .In the revolutionary age of information technology,it is our duty to provide study materials to every student at home because Covid-19 like pandemic has confined all the students in their homes.According to the guidelines of government the school management is trying to facilitate each and every student at home for the purpose of uninterrupted reading and writing.K.P.Public School is committed to fulfill the need and aspirations of the rural students and expects  cooperation and support of the society.

Tuesday, 7 July 2020

Plagiarism is a serious offence in research - Dr.G.D.Dubey

Yesterday, the seven day online workshop on Research Methodology organised by the IQAC,Tilak Dhari Postgraduate College, Jaunpur concluded with the valedictory session.The session started with a welcome address by Dr. Saroj Singh, Principal of the college to laudued the organisers ,and participants of the workshop for the event and making a fruitful use of the time.Dr.G.D.Dubey, Associate Professor of the college delivered a lecture on Ethics in Research with special reference to Plagiarism, Documentation,and Review of Literature.In his address,Dr. Dubey stressed the need for observing the principles of ethics in conducting any research project.He deplored the declining quality of research over the last two decades. Unethical practices are high in research.One of such unethical practices is plagiarism.In many universities and research institutes,there are frequent cases of plagiarism.The government and the UGC have introduced several effective measures to check the practices of plagiarism.Dr.Dubey also suggested some concrete  methods for avoiding plagiarism in any research work.One such method is making a proper documentation of the resources from where a researcher borrows ideas and information.There are specialised manuals of documentation according to discipline.In humanities and literature MLA style is regarded as the standard style of documentation.Finally ,Dr. Dubey closed his talk with a few remarks on the meaning and the significance of literature review in research.More than one hundred fifty participants benefited from this workshop.

Sunday, 21 June 2020

Yoga is the gift of our forefather Patanjali

Greetings to all !
Today,we are celebrating International Yoga Day.Our forefather  Maharshi Patanjali has introduced Ashtang Marg of Yoga  practice which is very relevant to the modern time.Yoga is the effective remedy for the mental, spiritual, and physical ailments to the modern man's sufferings.  So it is the need of the hour to follow the ways of Maharshi Patanjali and remember him with full gratitude.Wishing you all many happy returns of the day.

Tuesday, 9 June 2020

Girish karnad :A Prolific Name In Indian English Writing



Girish Karnad is a prolific name in Indian writing. The demise of Karnad in June10,2019 was a great loss. He was an actor, film director, creative writer and social activist.In the regime of the BJP government the term 'Urban Naxal' became very popular.Unfortunatly ,the term was also used for the name of Girish Karnad because he was the spokesperson of deprived people and weaker section of society.He never tried to own the faith of ruling party .When Indira Gandhi  imposed emergency upon India,Girish raised his voice in favour of democracy.Even, in the last phase of life he remained rebellious and challenged the authority of the state in a democratic way.We all are Indians with many more differences of opinion.It does not mean that the people having differences of opinion, are anti- national.He stood firmly with this conviction.It is his first death anniversary. On the occasion of his first death anniversary ,we feel honoured to pay our warm tribute to the great dramatist and theater artist of our nation.

Sunday, 7 June 2020

Madhava Rao Sadashiva Rao Golwalkar :A Selfless Karmayogi


In our country political communities do two things in a beautiful way.First, to make controversial to a man of national importance and then inflam the same controversy for the purpose of political mileage or benefit.Desparate efforts have been made to victimise the personality of the RSS leader or second Sar Sangh Chalak Madhav Rao Sadashiva Rao Golwalkar.Godse was accused of the assassination of Mahatma Gandhi , father of the nation but Shri Golwalkar was arrested as a conspirator from Nagpur, the RSS Office on 1st February 1948 at midnight hour and the RSS was banned.Blaming someone or an organization is one thing and proving it with evidence is another thing. Gradually time passed away; social unrest and upheaval caused by partition and Gandhi's assassination  subsided and it was proved that RSS was not involve in Gandhi's assassination.Golwalkar had been arrested on  charges that were found to be completely baseless .On11thJuly1948 the restrictions imposed on the RSS were lifted and the RSS chief was released from the jail. Following Indo-China war the then prime minister Pt.Neharu  invited the RSS volunteers in full dress with bands (घोष) to participate in the1963 Republic Day Parade .
         Gradually the RSS was recognized on national platform because of its positive work.Under the leadership of a non political organisation the movement of cultural nationalism was started and still proceeding in forward direction with the aim of Param Vaibhav Sampanna Rashtra(परम् वैभव संपन्न राष्ट्र).Now the RSS has become the world's largest organisation . Madhava Rao Sadashiva Rao Golwalkar has played significant role to spread the ideology and works of the RSS  nationaly .Even today, unfortunately the name of then the RSS head is forcibly in the center of Gandhi's assassination discourse.
         Indeed ,what is the scale of greatness?After pondering we come to know that the length of one's shadow on future can determine one's greatness.Naturally the greatness of  Golwalkar can be measured on behalf of his noble works and  present structure of the RSS.The renowned literary personality and journalist Khushwant Singh has talked in detail about his interview with Golwalkar in 'Illustrated Weekly of India 'and has admitted that the meeting has resolved a lot of confusions .When Khushwant Singh begged Guruji's permission to go after interview ,the latter held his hands and did not allow the former to touch his feet.At the end of the article Khushwant Singh wrote:"Was I influenced by him?"Then he replied to himself:"Yes,I was influenced by him".The remark of Khushwant Singh speaks a lot  and simultaneously gives a message to all the critics of Guruji.The basis of Propaganda against Guruji is a book entitled 'We,or Our Nationhood Defined ' published in 1939.Actually there are some rituals in Indian Politics without which political ceremony remain  incomplete.To declare an organization or a particular person communal is the part of that ritual.Once upon a time the former Prime Minister Shri Chandrashekhar was speaking in the Parliament and quoting the text of this book that -Hitler has told us the way of purity of race which is understandable and adoptable for India.Minority wouldn't have the right of citizenship,there is mentioned that they will live as guests in our country by the permission of majority people otherwise they must go outside.L. K.Advani(the then Home Minister) informed the House as well as the nation that the author has detached himself and disowns the content .If the author denies and disowns the controversial portion of  the text is it just to make the book and author controversial on the same ground?
        Guruji said good bye to this mortal world on 5th June 1973.Having worked for thirty three years continuously he made a dying declaration on piece of paper which was discovered before volunteers after his death.It was mentioned on the paper that a constant competition is in our country to be a big name ,I am alive so how can get position and prestige and after death how to establish own statue is the basic concern of people, that's why no need to make my monument where people do work to fulfil their lust and temptation.At the end these words of Guruji give information about his noble deeds,  service oriented personality without temptation of name fame and glory.The remembrance of such a kind of personality will be a true tribute to him.
Dr.Santosh Kumar Mishra
Assistant Professor
Department of English
S.M.R.D.P.G.College, Bhurkura, Ghazipur.

