(गांधी जयंती के विशेष संदर्भ में)जन्मजयंती के अवसर पर महात्मा गांधी का केवल स्मरण पर्याप्त नहीं है।आज गांधी को उसी तरह से जीने की जरूरत है जैसे उनको आज ही के दिन पैदा हुए पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने जिया।अगर हम सचमुच गांधी से प्रेम करते हैं तो उनके बताए मार्ग पर चलने की आवश्यकता है अर्थात सरल जीवन जीने की कठिन साधना करना होगा।गांधी के सिद्धांतों की दुहाई देते हुए उसके ठीक विपरीत व्यवहार करना और निजी स्वार्थ के लिए जानबूझकर उसकी गलत व्याख्या प्रस्तुत करना समाज को छलना है।गांधी ने प्राचीन धर्मग्रन्थों का गहनता से अध्ययन किया था।श्रीमद्भगवद्गीता उनकी प्रिय पुस्तक थी जिसका वे नियमित वाचन करते थे तथा निष्काम कर्मयोग के सिद्धांत को जीवन में आत्मसात कर लिया था।उन्होंने जीवनपर्यन्त अपनी संस्कृति को जानने की कोशिश की,त्याग के महात्म को समझा और उसे जिया।सेवा का वरण किया समीकरण बैठाने में अपनी ऊर्जा का उपयोग नहीं किया बल्कि सत्य का प्रयोग किया।इसके बाद भी अगर गांधी में कोई दोष ढूंढता है तो यही कहा जायेगा कि उसके पास ज्ञानचक्षु का अभाव है।सनातन धर्म में जो चीज गलत समझ में आयी उसके परिष्करण के लिए प्रयास किया लेकिन धर्मांतरण नहीं किया।सनातन धर्म की मर्यादा का अनुपालन करते हुए गांधी अन्य धर्मावलम्बियों को सहज स्वीकार थे तथा अन्य धर्मावलम्बी गांधी को।देश को आजाद कराने के साथ वे समाज मे व्याप्त बुराइयों को समाप्त कर स्वस्थ समाज गढ़ने के लिए प्रयासरत रहे।विस्तीर्ण चिंतन के कारण वर्णाश्रम व्यवस्था में व्याप्त दोषों का निवारण उनका लक्ष्य था मगर वे वर्णाश्रम व्यवस्था को ही समाप्त कर देना नहीं चाहते थे।दुनियां में कोई भी व्यवस्था दोषरहित नहीं है।कुछ न कुछ कमियां होती हैं।उन कमियों को चिन्हित करके दूर करने की कोशिश करना चाहिए।उन्होंने आजादी दिलाने के अलावा जीवनभर भारतीय समाज की उन कमियों को चिन्हित करने और दूर करने का काम भी किया जो भारतीय समाज के माथे का कलंक थीं।जाति विहीन समाज की बात करने वाले गांधी का नाम तो जपते हैं लेकिन प्राचीन धर्मग्रंथों का विरोध करते हैं,संस्कृत भाषा का विरोध करते हैं,शास्त्रीय परम्पराओं का विरोध करते हैं और जातीय अस्मिता के आधार पर अपनी गोलबंदी भी जारी रखते हैं।समाज के ऐसे स्वार्थी तत्वों द्वारा लोक की बात करते हुए वेद का विरोध करना पाखंड नहीं है तो और क्या है।गांधी ने पाखंड का विरोध किया स्वस्थ परम्परा का नहीं।उन्होंने जाति आधारित भेदभाव मिटाने का यत्न किया जाति व्यवस्था समाप्त करना उनका लक्ष्य नहीं था। वे लोक और वेद को साथ साथ लेकर चलते थे क्योंकि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।गांधी के अनुसार 'अस्पृश्यता की बुराई से खीझकर वर्ण-व्यवस्था का ही नाश करना उतना ही गलत होगा ,जितना कि शरीर में कोई कुरूप-वृद्धि हो जाय तो शरीर का या फसल में ज्यादा घास-पात उगा हुआ दिखे तो फसल का ही नाश कर डालना।