Friday, 5 June 2020

निवृत्तिगत कर्मयोगी थे गुरुजी उपाख़्याय श्री गोलवलकर


हमारे देश मे राजनीतिक बिरादरी दो काम बड़ी खूबसूरती के साथ करती है।पहले राष्ट्रीय महत्व के किसी व्यक्ति को विवादास्पद बनाना और फिर लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से समय समय पर उसको हवा देते रहना।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सर संघ चालक माधव राव सदाशिव गोलवलकर के व्यक्तित्व को भी इसका शिकार बनाने का असफल प्रयास होता रहा है।राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या का आरोप गोडसे के ऊपर लगा लेकिन हत्या के षड़यंत्र कर्ता के रूप में 1फरवरी 1948 की आधी रात को श्री गोलवलकर नागपुर संघ कार्यालय से गिरफ्तार हो गए और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लग गया।किसी भी व्यक्ति या संगठन पर आरोप लगना एक बात है और सप्रमाण आरोप सिद्ध होना दूसरी बात।समय बीता बंटवारे और गांधी जी की हत्या के बाद की उथल पुथल थोड़ा शांत हुई तथा यह सिद्ध हुआ कि गांधी हत्या में संघ की संलिप्तता नहीं थी।निराधार आरोप के चलते गोलवलकर की गिरफ्तारी हुई है।11 जुलाई 1948को संघ के ऊपर से प्रतिबंध हटा ,संघ प्रमुख गोलवलकर जेल से बाहर आये और चीन से युद्ध के बाद 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में स्वयंसेवकों को पूर्ण गणवेष में घोष के साथ शामिल होने का आमंत्रण तत्कालीन प्रधानमंत्री पं.नेहरू द्वारा मिला।धीरे धीरे संघ को अखिलभारतीय स्तर पर सकारात्मक कार्यो के लिए जाना जाने लगा। एक गैर राजनीतिक संगठन  के नेतृत्व में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद  का महा अभियान शुरू हुआ जो आज भी परम् वैभव सम्पन्न राष्ट्र का लक्ष्य लिए अग्रसर है।आज दुनिया में संघ सबसे विशाल संगठन के रूप में स्थापित है।संघ कार्य को अखिलभारतीय स्वरूप प्रदान करने में माधवराव सदाशिव गोलवलकर की महत्वपूर्ण भूमिका रही। लेकिन खटकने वाली बात यह है कि आज दिन भी इस देश में गाँधी हत्या की चर्चा के केंद्र में संघ के तत्कालीन प्रमुख का नाम जबरन घसीटा जाता है।
              वास्तव में श्रेष्ठता की कसौटी क्या है इस पर विचार करने से ज्ञात होता है कि मनुष्य की भविष्यकाल पर छाया कितनी लम्बी है(The length of one's shadow on future) उससे उसकी श्रेष्ठता का निर्धारण किया जा सकता है।संघ के वर्तमान स्वरूप और कार्य को देखते हुए श्री गोलवलकर की श्रेष्ठता का मूल्यांकन सहज ही किया जा सकता है।सुप्रसिद्ध साहित्यकार और पत्रकार खुशवंत सिंह ने गोलवलकर उपख़्याय श्री गुरुजी के साथ अपनी मुलाकात के बारे में द इलेस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया में विस्तार से ज़िक्र किया है और माना है कि गुरुजी से मिलकर बहुत सारी शंकाओं का समाधान मिला।इंटरव्यू के बाद जब खुशवंत सिंह जाने की आज्ञा मांगने लगे तो उन्होंने उनके हाथ पकड़ लिए ताकि वे उनके चरण न छूने पाएं।लेख के अंत में खुशवंत सिंह ने लिखा ,क्या मैं उनसे प्रभावित था ?मैं स्वीकार करता हूँ,मैं(उनसे)प्रभावित था।खुशवंत सिंह की टिप्पणी बहुत कुछ कहती है साथ ही नकारात्मकता का प्रसार करने वालों के लिए एक सन्देश भी देती है।
           श्री गुरुजी के बारे में दुष्प्रचार का आधार उनके द्वारा1939 में प्रकाशित पुस्तक "We, or Our Nationhood Defined " को भी बनाया जाता है।दरअसल भारतीय राजनीति में भी कुछ प्रचलित कर्मकांड  हैं जिसके बिना राजनीतिक कार्यक्रम पूर्ण नहीं हो सकता।किसी भी व्यक्ति या संगठन को सांप्रदायिक घोषित करना भी उसी कर्मकांड का हिस्सा है।एक बार संसद में पूर्व प्रधानमंत्री श्री चन्द्रशेखर इस पुस्तक का उद्धरण देते हुए कह रहे थे कि इस पुस्तक में उल्लेख मिलता है कि-प्योरिटी ऑफ रेस का रास्ता हमको हिटलर ने बताया है भारत के लिए वह रास्ता देखने और समझने योग्य है। माइनारिटी को नागरिकता का अधिकार नहीं होगा,उसमें लिखा है कि वे हमारे देश में केवल एक अतिथि के रूप में हैं जितने दिन बहुमत के लोग चाहे रहें या उन्हें बाहर जाना होगा।इसके जवाब में तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने सदन को अवगत कराया कि उसके(पुस्तक के) लेखक ने ही उससे अपने को असम्बद्ध किया।श्री गुरुजी ने ही कहा कि मैं उससे सहमत नहीं हूं।अगर पुस्तक में लिखी बात को लेखक स्वयं नकार रहा हो तो उस अंश के आधार पर पुस्तक और लेखक को विवादित बनाना कहाँ तक उचित है? 5 जून 1973को श्री गुरुजी ने शरीर त्याग दिया।तैंतीस वर्षों तक अनवरत संघ कार्य करते रहने के पश्चात औरअपनी मृत्यु से पूर्व कुछ बातें कागज पर लिख  कर उन्होंने देह त्यागा जो मरणोपरांत सार्वजनिक हुईं।उसमें लिखा था कि इस देश में जहां अपना नाम कैसे बड़ा होगा इसकी होड़ लगी है, मैं जीवमान हूँ इसलिए पद प्रतिष्ठा कैसे प्राप्त हो इसके  लिए  होड़  लगी रहती है,और मृत्यु के पश्चात कैसे अपने पुतले बिठाए जाएं इसकी होड़ मची है इसलिए मेरा स्मारक मत बनाइयेगा।जहां लोग पद, पैसा,प्रतिष्ठा या लाभ प्राप्ति हेतु प्रवृत्तिगत भाव से कार्य करते हैं वहीं उनका यह अंत समय का उद्गार राष्ट्र के प्रति निवृत्ति भाव से की गई सेवा भावना को दर्शाता है।ऐसे महापुरुष का पुण्य स्मरण उनके प्रति सच्ची कृतज्ञता होगी।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
श्री म. रा.दा.पी.जी.कालेज
भुड़कुड़ा, गाजीपुर।

Thursday, 4 June 2020

धरती का सौंदर्य जीवन का आधार

               
                    
       
विश्व पर्यावरण दिवस आज
  जब हम कोई दिवस मनाते हैं तो उस दिन विशेष पर अपना ध्यान खास मुद्दे पर केंद्रित करके चिंतन करते है।आज विश्व पर्यावरण दिवस है।और कहना गलत न होगा कि सबको दुनियां की चिंता है और सबसे दुनियां को चिंता।किसी को कुछ सूझ नहीं रह है।हालत बद से बदतर हो गए हैं।कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के चलते आदमी तो  मारा मारा फिर ही रहा है उसकी छोड़िये,भूतों तक को उसने अपनी करतूतों से बेघर कर दिया है । कितनी अजीब बात है न भूतों के बारे में बतियाना, संचार क्रांति के इस युग में लेकिन यक़ीनन यह सच है कि भूत बेघर हो गए हैं।उनका ठिकाना छिन गया है।विश्व पर्यावरण दिवस से भूतों का क्या सम्बन्ध ?यह बात तो सहज ही मन में आएगी।लेकिन सम्बन्ध हैऔर प्रगाढ़ सम्बन्ध है।सघन वन ,जंगल, निर्जन स्थान ,नदी ,पोखर ,तालाब यहीं तो होता था भूतो का अड्डा ठिकाना जहां दिन में भी आदमी सामान्यतया अकेले जाने में भय खाता था ।लेकिन आज इन जगहों का अतापता नहीं।जो व्यक्ति जितना अधिक विकसित होने का दम्भ पाले है वह अपनी खास तरह की जीवन शैली के कारण पर्यावरण के लिए उतना ही अधिक हानिकारक है।पेड़ों की अन्धाधुन्ध कटाई ने वीरान बना दिया धरती को।और हम सभ्य होने का दम्भ लिए घूमते फिर रहे हैं।हमारी हबस ने कितनों को बेघर कर दिया ,कितने विलुप्त हो गए और खुद के जीवन को भी अधर में लटका दिया है।उधार का जीवन कब तक चलेगा।सोचना तो पड़ेगा कि हमने क्या कमाया और क्या छोड़ जायेंगे।हमारे पुरखों ने हमको जो चीज़ सहेज के दिया क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को देने में सक्षम रहेंगे अंत तक।शायद नही!तो क्यों हम हम कहि धन धाम संवारने में लगे हैं जब अंत समय में खाली हाथ जाना है।गिद्ध कौवा गौरैया को तस्वीरों में हमारे बच्चे देख पाएंगे ।सियार को मानव बस्ती में देख मारो मारो का शोर मचता है लेकिन क्यों ?पेड़ों को काटकर हमने ही तो उसे बेघर कर मानव बस्ती में घूमने को मजबूर किया है।गाल बजाने से समस्या का कहीं भला समाधान निकलता है।समाधान तो निकलेगा सोचने समझने और महसूस करने से।दोस्त और दुश्मन के अंतर को समझने से।क्षणिक आनंद की जगह परम् आनंद की ओर उन्मुख होने से।मेरा आशय कंक्रीट के जंगलों का मोह त्यजने से है।प्रकृति के साथ दोस्ताना रवैये से है।और तब हम बेहद खूबसूरत दुनियां से नाता जोड़ पाएंगे।अगर कुछ धनात्मक करने में हम सक्षम नहीं हैं तो जस का तस तो छोड़ ही सकते हैं धरा  को।यह भी क्या कम है!तो फिर आइये आज के दिन एक संकल्प लिया जाय कि इस खूबसूरत आशियाने को न तो उजाड़ेंगे और न ही उजड़ने देंगे।होली  दीवाली ईद क्रिसमस पर नकली घरों को सजाने और साफ सुथरा करने से हमें कौन रोक रहा लेकिन यह धरती हरी भरी और साफ-सुथरी रहे वर्षपर्यन्त इसको सुनिश्चित करना  हमारा दायित्व है।धरती का सौन्दर्य सदा सर्वदा बना रहेगा तभी जीवन का प्रवाह भी अनवरत धरा पर रहेगा और मानव सभ्यता अक्षुण्य बची रहेगी।बाढ़, सूखा, भूकम्प जैसी प्रकृतिक आपदा और कोरोना जैसी महामारी पर हम विजय प्राप्त कर सकेंगे।विश्व पर्यावरण दिवस की सबको बधाई।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
श्री म. रा.दा. पी.जी.कालेज
भुड़कुड़ा, गाजीपुर।