इसलिए अस्पृश्यता का नाश तो जरूर करना है।सम्पूर्ण जाति(वर्ण)व्यवस्था को बचाना हो तो समाज में बढ़ी हुई इस हानिकारक बुराई को दूर करना ही होगा....ज्यों ही अस्पृश्यता नष्ट होगी,जाति व्यवस्था स्वयं शुद्ध हो जाएगी,..।' उनको पारम्परिक तरीके के गांव प्रिय थे जो आत्मनिर्भर , स्वावलम्बी और स्वायत्तशासी हों।आज कोरोना की चपेट में आने पर गांवों ने ही देश को सम्हाला है।गांव की शक्ति का ,सामाजिक तानेबाने का बोध गांधी को बखूबी था।कुछ लोग उस समय भी गांव के स्वरूप को ठीक नहीं समझते थे क्योंकि एकांगी दृष्टि के कारण उन्हें गांव का सहकार और सौंदर्य नहीं दिखता था।उनका जोर शहरीकरण ,औद्योगिकरण पर था।उनका मानना था कि गांव समाप्त होंगे तो जाति अपने आप समाप्त हो जाएगी।लेकिन अंधाधुंध शहरीकरण ने सहकार को समाप्त करके जीवन को अभिशप्त बना दिया यह भी किसी से छिपा नहीं है।शहरी जीवन में असमानता, भेदभाव भी खूब बढ़ा है।केवल जातिविहीन समाज बनाने के उद्देश्य से शहरीकरण की ओर उन्मुख होने वाला चिंतन सदैव अप्रासंगिक था।इस देश के लिए गांधी का मार्ग अपरिहार्य है।सामाजिक समरसता के लिए गांधी को अमल में लाने की आवश्यकता है।उनके अनुसार ,'इतिहास की दृष्टि से जाति प्रथा को भारतीय समाज की प्रयोगशाला में किया गया मनुष्य का ऐसा प्रयोग कहा जा सकता है,जिसका उद्देश्य समाज के विविध वर्गों का पारस्परिक अनुकूलन और संयोजन था।' जाति मिटाने की बात करने वाले इस देश में जातियों के सम्मेलन करने लगे,संविधान में जातिगत आरक्षण का उल्लेख कहीं भी न होने के बावजूद जातिगत आरक्षण राजनीतिक स्वार्थ में बंटना शुरू हो गया और इसका नामकरण सामाजिक न्याय कर दिया गया।अपनी अपनी जाति के मतदाताओं को सहेजने का काम करने वाले सामाजिक न्याय के योद्धा हो गए।देश पीछे छूट गया।कैलाश गौतम के शब्दों में 'का बतलाईं कहै सुनै में सरम लगत हव गांधी जी/तोहरे घर क रामै मालिक सबै कहत हौ गांधी जी।' हत्या, बलात्कार, अपहरण, लूट,आगजनी, हिंसा जैसे अमानवीय कृत्य आएदिन हो रहे हैं।हाल में ही हाथरस की घटना ने समूचे देश को शर्मसार कर दिया है।इस कठिन घड़ी में गांधी का याद आना स्वाभाविक है।मजे की बात यह भी है कि गांधी पर सबका दावा है,गांधी भी सबके हैं लेकिन गांधी का कोई नहीं ।प्रकृति के साथ जीवन जीना ही गांधी को जीना है तथा विकृति के साथ जीना मानवता के विरुद्ध जीना है,गांधी के विरुद्ध जाना है।गांधी मानवता के पुजारी थे। गांधी के जन्मदिन पर प्रकृति के साथ जीने का संकल्प कोरोना ही नहीं अन्य आपदाओं से लड़ने की शक्ति देगा तथा उनके विचारों की शक्ति बढ़ते वैमनस्य,हिंसा ,घृणा को दूर करेगी।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
असिस्टेन्ट प्रोफेसर, अंग्रेजी
श्री म. रा. दा.पी.जी.कालेज,भुड़कुड़ा,गाजीपुर
Saturday, 3 October 2020
का बतलाईं कहै सुनै में सरम लगत हौ गांधी जी ...