Wednesday, 3 June 2020

विरोधी विचारों के साथ समन्वय का नाम जार्ज फर्नांडीज


        
डॉ.लोहिया के शिष्य प्रो.मधु दंडवते और मधु लिमये जैसी समाजवादी विभूतियों के समकालीन  जार्ज फर्नांडीस कीआज जन्मजयंती है।जार्ज साहब का निष्कलुष जीवन अपने आप में एक मिसाल है।देश काल और परिस्थिति के अनुसार जनहित में निर्णय लेकर अड़िग रहना और जनता की सेवा के लिए सदैव तत्पर रहना उनकी ख़ासियत रही है।भारतीय राजनीति में गैर कांग्रेसवाद की शुरुवात लोहिया और जे पी के नेतृत्व में होने के बाद जार्ज फर्नांडीज भी इससे कालांतर में जुड़ गए और आपातकाल के दौरान काफी सक्रियता दिखाई।भारतीय राजनीति में गठबंधन युग की शुरुवात होने पर इसे अस्थिरता के दौर से उबारने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।जब भारतीय जनता पार्टी का राजनैतिक आधार बढ़ रहा था लेकिन वह इस स्थिति में नहीं पहुंच पा रही थी कि देश को एक स्थिर सरकार दे सके।उसके ऊपर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का पक्षधर तथा साम्प्रदायिक दल होने का लेबल लगा कर उसे राजनीतिक दृष्टि से अछूत घोषित कर दिया गया था।  या यूं कहें कि उनदिनों भाजपा को सांप्रदायिक कहना राजनीतिक कर्मकांड का हिस्सा बन गया था तब देश की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए स्थिर सरकार देने के उद्देश्य से जार्ज साहब ने लोहिया और जेपी के सत्तालोलुप शिष्यों को दरकिनार करते हुए भाजपा की ओर हाथ बढ़ाया।यद्यपि अपने को धर्मनिरपेक्ष कहने वालों द्वारा आजदिन भी बदस्तूर यह प्रयास जारी तो है लेकिन बेअसर है।जब अटल सरकार में साझीदार घटक दल अपने राजनैतिक फायदे के मुताबिक सौदेबाजी करने में लगे थे तो वहीं दूसरी ओर जयप्रकाश नारायण की समग्र क्रांति की कोख से जन्मे नेता क्षेत्रीय जनाधार के बल पर अपने राजनीतिक मनसूबे को हवा दे रहे थे।ऐसे में जार्ज साहब ने राष्ट्रीय राजनीति में दखल देते हुए राजग के संयोजक के रूप में कमान सम्हाली और भाजपा की अगुवाई में बने गठबंधन  के साथ मुस्तैदी से नायक की भूमिका में खड़े हुए।कामन मिनिमम प्रोग्राम का खाका तैयार हुआ और राजनीतिक अस्थिरता से देश को निजात मिली।प्रयोग सफल हुआ और पहली गैर कांग्रेसी सरकार ने अटल विहारी वाजपेई के नेतृत्व में अपना कार्यकाल पूरा किया साथ ही भाजपा राजनीतिक दृष्टि से अस्पृश्य नहीं रही। इस श्रेय के असली हकदार जार्ज फर्नांडीज ही हैं।इसी प्रयोग को आगे बढ़ाते हुए  देश में 2014 से राजग का शासन है और 2019 में लगातार दूसरी बार मोदी के नेतृत्व  में पूर्ण बहुमत प्राप्त करने के बाद भी गठबंधन की सरकार बनी तथा छोटे दलों को भी सरकार में प्रतिनिधित्व मिला जिसने गत 31 मई को एक वर्ष का कार्यकाल पूरा किया। देशव्यापी प्रचंड जनादेश के पीछे मोदी जैसा नेता नीतियां और कार्यक्रम के अलावा गठबंधन में भागीदार छोटे बड़े दलों की संयुक्त शक्ति भी है जिसके द्वारा मतों के बिखराव को रोकने में सफलता मिली।यह जार्ज साहब के जमाने में हुए राजनीतिक प्रयोग को सूक्ष्म तरीके से व्यापक स्तर पर लागू करने का परिणाम है।आज सहयोगी दलों के साथ बेहतर समन्वय के साथ नरेंद्र मोदी के करिश्माई नेतृत्व में सरकार चल रही है और अपने ऐतिहासिक निर्णयों के साथ लोकप्रियता के शिखर पर है।अपने सक्रिय राजनीतिक जीवन में जार्ज फर्नांडीज ने विरोधी विचारों के साथ गज़ब का सन्तुलन और संयोजन स्थापित किया था।कहाँ दक्षिण पंथी कही जाने वाली भाजपा और कहाँ समाजवादी झंडाबरदार जार्ज फर्नाडीज।यह देखकर जार्ज साहब का राजनीतिक कौशल याद आ रहा है ।किसानों मजदूरों के हक़ के लिए लड़ने का जज़्बा उनको एक जननेता की पहचान दिलाता है।भारतीय राजनीति में सार्थक और सकारात्म योगदान के बावजूद उनको भुलाने का प्रयास सालता है ।जन्मदिन पर जार्ज फर्नांडीज को  याद करने के साथ यह अपेक्षा भी है कि वर्तमान पीढ़ी और हमारे नेतागण आपसी समझ और समन्वय की राजनीति को तरजीह देंगे दम्भ,  तोड़- फोड़ और  खरीद- फ़रोख़्त को नहीं। भले ही जार्ज फर्नाडीज आज नहीं हैं लेकिन जब जब गठबंधन धर्म की बात होगी  भारतीय राजनीति को कठिन दौर से उबारने की कोशिशों की चर्चा होगी, सादगी और सुचिता का जिक्र आएगा तब तब उनका बेदाग व्यक्तित्व और विचार रास्ता दिखाने का काम करेंगे।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
पी. जी.कालेज,भुड़कुड़ा,गाजीपुर