Monday, 14 September 2020
व्यापक दृष्टिकोण और तकनीक का प्रयोग हिंदी को बनाएगा विश्वव्यापी
आज हिंदी दिवस है और इसे मनाने की परिपाटी देश में 14 सितम्बर 1953 से शुरू हुई ।हिंदी के हिमायती सभा संगोष्ठियों के माध्यम से इस दिन हिंदी का गुणानुवाद करते हुए इसे वैश्विक स्तर पर स्थापित करने की चर्चा करते हैं। पिछली बार के हिंदी दिवस से इस बार का आयोजन भिन्न होगा क्योंकि इस बार सबकुछ आभासी पटल पर होगा।वैश्विक महामारी कोरोना के कारण स्कूल,कॉलेज, रेल सब बंद हैं।कवि सम्मेलनों और संगोष्ठियों में लोगों का इस बार इकट्ठा होकर हिंदी के प्रति प्रेम और समर्थन प्रदर्शित करना सम्भव नहीं है।हिंदी के प्रसार के लिए कुछ न कुछ प्रयास निरन्तर चल रहा है लेकिन यह पर्याप्त नहीं है।इतना सब कुछ होने के बाद भी हिंदी को लेकर गम्भीर प्रयास और ठोस नीतियों की आवश्यकता है।हम आजादी के पचहत्तर साल मनाने की ओर अग्रसर हैं लेकिन राष्ट्र भाषा हिंदी को वह सम्मान नहीं दे पाए जिसकी वह अधिकारिणी है।तकनीक के प्रयोग ने हिंदी को विश्वव्यापी बनाने में अप्रतिम योगदान दिया है।इन दिनों ई पत्रिकाओं का प्रकाशन हो रहा है,वेबिनार का आयोजन हो रहा है ,फेसबुक और व्हाट्सएप द्वारा हिंदी में अभिव्यक्ति हो रही है तथा संचार माध्यमों के बल पर व्याख्यान का सजीव प्रसारण भी हो रहा है।हिंदी का प्रयोग निःसन्देह बढ़ा है लेकिन भाषा के स्तर में अत्यधिक गिरावट आई है। भाषा के प्रयोग से उसका प्रवाह बना रहता है लेकिन भाषा के मर्म को समझना अत्यंत आवश्यक है।किसी भी भाषा को पहचान और प्रतिष्ठा उस भाषा मे रचे गए साहित्य से प्राप्त होती है।हिंदी की साहित्य सम्पदा विशाल है और अभिव्यक्ति की सामर्थ अद्वितीय है।इसी कारण हिंदी ने विदेशी विद्वानों को अपनी ओर आकृष्ट किया।बेल्जियम के फादर कामिल बुल्के यहां आने के बाद हिंदी और हिंदुस्तान के हो कर रह गए।उन्होंने हिंदी के लिए जो कार्य किया वह मील का पत्थर साबित हुआ।वे 'राम कथा उतपत्ति और विकास' का चार भागों और इक्कीस अध्याय में सृजन कर अमरत्व को प्राप्त किये।भारत का हिंदी में विरचित सन्त साहित्य सदैव विदेशियों के आकर्षण का केंद्र रहा है।सुर, कबीर ,तुलसी ,मीरा ,जायसी, रसखान,रविदास, नानक, मलूक ,दादू फरीद सहित अनेक सगुण और निर्गुण धारा के कवियों ने हिंदी को ऊंचाई दी और ज्ञान भक्ति प्रेम का संदेश दिया ।आजमगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार और हिंदी सेवी श्री जगदीश प्रसाद बरनवाल ने विदेशी विद्वानों का हिंदी प्रेम शीर्षक से पुस्तक लिखी है जिसमें उन्होंने उनके अवदान को रेखांकित किया है।वर्ष 2008 में एक जर्मन युवक तिल लुगे ने शुभा मुद्गल द्वारा प्रस्तुत भजन से रीझ कर हिंदी में शोध की ठानी।अपने शोध के सिलसिले में वह गाजीपुर स्थित निर्गुनिया सन्तों की तपस्थली भुड़कुड़ा आ पहुंचा।वह युवक निर्गुनियां सन्त बूला, गुलाल और भीखा से बेहद प्रभावित था।कारण यह कि सन्त कवियों ने सही और खरी बातों को निर्भीकता के साथ समाज के सामने समय समय पर रखा है।उन्होंने बिगाड़ के डर से सत्य कहने से परहेज नहीं किया। जो लोग आज अपने को हिंदी सेवी कहते हैं उन्हें इस बात का अवश्य स्मरण रखना चाहिए कि निज भाषा के समर्थन में बोलने से अन्य भाषाभाषियों के प्रति विद्वेष ध्वनित न हो।देश के भीतर और बाहर गैर हिंदी भाषी क्षेत्र के लोगों संग आत्मीयता ,उनके साहित्य का हिंदी में रूपांतरण ,हिंदी में रचे गए साहित्य का उनकी भाषा में रूपांतरण एक दूसरे को नजदीक ले आएगा और आत्मीयता बढ़ेगी।इससे भाषाई समझ विकसित होने के साथ राष्ट्र भाषा के विकास में सहायता मिलेगी।हिंदी के बढ़ते प्रभाव का ही परिणाम है कि धोती,कुर्ता,पायजामा जैसे बहुत से शब्द अंग्रेजी भाषा में शामिल कर लिए गए हैं और स्टेशन, बैंक, प्लेटफॉर्म जैसे अंग्रेजी भाषा के शब्दों का हिन्दीकरण हो गया है।अगर हिन्दी भाषियों के व्यवहार में अन्य भाषाभाषियों के प्रति दुराग्रह,घृणा,विद्वेष का भाव ध्वनित होगा तो इससे हिंदी की स्वीकार्यता को नुकसान होगा।एक तरफ हिंदी को वैश्विक मंच पर समृद्ध साहित्यिक विरासत के आधार पर स्थापित करने की वकालत हो रही है तो वहीं अपने ही देश में हिन्दी मानस को दो धड़ों में बांट कर एक दूसरे के खिलाफ खड़ा कर लड़ाने का प्रयास भी खूब चल रहा है।मानवीय मूल्यों से युक्त सर्वकालिक श्रेष्ठ साहित्य को आलोचना और प्रगतिशीलता के नाम पर कुंठा की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया जा रहा है।वर्तमान में सगुण साहित्य और साहित्यकारों पर दलित विरोधी,स्त्री विरोधी,साम्प्रदायिक होने का आरोप लगाकर निर्गुण साहित्य और साहित्यकारों को ढाल या मुखौटा के रूप में स्वार्थी तत्वों द्वारा अपने समर्थन में प्रयोग किया जा रहा है।कबीर ने रूढ़ियों के खिलाफ आवाज बुलंद की उसमें क्या हिन्दू और क्या मुसलमान,सब बराबर हैं उनकी दृष्टि में।लेकिन कबीर का नाम लेकर सगुण सन्त साहित्य की आलोचना करने वाले रूढ़ियों के खिलाफ न बोलकर आस्था पर प्रहार करते दिखते हैं।जिस ग्रन्थ में 'परहित सरिस धरम नहिं भाई' का स्वर सुनाई देता हो उसे कैसे लांछित किया जा सकता है?अगर हम स्वार्थ और संकीर्णता से बाहर निकलकर सोचेंगे तो हिंदी का विकास तय है।अन्यथा प्राचीन साहित्यिक विरासत को नए लेखकों और आलोचकों द्वारा अमान्य घोषित करना हिंदी के प्रसार में बाधक बनेगा।यह तर्क बेबुनियाद है कि स्त्री स्त्री के बारे ,में दलित दलित के बारे में, हिंदी पढ़ने पढ़ाने बोलने वाला हिंदी के बारे में सटीक अभिव्यक्ति कर सकता है।ऐसी सोच रखने वाले लेखक हिंदी के साथ छल कर रहे हैं।अगर साहित्य मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति है तो इसके लिए स्त्री ,पुरुष ,दलित ,गैर दलित, हिंदी बोलने समझने वाला ,गैर हिन्दी भाषी की जगह मनुष्य होना पर्याप्त है।मुंशी प्रेमचंद का कायस्थ होना दलित सम्वेदनाओं की अभिव्यक्ति में कैसे बाधक हो सकता है भला?उनका कथा साहित्य उनकी गहन अंतर्दृष्टि और संवेदना का जीवंत उदाहरण है ।आधुनिक युग मे हरिवंशराय बच्चन और रघुवीर सहाय का नामोल्लेख करना समीचीन होगा।उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी का अध्यापन किया और हिदी की सेवा किये।डॉ. रामविलास शर्मा अंग्रेजी से एम. ए. थे और हिंदी साहित्य का सबसे प्रामाणिक इतिहास उन्होंने लिखा।अज्ञेय एक प्रगतिशील कवि और लेखक के रूप जाने जाते हैं लेकिन उन्होंने अंग्रेजी विषय मे परास्नातक की उपाधि प्राप्त की थी।उन्होंने पत्रकारिता,सम्पादन और लेखन हिंदी में किया।हिंदी को सिर्फ हिंदी पट्टी या हिंदी बोलने वालों तक सीमित करके देखना इसके विकास में बाधक तो है ही इसके साथ अन्याय भी होगा।
Wednesday, 26 August 2020
महामण्डलेश्वर स्वामी भवानीनन्दन यति का सिद्धपीठ हथियाराम में राधाष्टमी के दिन मनाया गया अवतरण दिवस
सिद्धपीठ हथियाराम के महन्थ ,पूज्यपाद, महामण्डलेश्वर भवानीनन्दन यति महाराज का अवतरण दिवस भादों मास के शुक्लपक्ष अष्टमी तिथि को समारोह पूर्वक मनाया जाता है।इस वर्ष कोरोना महामारी के कारण भिन्न प्रकार की परिस्थितियां हैं ।यद्यपि आपका जन्म देवभूमि उत्तराखंड में हुआ था किंतु पूर्व आश्रम में आपने वेद और व्याकरण की शिक्षा गुरुकुल पद्धति से काशी में रहकर प्राप्त की।हथियाराम मठ के तत्कालीन महन्थ स्वामी बालकृष्ण यति जी का सानिध्य और आशीर्वाद आपको प्राप्त हुआ। 