Friday, 29 May 2020

सच्चे पत्रकार और साहित्यकार होते हैं वास्तविक जनप्रतिनिधि



  
साहित्य और पत्रकारिता का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है।यदि पत्रकारिता तथ्यों एवं विचारों को उदघाटित करती है तो साहित्य अमूर्त भावों और विचारों को अभिव्यक्ति देता है।दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।पत्रकारिता को साहित्य की एक विधा कहना गलत नहीं होगा।खुशवंत सिंह,कुलदीप नैयर,विद्यानिवास मिश्र,अज्ञेय, मनोहर श्याम जोशी और वर्तमान में हृदयनारायण दीक्षित ,वेदप्रताप वैदिक जैसे लोगों की लंबी परम्परा है जिन्होंने लेखक और पत्रकार के श्रेष्ठ दायित्वों का समान रूप से निर्वहन किया है।कुछ समय पूर्व तक पत्रकारिता में प्रवेश के लिए यह जरूरी था कि व्यक्ति का लगाव साहित्य की तरफ हो लेकिन आज ऐसा नहीं है।तकनीक के प्रयोग और पैसे की चमक ने पत्रकारिता को तुलनात्मक रूप से साहित्य से ज्यादा लोकप्रियता का माध्यम बना दिया।फलतःसाहित्य और पत्रकारिता के बीच पहले जैसा रिश्ता नहीं रहा।आज दोनों पर एक दूसरे की उपेक्षा का आरोप लगता है।
   प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के पूर्व से लेकर आजादी के बहत्तर साल बाद तक तमाम उतार चढ़ाव से गुजरते हुए हिंदी पत्रकारिता  194 वर्ष की हो गयी।लगभग इन दो सौ वर्षों में पत्रकारिता की दुनियां में बहुत कुछ घटित हुआ और समाज की बेहतरी के लिए बहुत कुछ करने की सम्भावना भी बाकी है।लोकतांत्रिक व्यवस्था का चौथा और महत्वपूर्ण स्तम्भ पत्रकारिता है।आजादी से पूर्व हिंदी पत्रकारिता के तीन लक्ष्य थे।पहला लक्ष्य था कलम को हथियार बनाकर आजादी हासिल करना,दूसरा साहित्यिक उत्थान और तीसरा समाज सुधार करना।पण्डित युगल किशोर शुक्ल द्वारा सम्पादित उदन्त मार्तण्ड को पहला अख़बार होने का श्रेय जाता है।कलकत्ता (कोलकाता)से 30 मई 1826 को इसका प्रकाशन शुरू हुआ।
    आजादी से पूर्व पत्रकारिता कर्म एक व्रत था और आजादी के बाद यह वृति में बदल गया।आज अर्थ के इस युग में देश और समाज के हित से पहले पत्रकारों के लिए निजी हित याअपने प्रतिष्ठान का हित सर्वोपरि है।यद्यपि कुछ निडर और निर्भीक पत्रकार आज भी खड़े हैं लेकिन जुनून के साथ जूझने के आलावा उनके पास कुछ भी नहीं।यहाँ तक कि परिवार के पालन पोषण का भी संकट है।पत्रकार या सम्पादक को इस बात का सदैव ध्यान रखना चाहिए कि समाचारों  या लेख की आड़ में किसी का प्रचार नहीं होना चाहिए साथ ही यह भी सुनिश्चित हो कि सरकार के प्रति नकारात्मकता फैलाने का यह माध्यम भी न बने।यह काम तलवार की धार पर चलने जैसा है। (We don't go into journalism to be popular.It is our job to seek the truth and put constant pressure on our leaders until we get answer- Helen Thomas)अर्थात पत्रकारिता का उद्देश्य लोकप्रियता बटोरना नहीं है।पत्रकार का काम है सत्य को तलाशना और जवाब पाने के लिए शासकों के ऊपर दबाव डालना।आज के प्रतिष्ठित अख़बारों से जुड़े कुछ नामचीन पत्रकारों ने अपनी निष्ठा को गिरवी रख दिया हैऔर सत्ता- सिंहासन के इर्द गिर्द डोलने बोलने को लक्ष्य बना आर्थिक हित साधने में लगे हैं।पत्रकारिता प्रसिद्धि का माध्यम बन गई है और इसका लक्ष्य सत्य तलाशने की जगह सत्ता में भागीदारी बन गया है।तिलक,गाँधी,डॉ राममनोहर लोहिया,बाबू बनारसीदास ,बद्री विशाल पित्ती,आचार्य नरेंद्र देव,पं.दीनदयाल उपाध्याय ,अटल बिहारी वाजपेयी सरीखे राजनीतिज्ञों ने अपने जीवनकाल में पत्रकारिता के मूल चरित्र को अक्षुण्य बनाये रखा। आज के दौर की पत्रकारिता रास्ते से भटक गयी है।
    समाज में जागरूकता लाना पत्रकार का पहला दायित्व है और इसका निर्वाह करने वाला ही सच्चा पत्रकार है।सच कहें तो हमारे तथाकथित जनप्रतिनिधि दलों की दलदल में फंसे होते हैं लेकिन सच्चे पत्रकार और साहित्यकार वास्तविक जनप्रतिनिधि होते हैं।आज के दौर की पत्रकारिता ने उद्योग का रूप ले लिया है।बड़े बड़े मीडिया हाऊस अस्तित्व में आ गए हैं।आंकड़ों पर गौर करें तो अनुमानतः सवा लाख करोड़ से अधिक का यह उद्योग बन चुका है।राष्ट्रीय एजेंडा निर्धारण में मीडिया की भूमिका भी बढ़ी है लेकिन आधुनिक दौर में संवैधानिक पदों पर आसीन लोगों से समाज की अपेक्षा है कि पत्रकारिता रूपी संस्था को कारोबारी नजरिये से हटकर ताकत मिलती रहे जिससे एक सौ तीस करोड़ का देश पूरी पारदर्शिता से प्रगति के पथ पर बढ़ता रहे।पत्रकारिता ही वह माध्यम था जिसने आजादी में जनचेतना का मार्ग प्रशस्त किया  और आजादी के बहत्तर साल बाद पुनःराष्ट्रीय व सामाजिक दायित्वों की पूर्ति के लिये  व्रती पत्रकारिता की आवश्यकता महसूस हो रही है।यदि समाज के ज्वलन्त मुद्दों पर पत्रकार की लेखनी छैनी का काम करेगी तभी भारतीय समाज को सुंदर आकार देने में सफल होगी।एक कहावत प्रचलित है कि पत्रकारिता सरकार की मां नहीं है जो पीछे से सहारा दे,वह सरकार का बच्चा भी नहीं है जिसे गोंद में बिठा के खिलाया जाए बल्कि पत्रकारिता तो सरकार का बाप है जो कान खींच के उसे रास्ता दिखाए।अगर आज पत्रकारिता यह कर पाने में समर्थ है तो उसे सार्थक माना जायेगा। चुनौतियों से जूझते हुए सत्य के साथ पत्रकार का खड़ा होनाऔर विमर्श को जिन्दा रखना समाज को समाधान देगा।हिंदी पत्रकारिता दिवस  की सुधी पाठकों और पत्रकार बन्धुओं को बधाई।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
श्री म. रा. दा.पी.जी.कालेज
भुड़कुड़ा, गाजीपुर।

Wednesday, 27 May 2020

परम्परा और आधुनिकता का समन्वय है पं.नेहरू का व्यक्तित्व

लोकतंत्र में वोट हासिल करने की राजनीतिक प्रतियोगिता से अलग हटकर आज विचार करने की आवश्यकता है।किसी व्यक्ति के समग्र व्यक्तित्व का मूल्यांकन किये बग़ैर उसे नायक या खलनायक घोषित करना उस व्यक्तित्व के साथ नाइंसाफी होगी।पं.नेहरू ने प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में देश की बागडोर सम्हाली।उनके सामने चुनौतियों का अंबार खड़ा था।आज़ादी के बाद भारत जैसे प्राचीन देश की विरासत को सम्हालते हुए दुनियां में हो रहे बदलावों को स्वीकारना वक्त की जरूरत थी।किसी भी परम्परागत समाज के सामने यह मुश्किल आना स्वाभाविक है कि आधुनिकता के साथ वो अपना रिश्ता कैसे कायम करे।एक तरीका तो यह है कि परम्परा के खण्डहरों पर आधुनिकता का महल बनाएं तथा दूसरा यह कि परम्परा को ही आधुनिकता का रूप दे दें।परम्परा और आधुनिकता का अद्भुत समन्वय पं.नेहरू के व्यक्तित्व में दिखाई देता है।उन्होंने अपनी नेतृत्व क्षमता से अपने दौर को प्रभावित किया।आज ही के दिन 1964 में उनका देहांत हुआ।राजनीति के गलियारे से निकलकर जिस तरह की चर्चा आज नेहरू के बारे में सोशल मीडिया में होती है वह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।
नेहरू का व्यक्तित्व,कार्यशैली, दूरदर्शिता और राष्ट्र के प्रति समर्पण सन्देह से परे 
है।भारतीय जनसंघ के नौजवान नेता, अटल बिहारी वाजपेयी ने 29 मई, 1964 को संसद में उन्हें कुछ इसप्रकार से श्रद्धांजलि दी जिसके आलोक में नेहरू के व्यक्तित्व का मूल्यांकन करना उनके कटु आलोचकों के लिए समीचीन होगा।

महोदय,

एक सपना था जो अधूरा रह गया, 

हर अँधेरे से लड़ता रहा और हमें रास्ता दिखाकर, एक प्रभात में निर्वाण को प्राप्त हो गया।

मृत्यु ध्रुव है, शरीर नश्वर है।हमारे जीवन की एक अमूल्य निधि लुट गई।

भारत माता आज शोकमग्ना है – उसका सबसे लाड़ला राजकुमार खो गया। 

मानवता आज खिन्नमना है – उसका पुजारी सो गया।

शांति आज अशांत है – उसका रक्षक चला गया।

विश्व के रंगमंच का प्रमुख अभिनेता अपना अंतिम अभिनय दिखाकर अन्तर्ध्यान हो गया।

वह शांति के पुजारी थे,

संसद में उनका अभाव कभी नहीं भरेगा। 

वह व्यक्तित्व, वह ज़िंदादिली, विरोधी को भी साथ ले कर चलने की वह भावना, वह सज्जनता, वह महानता शायद निकट भविष्य में देखने को नहीं मिलेगी।

मतभेद होते हुए भी उनके महान आदर्शों के प्रति, 

उनकी प्रामाणिकता के प्रति,

 उनकी देशभक्ति के प्रति,

और उनके अटूट साहस के प्रति हमारे हृदय में आदर के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं उस महान आत्मा के प्रति अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।