26वें पीठाधीश्वर के रूप में सिद्धपीठ हथियाराम गाजीपुर की धरती पर 23 फरवरी 1996को आपका आगमन हुआ। भारतवर्ष में विभिन्न स्थानों पर ऋषियों मुनियों ने साधना की है।काशी परिक्षेत्र में स्थित यह आध्यात्मिक केंद्र भी लगभग आठ सौ वर्षों से अपनी आभा विखेर रहा है।समय समय पर यहां दिव्य आत्माओं का जगत कल्याणार्थ अभ्युदय हुआ और उन्होंने पारम्परिक तरीके से जन सामान्य के बीच जाकर सन्मार्ग पर चलने की शिक्षा दी।हमारे यहां ऋषि शब्द अत्यधिक प्रचलित है।ऋषि वह व्यक्ति है जिसने अनुभूति से जाना हो अर्थात रियलाइजेशन या साक्षात्कार किया हो ।भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार क्या करना है और क्या नहीं करना है इसके लिए शास्त्र प्रमाण हैं 'तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ' लेकिन शास्त्र के लिए प्रमाण अनुभूति है।जिन्हें अनुभूति नहीं हुई उनको बताने समझाने का कार्य ऋषियों ने और उनके द्वारा रचे गए शास्त्रों ने किया है।भवानीनन्दन यति जी एक सिद्ध साधक और अनुभोक्ता के रूप में धर्म संस्कृति को बचाये और बनाये रखने हेतु सतत प्रयत्नशील हैं।आप त्याग ,करुणा और श्रद्धा की त्रिवेणी हैं।आपने अथक परिश्रम से गौरवशाली परम्परा का निर्वहन करते हुए समाज को दिशा देने का यत्न किया है।उनका मानना है कि विद्वत्ता प्राप्त करने से ज्यादा महत्वपूर्ण है हम सज्जनता को अंगीकार करें।जिस कार्य को रावण शास्त्र का ज्ञाता होते हुए भी नहीं कर सका उसे शबरी ने सहज प्राप्त कर लिया।हिन्दू मान्यताओं के अनुसार आदि शंकराचार्य ने अखाड़ों को बनाया तथा साधुओं और सन्यासियों को कुछ अखाड़ों में बांटा गया।जूना अखाड़ा सबसे बड़ा अखाड़ा है ।इस अखाड़े में सन्यासियों की संख्या चार लाख से भी ज्यादा है।स्थापना के समय अखाड़ों का मुख्य उद्देश्य देश के प्राचीन मंदिरों और धार्मिक लोगों को अन्य धर्मों के आक्रमणकारियों से बचना था।भवानीनन्दन यति जी जूना अखाड़े के वरिष्ठ महामण्डलेश्वर के रूप में राम मंदिर आंदोलन की गतिविधियों से जुड़े रहे और आजदिन भी सनातन धर्म की ध्वजा लेकर धार्मिक अनुष्ठानों द्वारा देश के कोने कोने में भटके हुए लोगों को मानवता की राह दिखा रहे हैं।उनका अवतरण दिवस मठ के अनुयायियों के लिए एक उत्सव का दिन है।स्वामी भवानीनन्दन यति जी का आध्यात्मिक व्यक्तित्व अत्यंत प्रिय एवं विशाल है।ईश्वर एवं धर्म के प्रति रागात्मक वृत्ति बनाये रखने में इनका सानिध्य दीर्घ काल तक प्रेरणादायी बना रहे।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
असिस्टेन्ट प्रोफेसर, अंग्रेजी
श्री म. रा. दा.पी.जी.कालेज,भुड़कुड़ा, गाजीपुर
Wednesday, 12 August 2020
जम्मूकश्मीर में लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना होगी नवनियुक्त उपराज्यपाल की शीर्ष प्राथमिकता
पिछले दिनों मोदी मंत्रिमंडल के साथी रहे श्री मनोज सिन्हा को जम्मू कश्मीर का उपराज्यपाल नियुक्त किया गया।यह नियुक्ति राष्ट्रीय राजनीति की एक महत्वपूर्ण घटना है।यह एक अहम संवैधानिक दायित्व है जिसके लिए धोती कुर्ता और गमछा में साधारण से दिखने वाले असाधारण प्रतिभा सम्पन्न श्री सिन्हा को उपयुक्त समझा गया।राजनीतिक मंचों और सदन के पटल पर भाषा की शालीनता के माध्यम से अपनी जवाबदेही का एहसास कराने वाले श्री मनोज सिन्हा का व्यक्तित्व राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा के केंद्र में रहा है।भारतीय राजनेताओं को मोटे तौर पर दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है ।एक वह वर्ग जो विरासत को सम्हालते हुए राजनीति के मैदान में अपना दखल और दबदबा रखता है और अपनी राजनीतिक विरासत को आने वाली पीढ़ी को सुपुर्द करने का अभिलाषी है।दूसरा वह वर्ग है जो संघर्ष की कोख से पैदा हुआ है और राष्ट्रीय क्षितिज पर न केवल धूमकेतु की तरह दिखा और ओझल हो गया,बल्कि अपने काम की बदौलत स्वयं को हार जीत से आगे ले जाकर अपनी प्रासंगिकता बनाये हुए है।उसे अपने बच्चों को राजनीति में स्थापित करने की चिंता नहीं रहती।बेदाग छवि उसकी अपनी कमाई है।जनता से उसी की भाषा में सीधा,सहज संवाद स्थापित करना उसका राजनीतिक कौशल है।राजनीति को अपराधियों के चंगुल से मुक्त कराने का जिसका मिशन हो।कथनी और करनी में अंतर वाली राजनीतिक संस्कृति को समाप्त करने पर उसका पूरा जोर रहता हो।सीधे तौर पर कहा जाय कि राजनीति उनके लिए तिजारत नहीं सेवा का माध्यम है।इन खूबियों से युक्त कोई और नहीं वह मनोज सिन्हा ही हैं जिन्होंने अपने राजनीति की शुरुआत छात्र जीवन से की। उनके शिक्षक पिता पुत्र के राजनीति में प्रवेश से प्रसन्न नहीं थे परन्तु नियति को कौन जानता है? छात्र संघ का पहला चुनाव हारने के बाद वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के बैनर तले वर्ष 1982 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के छात्र संघ अध्यक्ष चुने गए और यही उनके राजनीति में उतरने का प्रस्थान विंदु बना।यद्यपि आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी ने वर्ष 1996 के लोकसभा चुनाव में श्री मनोज सिन्हा को गाजीपुर से प्रत्यासी के रूप में मैदान में उतारा और वे जीत दर्ज कर पहली बार सांसद बने।1999 में दुबारा गाजीपुर लोकसभा के लिए चुने गए और अपनी विकास निधि का जनहित के लिए भरपूर प्रयोग करने के अलावा तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी के संरक्षकत्व में राजनीति की अन्य बारीकियों के साथ दलगत सीमा से परे स्वीकार्यता का गुण सीखा।2004 का चुनाव भाजपा और श्री मनोज सिन्हा के लिए अनुकूल परिणाम नहीं दिया लिहाजा पार्टी सत्ता से बाहर हो गई।सत्ता का वनवास झेल रही भारतीय जनता पार्टी ने एक दशक बाद वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जोरदार वापसी की और मनोज जी भी गाजीपुर से चुनाव जीतकर मंत्रिमंडल में जगह बनाने में कामयाब हुए।उन्होंने भारत सरकार के संचार राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार और रेल राज्यमंत्री के रूप में पद और गोपनीयता की शपथ लेकर विभिन्न परियोजनाओं के माध्यम से राष्ट्रीय फलक पर काम करते हुए समूचे पूर्वांचल की तस्वीर बदलने का विशेष प्रयास आरम्भ किया जिसका परिणाम जल्द ही सतह पर दिखने लगा।फलतः मनोज सिन्हा एक जननेता और विकास पुरूष के रूप में लोगों के दिलोदिमाग पर छा गए। उनके काम को देखकर धुर राजनीतिक विरोधी भी भले ही उनकी आलोचना करते हों लेकिन उनके कामों की अनदेखी नहीं कर सकते। सबका साथ सबका विकास की थीम पर काम करते हुए जिस तरह से श्री सिन्हा ने भारत सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं को ईमानदारी से जमीन पर उतारने का प्रयास किया उससे वर्ष 2019 में गाजीपुर से मिली चुनावी असफलता के बावजूद केंद्रीय नेतृत्व का विश्वास और भरोसा बरकरार रखने में वे कामयाब रहे।उपराज्यपाल के रूप में प्रशासनिक अनुभव वाले व्यक्ति का स्थानापन्न एक सुलझे राजनीतिक अनुभव वाले व्यक्ति को बनाना यह संकेत देता है कि घाटी में सामाजिक ,सांस्कृतिक और लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना की दिशा में केंद्रीय नेतृत्व बेहद गम्भीर है।अपनी कार्यशैली से श्री मनोज सिन्हा ने हमेशा अपनी उपयोगिता साबित की है और विषम परिस्थितियों में भी यह सिद्ध किया है कि चुनौतियों से निपटना उन्हें भलीभांति आता है।