-अटल बिहारी वाजपेयी 29मई1964

Monday, 25 May 2020

नब्बे के दशक तक अंतर्देशीय और पोस्टकार्ड थे कुशलक्षेम के सशक्त माध्यम

संचार क्रांति के इस दौर में चिट्ठियों का चलन पहले जैसा नहीं रहा।नब्बे के दशक तक अन्तर्देशीय और पोस्टकार्ड कुशलक्षेम जानने के सशक्त माध्यम थे।फ़ेसबुक, व्हाट्सएप, ट्विटर, इंस्टाग्राम, जैसे विविध सोशल मीडिया प्लेटफार्म के ज़रिए हम दुनियां के किसी कोने में बैठे अपने सम्बन्धियों, सुपरिचितों और आभासी दुनियां के मित्रों से रूबरू  होकर हालचाल कर सकते हैं।यह सुविधा हर आम और ख़ास को आज प्राप्त है।अपने सगे संबंधियों को सन्देश भेजना और प्राप्त करना बेहद आसान हो गया है। इसकी आवृत्ति दिन में कई दफ़े हो जाया करती है।लेकिन आज से तीस पैंतीस साल पहले जनसामान्य के लिए अपने प्रियजनों के हाल जनाना इतना आसान नहीं था।बहुत तत्परता के साथ पत्रव्यवहार करने पर भी हालचाल जानने में महीना भर तो लग ही जाता था। कई बार लिखा हुआ पत्र पोस्ट करने में भी दो या चार दिन लग जाता था इसका कारण मनोभावों को कागज पर उतारने मात्र से प्राप्त होने वाली तसल्ली हो सकती थी।पत्रव्यवहार के लिए प्रयोग होने वाले अन्तर्देशीय, पोस्टकार्ड, लिफाफा जैसे माध्यमों से ही सूचनाओं का आदान प्रदान होता था जिससे हमारे आजके बच्चे परिचित नहीं हैं।पत्र भेजने की एक विधा को बैरन चिट्ठी के नाम से जानते थे जो निःशुल्क  भेजी जाती थी,जिसके पहुंचने की पूरी गारंटी होती थी लेकिन पत्र प्राप्त करने वाले से डाकिया कुछ शुल्क वसूल करता था।उस समय पत्र लिखने और पत्र पढ़ने में एक ख़ास तरह के आनंद की अनुभूति होती थी जो आज सूचनाओं के लेनदेन में शायद महसूस नहीं की जा सकती।ज्यादातर लोग किसी का संदेश किसी को फ़ॉरवर्ड करके एकप्रकार की औपचारिकता का निर्वाह भर कर रहे हैं।इसमें बनावटीपन के साथ गर्मजोशी  का अभाव है।या यूँ कहें कि आभासी दुनियां में की गई अभिव्यक्ति की तुलना में कागज पर की गई अभिव्यक्ति में ईमानदारी ज्यादा थी तो गलत नहीं होगा।
        विचारों और भावों को तारतम्य में बांधकर पत्र मे पिरोना आसान काम नहीं है।यह काम और भी कठिन हो जाता है जब किसी दूसरे के मनोभावों को शब्दबद्ध करके किसी दूसरे के लिए कागज पर उकेरना हो।कई बार इस तरह की कठिनाई का अनुभव अपने गाँव की एक बृद्ध महिला का अपने पुत्रों के लिए पत्राचार करने में मुझे भी महसूस हुआ।उनके द्वारा कही बातों को हूबहू उनके पुत्रों तक प्रेषित करना लिखने वाले के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण था।इसकार्य के लिए उस तरह की भावभूमि में उतरना होगा।पत्र द्वारा सन्देश का आदानप्रदान कई हिंदी फिल्मों और फिल्मी गीतों का आधार बना तो वहीं विक्टोरियन युग के प्रख्यात अंग्रेजी उपन्यासकार टामस हार्डी के उपन्यासों में पत्रों का बिलम्ब से पहुंचना कहानी की बुनावट का अहम हिस्सा है।पंडित नेहरू ने अपनी पुत्री इंदिरा को पत्र लिखे थे जो बाद में" पिता के पत्र पुत्री के नाम"से एक महत्वपूर्ण पुस्तक  रूप में 1929 में प्रकाशित हुए।
          हमने बचपन में अपनी दादी के संसर्ग में पत्र लिखना सीखा।वे कितना पढ़ी लिखी थीं यह तो मैं नहीं जानता लेकिन पत्र में भावों का सम्प्रेषण कैसे करना है ,सिलसिलेवार ढंग से सारी  बातें कैसे कहना है ,उस समय यह बारीकी मेरी नजर में  उनसे बेहतर शायद ही कोई जानता हो।घर का बुज़ुर्ग होने के नाते नियमित अंतराल पर वे सभी सगे सम्बन्धियों के साथ पत्राचार के लिए मुझे प्रेरित करती रहती थीं।उनदिनों सबके पत्रों का इंतजार भी हुआ करता था।घर में एक अलमारी पर कुछ पोस्टकार्ड और अन्तर्देशीय रखी रहती थी।पोस्टकार्ड थोड़ा सस्ता होता था लेकिन उसमें अभिव्यक्ति के सार्वजनिक होने का खतरा रहता था। पोस्टकार्ड का प्रयोग यदाकदा ही होता था।ज्यादातर लोगअंतर्देशीय ही प्रयोग करते थे।यह सब करने में मुझे मज़ा आता था और कब प्राईमरी का विद्यार्थी पत्र लिखना और जिम्मेदारी के साथ प्रतिउत्तर देना सीख गया पता ही नहीं चला। 26 जनवरी सन 1988 में दादी के दिवंगत होने के बाद भी मेरे द्वारा पत्राचार का सिलसिला मोबाइल फोन आने के पहले तक सभी सम्बन्धियों से निरन्तर चलता रहा। इसका जो सीधा लाभ मुझे प्राप्त हुआ उसका मूल्यांकन मैं आज सहज ही कर सकता हूँ।बातों को कागज के टुकड़े पर क्रमबद्ध रखने का सलीका सिखाने में दादी के निर्देशन में किया गया वह पत्रलेखन है ,जिसकी आदत आरम्भिक अवस्था में खेल खेल में ही पड़ गई थी।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
श्री म.रा. दा.पी.जी.कालेज 
भुड़कुड़ा,गाजीपुर।

Thursday, 21 May 2020

राजीव गांधी की पुण्यतिथि आज

स्वर्गीय राजीव गाँधी को नजदीक से मध्यप्रदेश में विदिशा शहर के सम्राट अशोक टेक्निकल इंस्टीट्यूट ग्राउंड पर वर्ष 1991 में चुनावी रैली सम्बोधित करने के दौरान पहली और आखिरी बार देखा- सुना।उनदिनों उनका यह आगमन बतौर कांग्रेस नेता और पूर्व प्रधानमंत्री के तौर पर विदिशा में हुआ था लेकिन उस समय उमड़ी भीड़ का आलम देख उनकी तत्कालीन लोकप्रियता का अंदाजा मैं आज सहज ही लगा सकता हूँ।उनदिनों हमलोग विदिशा स्टेशन के पास शेरपुर मुहल्ले में बड़े पिताजी के साथ रहते थे।राजीव गाँधी अपने मित्र और कांग्रेस उम्मीदवार भानुप्रताप शर्मा का चुनाव प्रचार करने आये थे।
      इम्तिहान देने के बाद गर्मी की छुट्टियां हुईं और छुट्टियों में हम गाँव आ गए थे।सायंकाल बीबीसी सुनना और सुबह रेडियो पर मानस पाठ और प्रादेशिक समाचार से दिन की शुरुआत हमारी आदत में था।हमलोगों को हत्या के एकदिन बाद 22 मई ,अलसुबह रेडियो के माध्यम से राजीव गांधी के बम धमाके में मारे जाने की मनहूस खबर प्राप्त हुई उसवक़्त हमलोग ट्रैक्टर की ट्राली में गोबर की खाद दरवाजे के सामने घूरे से भर रहे थे।समाचार सुनते ही सबलोग स्तब्ध रह गए थे।ऐसा लगा जैसे हमने किसी सगे सम्बन्धी या प्रियजन को खो दिया हो।आज भी 29 साल पहले घटित वह वाकया भूलता नहीं है।हमलोगों ने कामबंद कर दिया।धीरे धीरे इस खबर से शोकसंतप्त होकर आस पास के लोग इकट्ठा हो गए ।सारे लोग इस घटना से दुखी और मर्माहत होकर अपने अपने तरीके से अपनी शोक सम्वेदनाएँ प्रकट कर रहे थे।
     आज लंबे अरसे बाद वह सब स्मरण आ रहा है।साथ ही यह भी समझ आ रहा है कि किसी का खात्मा करके उसको रास्ते से हटा सकते हैं लेकिन उसको मिटा नहीं सकते।देश के प्रधानमंत्री के तौर पर उनके लिए फैसले  की खातिर उनको भुलाना नामुमकिन है।राजनीति की गलियां काज़ल की कोठरी हैं इन गलियों से गुजरने वाला कितना ही सयाना क्यों न हो एक लीक काज़ल की तो लग ही जाती है।राजनीति के चमचमाते सितारे के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ जो प्रचलित अर्थों में  सयाना तो नहीं था लेकिन सयानों की सोहबत में राजनीति की गलियों से गुजरा और अपने दामन को बचा नहीं पाया। अगर चेहरे को पढ़कर सख्शियत का अंदाजा लगाया जाय तो यह कहा जा सकता है कि उनकी नीतियां बहस का विषय हो सकती हैं लेकिन उनकी नियति में खोट तो नहीं ही था।वे भारत को अत्याधुनिक तकनीक से लैस करने का सपना दिखाकर दुनियां को अलविदा कह गए।दूरसंचार क्रांति उसी सपने का हकीकत में रूपांतरण है।आज हम डिजिटल इंडिया के साथ आगे बढ़ रहे हैं।अट्ठारह वर्ष में मताधिकार की उम्रसीमा तय करके युवाओं को देश का जिम्मेदार नागरिक बनाया।देशभर में नवोदय विद्यालय की शुरुवात की।सन 1981 में छोटे भाई संजय की दुर्घटना में मौत के बाद हुए उपचुनाव में अमेठी का प्रतिनिधित्व करते हुए सक्रिय राजनीतिक पारी की शुरुवात करने वाले राजीव गांधी का राजनीतिक सफर प्रधानमंत्री की कुर्सी तक होते हुए 1991 में समाप्त हो गया।यद्यपि इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद प्रधानमंत्री की कुर्सी उनको विरासत में मिली थी लेकिन अपने व्यक्तित्व और कार्यशैली से  लोगों के दिलोदिमाग पर छाप छोड़ने में वे कामयाब हुए। बेहद आकर्षक ,सौम्य ,जनप्रिय और मृदुभाषी राजनेता राजीव गाँधी को पुण्यतिथि पर सादर नमन!
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
श्री म.रा.दा.पी.जी.कालेज
भुड़कुड़ा, गाजीपुर।