जब जब उनके जीवन में ठहराव की स्थिति बनी और राजनीतिक पंडितों ने उनके पारी को समाप्त माना तब तब उन्होंने सारे अनुमान को झुठलाते हुए न केवल जोरदार वापसी की बल्कि आशातीत परिणाम भी दिए।उनको नजदीक से जानने वाले मानते हैं कि वे हार मानने वाले व्यक्ति नहीं हैं।स्वाभाविक रूप से राजनीति में नई जिम्मेदारी अपने साथ नई चुनौतियां भी लेकर आती है।धारा 370 समाप्त हुए एक वर्ष का समय बीत गया है तथा समरसता का वातावरण निर्मित करने के लिए इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत के सिद्धांत को अमलीजामा पहनाने का श्री सिन्हा के पास सुनहरा अवसर है।घाटी में अमन चैन स्थापित करना श्री सिन्हा के लिए शीर्ष प्राथमिकता होगी।इस उद्देश्य की प्राप्ति लोकतांत्रिक तरीके से ही सम्भव है।अलगाववादियों के मंसूबे को नाकाम करते हुए लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बहाली में उनका लंबा राजनीतिक अनुभव सहायक सिद्ध होगा।केशर की क्यारी कहा जाने वाला कश्मीर बम ,बंदूक और ख़ून ख़राबा से मुक्त होगा।लम्बे समय से भययुक्त वातावरण में अभिशप्त जीवन जी रहे कश्मीरी नागरिकों को भयमुक्त कराने का जिम्मा श्री मनोज सिन्हा का होगा जिनके सरपरस्ती में कश्मीरी नागरिक अपनी लोकतांत्रिक शक्तियों का प्रयोग करते हुए अपने सपनों में रंग भर सकेंगे।उम्मीद यही है कि राजनीतिक स्वार्थ के कारण दोजख हो चुकी आम कश्मीरी की जिंदगी नए बगवां के हाथों में पुनः जन्नत बनेगी।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
असिस्टेन्ट प्रोफेसर, अंग्रेजी
श्री म.रा. दा. पी.जी.कॉलेज, भुड़कुड़ा,गाजीपुर
Tuesday, 11 August 2020
Lord Krishna:An Apotheosis of Love and Bliss
Wishing you all a very happy Shri Krishna Janmashtami.According to our religious belief,Lord Krishna was born in the month of Bhadrapad on Ashtami Tithi .It was a rainy season.We are well acquainted with the story of Lord krishna and his birth in jail.He is a very popular Hindu God all over the world and is known by several names as Madhav, Yogeshvar,Kanha, Gopala Keshav, Muralidhar, Nandlala etc.His early childhood fascinates saints, creative artists, poets and authors ,and his heroic deeds are the source of religious faith and inspiration to his devotees.We get the glimpse of Krishna in every child.The reason is that every child is innocent and full of love.Krishna is described as a 'Navneet Chore’.His preaching to Arjuna in the battlefield of Kurukshetra shows the path and removes all the confusion of mankind.He is against renunciation and gives emphasis on 'Karama'.He is a symbol of egolessness.His personality is multidimensional because of which he is called the master of sixty- four Kalas.He is a charioteer, cowman,musician, politician , philosopher, great lover,and saviour of mankind.Krishna is the embodiment of the virtue and Kansha is the embodiment of vice .The conflict between vice and virtue is inseperable in this world and finally ,virtue becomes victorious.'Dharma Sansthapanarthaya' means for the establishment of religious values Gods incarnate upon the earth in every age . May Lord Krishna shower his blessings upon us all and fulfill our aspirations in our life.We are the seekers of pleasure and Krishna is another name for perpetual pleasure (परमानंद).All the lovers of Lord Krishna can attain permanent pleasure in their life with a pure heart.Once again a very happy Janmashtami to each and all.