Monday, 18 May 2020

कोरोना संकट नए तरह के समाज और साहित्य का प्रसवकाल



समाज बदल रहा है,देशकाल परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं।एक वायरस ने पूरी दुनियां बदल कर रख दिया।यह बदलाव दीर्घकालिक है।साहित्य भी इस बदलाव से अछूता नहीं है।नित नई चुनौतियों का सामना कर रहे मनुष्य की साहित्यिक अभिरुचि भी बहुत तेजी के साथ बदल रही है।आज पाठक पहले की तुलना में ज्यादा जिज्ञासु है । वह कपोलकल्पित विषयवस्तु की जगह तथ्यपरक सत्य का अभिलाषी है।अतीत काल से ही  साहित्य मनोरंजक और लोकरंजक रहा है।संकट काल में समय समय पर साहित्य ने समाज की सेवा की है।कालजयी रचनाओं में लोकमंगल का स्वर फूटा है।लेकिन बाजारवाद से निकले साहित्य का उद्देश्य  केवल मन बहलाव करके वाहवाही लूटना और धनार्जन  हो गया था।समाज के यथार्थ चित्रण के नाम पर सतही,अगम्भीरऔर मनोरंजक  विषयवस्तु कभी साहित्य का दर्जा नहीं प्राप्त कर सकती है।सच्चे साहित्यकार की सम्वेदना आम आदमी की सम्वेदना से बहुत गहरी होती है इसीलिए उसका सरोकार व्यापक और सृजन कालजयी होता है।आज का साहित्य जीवन की समस्याओं पर गहनता से विचार करते हुए  उसे हल करने की कोशिश कर रहा है।उसे उन तमाम प्रश्नों से दिलचस्पी है जिनसे समाज या व्यक्ति प्रभावित होते हैं। जो कुछ लिख दिया जाय ,वह सब का सब साहित्य कदापि नहीं है।Literature is the written record of man's spirit,of his thoughts, emotions and aspirations. जिसमें दिल और दिमाग पर असर डालने का गुण हो वही साहित्य है।सच कहा जाय तो जीवन की सचाइयों का दर्पण ही साहित्य है।आधुनिक साहित्य में वस्तुस्थिति चित्रण की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है।रोजीरोटी के लिए रोजमर्रा की जद्दोजहद ,बसने का सपना लिए उजड़ती दुनियां,महामारी के कारण मौत के आंकड़ों  पर संचार माध्यमों द्वारा निगाह गड़ाए समाज,और अभावों की मार के बावजूद जीने के लिए  संघर्षरत मनुष्य की पीड़ा आजके साहित्यकारों को निश्चित रूप से उद्वेलित करेंगे।कुछ महीनों से भौतिक विकास का पहिया थमा जरूर है लेकिन इसका परिणाम यह है कि प्रकृति राहत की सांस ले रही है।कोरोना काल नए तरह के समाज और साहित्य का प्रसव काल है।इसकी कोख से जन्म लेने वाला साहित्य जाति,धर्म लिंग,क्षेत्र ,भाषा और भौगोलिक सीमा की संकीर्णता से बाहर निकलते आदमी की आदमियत का दस्तावेज़ होगा।रचनाएं चाहे जिस विधा में हों निकट भविष्य में उनका तेवर और कलेवर और भी बदलेगा।प्रत्यक्ष अनुभवों की सीमा को तोड़कर बाहर निकलना वर्तमान परिस्थितियों में साहित्यकार के लिए मुश्किल है लेकिन इस अनुभवजनित पीड़ा की अभिव्यक्ति अस्तव्यस्त जनजीवन को पुनः व्यवस्थित करने  और नई उम्मीद के संचार का सामर्थ्य रखती है।हर्ष और विषाद के भावों का लेखनी द्वारा चित्रण साहित्य को संवेदना से जोड़ता है।हर आदमी की मनोवृत्ति और दृष्टिकोण अलग होता है।साहित्यकार की कुशलता इसी में है कि उसकी मनोवृति या दृष्टिकोण के साथ पाठक की सहमति या एकाकार हो जाय।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
श्री म.रा. दा.पी.जी.कालेज
भुड़कुड़ा, गाजीपुर

Thursday, 14 May 2020

प्रशंसा और निंदा से परे था निर्गुनिया सन्त श्री महन्थ रामाश्रयदास का व्यक्तित्व

किसी भी मत,पंथ,दर्शन तथा साहित्य का मूल्यांकन उसके ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से होता है।धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से समृद्ध ऐसी ही एक निर्गुनिया सन्त परम्परा 'भुड़कुड़ा की सन्त परम्परा 'के रूप में जगत विख्यात है।भुड़कुड़ा गाजीपुर जिला मुख्यालय के पश्चिमी छोर पर जखनियां रेलवे स्टेशन से तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।सत्रहवीं शताब्दी में भुड़कुड़ा आज जैसा नहीं रहा होगा।यह वनों से आच्छादित एक छोटा सा गांव या पुरवा रहा होगा जहां लगभग सन 1687 के आसपास गुरु और शिष्य का आविर्भाव एक साथ हुआ।आचार्य रजनीश इसे गणित की भाषा में युगपत उत्तपत्ति कहते हैं।कालांतर में बूला, गुलाल,और भीखा की इस परम्परा के क्रम में दसवां नाम जुड़ा सन 1919 में जन्मे महन्थ श्री रामाश्रय दास का जिनका पदार्पण पन्द्रह वर्ष की आयु में इस क्षेत्र में हुआ।पुरानी पीढ़ी के कथनानुसार घर से नाराज होकर बालक रामाश्रय रेल मार्ग से काशी जा रहे थे।भूख प्यास से व्याकुल होकर जखनियां स्टेशन पर उतर गए और लोगों ने भुड़कुड़ा की ओर उनको भेज दिया। मठ के तत्कालीन महन्थ श्री रामवरन दास जी ने इन्हें मठ परिसर में आश्रय दिया और आगे चलकर शिष्यत्व भी प्रदान किया।सन 1969 में उनके समाधिस्थ होने के पश्चात श्री रामाश्रय दास इस साधना केंद्र रूपी तीर्थस्थल के पीठाधिपति हुए। रामाश्रय दास जी के अंदर एक सिद्ध सन्त के सारे गुण विद्यमान थे।उनको संतत्व का बोध था।उनका व्यवहार प्रशंसा और निंदा से प्रभावित नहीं था।उनका ज्यादा जोर आत्मनिरीक्षण (Introspection) पर था जिसका प्रमाण उनके द्वारा दुहराई जाने वाली इस उक्ति से मिलता है- मन चाहत बहु युक्ति है,देवैया को यान। हरष विषाद मिटाइके, आतम परखो ज्ञान।। संगीत के साथ वे मानस तथा स्थान के साहित्य के मनन चिंतन में गहरी रुचि रखते थे।श्रीरामचरितमानस में नवधा भक्ति का प्रसंग आता है जिसमें नौ प्रकार की भक्ति का वर्णन सन्त कवि तुलसीदास जी ने किया है।एक साधक के रूप में रामाश्रय दास जी ने मठ की परंपराओं का निर्वहन करते हुए नवधा भक्ति को साध लिया था।वे सत्संगऔर भगवत चिंतन में रत निरभिमानी मुखमण्डल,निष्कपट हृदय,इंद्रिय निग्रह,समता,सरलता जैसे गुणों से परिपूर्ण लोभरहित व्यक्तित्व के स्वामी थे। उनके मुखमण्डल पर निश्छल हँसी तैरती रहती थी और बातचीत के दौरान ताली बजाकर ठहाका लगाते थे।उनका साधारण रहन सहन उनके भीतर बैठी असाधारण आत्मा से जनसामान्य का परिचय और मेलजोल कराता था।स्वतः हारमोनियम बजाते हुए चतुर्भुज साहेब का यह भजन 'प्रभु जी सब विधि चूक हमारी,कीजै लाज सरन आये की ,गुन ऐगुन न बिचारी..'अक्सर गाया करते थे।मठ से इतर शिक्षण संस्थाओं के संचालन में उनकी भूमिका एक अविभावक की हुआ करती थी।सबकी बातों को तल्लीनता से सुनना और संस्था हित की बात लोगों से ही कहलवा लेना उनका विशेष गुण था।समूचा क्षेत्र उनके लिए परिवार जैसा था।सन1972 में अपने गुरु के द्वारा आरम्भ किये कार्य को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने भुड़कुड़ा महाविद्यालय की स्थापना कर ग्रामीण अंचल में रहने वाले अभावग्रस्त छात्रों के लिए उच्च शिक्षा का द्वार खोला।महाविद्यालय की स्थापना के पीछे उनके मन में धन या यश की कामना नहीं थी बल्कि समता,स्वतंत्रता और बन्धु भाव के मूल्य पर आधारित समाज की आधारशिला तैयार करना ही उनका उद्देश्य था।नदी और वृक्ष की भांति उन्होंने सदा समाज को देने का जतन किया समाज को इसका सुफल प्राप्त हो रहा है और दीर्घकाल तक इसकी निरन्तरता भी बनी रहेगी।उनके द्वारा रोपित यह महाविद्यालय सन2022 में पचास वर्ष की यात्रा पूरी करके अपनी स्वर्ण जयंती मनाएगा।दूरस्थ अंचल में रहने वाले लोगों के लिए यह संस्था किसी वरदान से कम नहीं है।महन्थ रामाश्रय दास जी 14 मई 2008 को चिर समाधि में चले गए।उनका निष्कलुष जीवन चरित्र पीढ़ियों को शिक्षा प्रदान करता रहेगा।लोक मंगल के लिए जीने वाले उस महात्मा का स्मरण उनके प्रति सच्ची कृतज्ञता होगी।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
श्री महन्थ रामाश्रय दास पी.जी.कालेज
भुड़कुड़ा,गाजीपुर।

Thursday, 7 May 2020

सरल जीवन की संहिता है बुद्ध का जीवन




आज बुद्ध पूर्णिमा है।भारत वर्ष में धार्मिक व सांस्कृतिक दृष्टि से पूर्णिमा तिथि विशेष महत्व रखती है।बौद्ध धर्म प्रवर्तक गौतम बुद्ध का जन्मदिवस बैसाख मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है।वास्तव में गौतम बुद्ध का जीवन अपने आपमें सरल जीवन जीने की संहिता है जिसमें कर्मकाण्ड का कोई महत्व नहीं है।हमारे धर्मशास्त्र और साहित्य श्रेष्ठ विचारों से भरे पड़े हैं।हमारे महापुरुषों ने अपने जीवन में प्रयोग करके विचारों को प्रतिपादित किया,गौतम बुद्ध  भी उन महापुरुषों में एक हैं।हम उनके विचारों की बात तो करते हैं, किंतु व्यवहारिक जीवन में उसका प्रयोग दूसरों को नीचा दिखाने या ढाल के रूप मेंअपनी गलतियों पर आवरण डालने के लिए करते हैं। उसपर अमल नहीं करते हैं।भगवान बुद्ध के अनुसार जितनी हानि शत्रु-शत्रु की या बैरी-बैरी की करता है उससे कहीं अधिक हानि बुरे मार्ग पर लगा हुआ चित्त करता है (Whatever harm an enemy may do to an enemy or a hater to a hater, an ill-directed mind inflicts on oneself a greater harm.)आज के कठिन समय में घायल और लहूलुहान मानवता के लिए उनके सन्देश बहुत उपयोगी हैं।उनके अप्प दीपो भव का संदेश नई मनुष्यता के जन्म लेने में सहायक हो सकता है।हमें विचारों के आवरण की नहीं बल्कि विचारों के बीज की आवश्यकता है जिससे बीजांकुर फूटे और नई कोंपले बाहर निकलें।बुद्ध ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा तथा तात्विक ज्ञान के साथ नैतिकता का समावेश करके मनुष्यों का पथ प्रदर्शन किया।उनके विचारों ने भारत की भौगोलिक सीमा लांघ कर विदेशों में भी लोगों को प्रभावित किया।श्रीलंका, जावा, सुमात्रा, फिलीपींस,जापान और चीन में लोगों ने बौद्ध धर्म को अपनाया।आधुनिक भारत के ख्याति लब्ध दार्शनिकआचार्य रजनीश ने बुद्ध के सन्देश की बहुत     व्यवहारिक व्याख्या की है ।यूरोप और अमरीका में बौद्ध दर्शन से लोगों को परिचित कराया तो वहीं दूसरी तरफ अपने देश में कुछ लोग उन्हें विष्णु के अवतार के रूप में देखते हैं।बाबा साहेब अंबेडकर उनके सिद्धान्तों पर चलकर बहुजन मुक्ति का मार्ग तलाशते हैं । कुलमिलाकर सबकी अपनी अपनी दृष्टि है और बुद्ध को देखने का सबका अपना नजरिया है लेकिन उनकी स्वीकार्यता के केंद्र में अप्प दीपो भव और अहिंसा परमो धर्म का सिद्धांत है।यह बात जरूर है कि बुद्ध और अम्बेडकर को राजनीतिक दृष्टि से अपनाने वाले लोगों को अन्य भारतीय मतावलम्बियों का बुद्ध के प्रति प्रेम आपत्तिजनक लगता है। यह विचार कि मुझे गाली दी,मुझे मारा, मुझे हरा दिया,मुझे लूट लिया ऐसी बातें जो सोचते हैं और मन में बांधे रखते हैं उनका बैर कभी शांत नहीं होता।प्रेम करुणा दया अहिंसा और ज्ञान पुंज के समुच्चय भगवान बुद्ध के जन्मदिवस पर शुभकामनाएं।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
असिस्टेन्ट प्रोफेसर(अंग्रेजी)
श्री म. रा. दा. पी.जी.कालेज,भुड़कुड़ा
गाज़ीपुर।

Friday, 24 April 2020

गाँव हमारे सामाजिक जीवन के केंद्र



आज 24 अप्रैल को भारत पंचायतीराज दिवस मनाता है।इसकी शुरुआत आज ही के दिन सन 1993 में 73वें संविधान संशोधन के साथ हुई।दरअसल बापू ने ग्राम स्वराज का सपना देखा था और वे मानते थे कि अगर देश के गांवों के ऊपर खतरा पैदा हुआ तो भारत को खतरा होगा।पंचायतीराज व्यवस्था को लागू करने के पीछे यही सोच काम कर रही थी।इसका मक़सद गांव को आत्मनिर्भर बनाना और पूर्ण स्वायत्तता देना था जिससे लोकतंत्र निचले स्तर पर भी पल्लवित पुष्पित हो।असली भारत तो यहां के गांवों में ही बसता है।ब्रिटिश शासक भारत के इन आत्मनिर्भरता के केंद्रों को पूर्णतया विनष्ट करना चाहते थे जिसका आधार बनी 1830 में गवर्नर जनरल सर चार्ल्स मेटकाफ की रिपोर्ट।चार्ल्स मेटकाफ के मुताबिक भारत के ग्राम समुदाय एक प्रकार के छोटे छोटे गणराज्य हैं जो अपने लिए आवश्यक सभी सामग्री की व्यवस्था कर लेते हैं तथा किसी प्रकार के बाहरी सम्पर्क से मुक्त हैं।इस बात को समझकर भारत के गांवों को तबाह करने में अंग्रेज काफी हद तक कामयाब रहे उनके जाने के बाद अपने को गांधी का अनुयायी मानने वाले सत्ता सम्हाले लेकिन गांव की बदहाली बनी रही।आज देश में पंचायती राज व्यवस्था लागू है।लगभग देश की सभी पंचायतें ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क से जुड़ गई हैं।गांव का सरपंच सीधे अपने प्रदेश या देश के नेतृत्व के साथ आज सहजता से संवाद स्थापित कर रहा है।अपने गांव की जरूरत के मुताबिक मुखिया केंद्र या प्रदेश नेतृत्व से परामर्श कर स्थानीय संसाधनों का सही और समुचित प्रयोग कर सकता है।आज बदलाव तो जरूर दिखाई दे रहा है लेकिन यह काफी नहीं है।गांव में शिक्षा, चिकित्सा,और रोजगार के अवसर का उचित प्रबंध करने की आवश्यकता है।आज सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता में गांव ही हैं।यह बात जरूर है कि गांव को भी अपने सरपंच या प्रधान  चुनने में तथा अपनी प्राथमिकता तय करते समय गांव की आत्मनिर्भरता और स्वायत्तता को ही प्रथम वरीयता देना होगा।हमारी ग्रामसभाएं राजनीति का अखाड़ा बन गई हैं जहां प्रधान या सरपंच का चुनाव लोकतंत्र का पर्व न होकर गांव पर कब्जा करने का अवसर बन जाया करता है।  जिस प्रकार ब्लाक प्रमुख और जिलापंचायत के अध्यक्ष का चुनाव सम्पन्न होता है वह किसी से छिपा नहीं है। उसे देखकर यह संशय पैदा होना स्वाभाविक है कि क्या यही परिकल्पना रही होगी पंचायतीराज व्यवस्था का ख़ाका तैयार करते समय?गांव खुशहाल हों,वाद का निबटारा संवाद से हो, आत्मनिर्भरता बढ़े और पलायन रुके इसी आकांक्षा के साथ सभी पंचायत प्रतिनिधियों को दिन विशेष की बधाई।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
पी.जी.कालेज,भुड़कुड़ा,गाजीपुर

Sunday, 19 April 2020

ग्रामीण भारत और प्रवासी मजदूरों की विशेष चिंता का समय

                                                 

पूरी दुनिया कोरोना महामारी से त्राहि त्राहि कर रही है।भारत भी इस संकट से जूझ रहा है।सम्पूर्ण देश में लॉक डाउन है।कुछ लोग भययुक्त वातावरण में घरों में कैद हैं।तो वहीं अपने पसीने की बदौलत स्वयं भूखे रहकर औरों की भूख मिटाने वाले बेबस और बेघर लोग मारे मारे फिर रहे हैं।सपनों की तलाश में गांव से शहर आये इन लोगों को इस महामारी के कारण उपजी सामाजिक असुरक्षा की भावनाअपने गांव जाने हेतु प्रेरित कर रही है जिसके फलस्वरूप ये हत भाग्य नागरिक बन्धु राजनीतिक लोगों के छल का शिकार भी हो रहे हैं।अचानक बस स्टैंड या रेलवे स्टेशन पर जमा भीड़ इस बात का उदाहरण है।इनमें से कुछ राशन की दुकान पर तो कोई बैंक में लाइन लगाए खड़ा है।जनजीवन की सुरक्षा, उदरपूर्ति और बहाली सरकार के लिए चुनौती बनी है।जब कभी मजदूर यूनियन के आवाहन पर या विभिन्न संगठनों के आवाहन पर हड़ताल हुआ करती है तो होने वाले नुकसान का आंकलन किया जाता है तथा हड़ताल वापस कराने का प्रयास भी होता है।लॉक डाउन अपने नागरिकों को सुरक्षित रखने की दृष्टि से सरकार द्वारा समय पर उठाया गया अभूतपूर्व कदम है लेकिन इस लॉक डाउन के दौरान ही हमें इससे होने वाले नुकसान से उबरने के बारे में और इसके खिलाफ कारगर लड़ाई लड़ने की दिशा में गम्भीरता पूर्वक सोचना चाहिए तथा भविष्य का खाका भी तैयार करना होगा।हमें ही नहीं पूरे विश्व को अपनी भौगोलिक सीमाओं का विस्तार करने,भोग बिलास की वस्तुओं का अविष्कार करने ,सामूहिक नरसंहार के हथियार बनाने,खरीदने,बेंचने और शस्त्र निरस्त्रीकरण सन्धि से आगे जाकर विश्व ग्राम की अवधारणा के प्रकाश में मानवता के बारे में सोचने की जरूरत है।संयोग से देश दत्तोपंत ठेंगड़ी जैसे महान विचारक का जन्म-शताब्दी वर्ष भी मना रहा है।उनका चिंतन अमल में लाने की आवश्यकता है।अगर देश की  सरकार इस बात का स्मरण रखते हुए नीतियों का निर्धारण करेगी कि 'जीविका के लिए जीवन रेहन न रखना पड़े,रोटी इंसान को न खाए 'तब जाकर हम कोरोना के दूरगामी कुप्रभाव से मुक्ति पाएंगे।देश के संसाधन मनुष्य की आवश्यकता पूर्ति के लिए हैं उसके लोभ की पूर्ति या आधिपत्य के लिए नहीं।समय कठिन और चुनौतीपूर्ण जरूर है लेकिन ठेंगड़ी जी के उपरोक्त कथन के केंद्र में जो वर्ग है उसका विशेष ध्यान सरकार को रखना होगा।यही वह वर्ग है जो देश को हमेशा सम्हालता है,आज भी सम्हाले है और आगे भी सम्हालने की कूबत रखता है।हमें बाजारवाद की अवधारणा ने स्वार्थी तरीके से इनके श्रम की शक्ति का बाजार हित मे प्रयोग करना सिखाया जिसके परिणाम स्वरूप इनकीआत्म निर्भरता समाप्त हुई और असन्तुलन बढ़ता गया।आज अवसर है कृतज्ञ भाव से इनको शोषण मुक्त कर इनका सहयोग किया जाय।इनके परिश्रम का सही मोल चुकाया जाय।आज यही वह वर्ग है जो सिर्फअपनी उदरपूर्ति की चिंता में नहीं डूबा है।वह महामारी की भयावहता से अनजान नहीं है लेकिन उसे इस बात की परवाह है कि येन केन प्रकारेण उसका भी पेट पर्दा चलता रहे और लोगों तक सब्जी अनाज दूध पहुंचता रहे।वह मास्क, सेनेटाइजर, और सोशल डिस्टेंसिग की बहसों में  नहीं उलझा है और न ही वह पत्थरबाजी या कोरोना कैरियर बनने में मशरूफ है।उसे तकरीरों और जलसों से भी कुछ लेना देना नहीं है।उसे सम्पूर्ण जीवजगत की चिंता है लेकिन सूबे की सरकारें उन्हें प्रवासी मजदूर से ज्यादा नहीं देख या समझ पा रहीं।सरकार और समाज का यह दायित्व बनता है कि संकट काल मे ग्रामीण भारत और प्रवासी मजदूर  की संज्ञा धारण करने वालों की विशेष चिंता करें जो ठोकरें खाकर,अपनी वास्तविक पहचान खो कर और अपमान का घूंट पीकर भी सड़क,पुल, भवन निर्माण में सतत संलग्न रहने वाले हैं और सदा उत्पाद- उपभोक्ता के बीच की कड़ी बनकर  देश के लिए श्रेष्ठ योगदान दिया है।उनके प्रति संवेदनशील बने रहना लॉक डाउन के बाद की समस्या का समाधान बनेगा।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
पी.जी.कालेज,भुड़कुड़ा, गाजीपुर

Friday, 17 April 2020

भूतपूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर के अनुसार जज्बातों को उभार कर देश की समस्याओं का समाधान नहीं किया जा सकता



अपनी बेबाकी के लिए मशहूर,बलिया के बाबूसाहब, अभूतपूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर जी की आज जन्मजयंती है।भारतीय राजनीति के इस पुरोधा को देश कभी भुला न सकेगा।उनके विचारों की रौशनी देश को रास्ता दिखाने की सामर्थ्य रखती है।साधारण परिवार में जन्मे असाधारण व्यक्तित्व के स्वामी चन्द्रशेखर को पक्ष और विपक्ष बड़े गौर से सुनता था और उनकी अहमियत भलीभांति समझता था।आज सार्वजनिक जीवन और संसदीय राजनीति में ऐसे व्यक्तित्व का अभाव खटकने वाला है।वर्तमान समय में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच की तल्खियां जग जाहिर हैं।संसद में खड़े होकर एक बार उन्होंने चेतावनी भरे लहज़े में  कहा था कि हम नहीं जानते कब किससे जनतंत्र में मदद लेनी पड़ जाय।किसी के चरित्र को गिरा देना आसान है,किसी के व्यक्तित्व को तोड़ देना आसान है लेकिन वैसा किरदार गढ़ना बेहद कठिन है।आज के परिवेश में उनकी कही बात को न केवल समझना होगा बल्कि अमल भी करना होगा।आज संकट के दौर में  राजनीतिक नेतृत्व की खामियां गिनाने और खूबियों का बखान करने में समय गंवाने का नहीं।कोरोना जैसी महामारी के खिलाफ प्रभावी लड़ाई लड़ने के लिए सम्पूर्ण देश को एकदूसरे की मदद के लिए आज खड़े रहने की आवश्यकता है।हमें यह समझना होगा कि राजनीति मुद्दों पर आधारित हो । व्यक्तिगत कटुता और प्रतिशोध के लिए उसमें स्थान नहीं होना चाहिए।कई बार हम जिन विचारों से सहमत नहीं होते हैं उनके नेक कार्यों की अवहेलना करते हुए तर्कहीन निंदा करना आरम्भ कर देते हैं।सम्भव है इससे क्षणिक लाभ मिल जाय लेकिन देश का दीर्घकालिक हित इससे नहीं सधेगा।जज्बातों को उभार कर सरकारें बनाई बिगाड़ी जा सकती हैं लेकिन समस्याओं को नहीं सुलझाया जा सकता ।।हमें अच्छे को अच्छा कहने की आदत डालनी होगी और गलत बातों के विरोध का साहस भी समय समय पर प्रदर्शित करना होगा।युवा तुर्क के लिए समाजवाद मुखौटा नहीं था ।चन्द्रशेखर जी समाजवाद की विचारधारा को जीने वाले व्यक्ति थे,धार्मिक ध्रुवीकरण की मुखालफत करते थे,उदारीकरण और स्वदेशी जैसे परस्पर विरोधी पहल पर सरकार से प्रश्न खड़ा करते थे लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेक कार्यो की सराहना से भी नहीं चूकते थे।उन्नीस सौ निन्यानबे में भरे सदन में खड़े होकर उन्होंने मुक्तकंठ से यह स्वीकार किया कि संघ से हमारा जितना भी विरोध हो वह संगठित,निष्ठावान,संकल्प वाले नवयुवकों का एक संगठन है। प्रधानमंत्री के तौर पर हिंदुत्व के बारे में अपने दृष्टिकोण को उन्होंने सार्वजनिक किया था । प्रतिपक्षी सांसद के रूप में उन्होंने सदन में कहा था कि मुझे इस बात का अभिमान है कि मैं हिन्दू हूँ।सच कहा जाय तो चन्द्रशेखर जी संघर्षों की पैदाइश थे।खुद से रास्ता बनाते हुए बढ़ते गए और राजनीति के शीर्ष पर पहुंचे।प्रधानमंत्री रहते हुए कभी भी वे प्रधानमंत्री निवास में सुख सुविधा भोगने के उद्देश्य से नहीं रहे।दिल्ली से दूर भोंडसी आश्रम ही उनका ठिकाना था।देश के प्रधानमंत्री के रूप में उन्हें अल्प अवधि के लिए सेवा का अवसर प्राप्त हुआ लेकिन कई कारणों से यह कार्यकाल काफी महत्वपूर्ण है। इब्राहीम पट्टी से दिल्ली की दूरी तय करना आसान काम नहीं था।जन्मदिन के अवसर पर सादगी पसन्द सच्चे समाजवादी नायक को कोटिशः नमन।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
पी.जी.कालेज,भुड़कुड़ा-गाजीपुर