Thursday, 6 August 2020
Glory Be to Lord Rama and Mother Sita!
Wednesday, 5 August 2020
मंदिर निर्माण का आरम्भ चिरप्रतीक्षित जनअभिलाषा के पूर्ण होने का दिन
Wednesday, 29 July 2020
पुण्यतिथि पर याद किये गए शिक्षाविद पं. रामप्रसाद मिश्र
Thursday, 16 July 2020
K.P.Public School :A seat of Innovative Learning
Tuesday, 7 July 2020
Plagiarism is a serious offence in research - Dr.G.D.Dubey
Sunday, 21 June 2020
Yoga is the gift of our forefather Patanjali
Today,we are celebrating International Yoga Day.Our forefather Maharshi Patanjali has introduced Ashtang Marg of Yoga practice which is very relevant to the modern time.Yoga is the effective remedy for the mental, spiritual, and physical ailments to the modern man's sufferings. So it is the need of the hour to follow the ways of Maharshi Patanjali and remember him with full gratitude.Wishing you all many happy returns of the day.
Tuesday, 9 June 2020
Girish karnad :A Prolific Name In Indian English Writing
Sunday, 7 June 2020
Madhava Rao Sadashiva Rao Golwalkar :A Selfless Karmayogi
Gradually the RSS was recognized on national platform because of its positive work.Under the leadership of a non political organisation the movement of cultural nationalism was started and still proceeding in forward direction with the aim of Param Vaibhav Sampanna Rashtra(परम् वैभव संपन्न राष्ट्र).Now the RSS has become the world's largest organisation . Madhava Rao Sadashiva Rao Golwalkar has played significant role to spread the ideology and works of the RSS nationaly .Even today, unfortunately the name of then the RSS head is forcibly in the center of Gandhi's assassination discourse.
Indeed ,what is the scale of greatness?After pondering we come to know that the length of one's shadow on future can determine one's greatness.Naturally the greatness of Golwalkar can be measured on behalf of his noble works and present structure of the RSS.The renowned literary personality and journalist Khushwant Singh has talked in detail about his interview with Golwalkar in 'Illustrated Weekly of India 'and has admitted that the meeting has resolved a lot of confusions .When Khushwant Singh begged Guruji's permission to go after interview ,the latter held his hands and did not allow the former to touch his feet.At the end of the article Khushwant Singh wrote:"Was I influenced by him?"Then he replied to himself:"Yes,I was influenced by him".The remark of Khushwant Singh speaks a lot and simultaneously gives a message to all the critics of Guruji.The basis of Propaganda against Guruji is a book entitled 'We,or Our Nationhood Defined ' published in 1939.Actually there are some rituals in Indian Politics without which political ceremony remain incomplete.To declare an organization or a particular person communal is the part of that ritual.Once upon a time the former Prime Minister Shri Chandrashekhar was speaking in the Parliament and quoting the text of this book that -Hitler has told us the way of purity of race which is understandable and adoptable for India.Minority wouldn't have the right of citizenship,there is mentioned that they will live as guests in our country by the permission of majority people otherwise they must go outside.L. K.Advani(the then Home Minister) informed the House as well as the nation that the author has detached himself and disowns the content .If the author denies and disowns the controversial portion of the text is it just to make the book and author controversial on the same ground?
Guruji said good bye to this mortal world on 5th June 1973.Having worked for thirty three years continuously he made a dying declaration on piece of paper which was discovered before volunteers after his death.It was mentioned on the paper that a constant competition is in our country to be a big name ,I am alive so how can get position and prestige and after death how to establish own statue is the basic concern of people, that's why no need to make my monument where people do work to fulfil their lust and temptation.At the end these words of Guruji give information about his noble deeds, service oriented personality without temptation of name fame and glory.The remembrance of such a kind of personality will be a true tribute to him.
Assistant Professor
Department of English
S.M.R.D.P.G.College, Bhurkura, Ghazipur.
Friday, 5 June 2020
निवृत्तिगत कर्मयोगी थे गुरुजी उपाख़्याय श्री गोलवलकर
वास्तव में श्रेष्ठता की कसौटी क्या है इस पर विचार करने से ज्ञात होता है कि मनुष्य की भविष्यकाल पर छाया कितनी लम्बी है(The length of one's shadow on future) उससे उसकी श्रेष्ठता का निर्धारण किया जा सकता है।संघ के वर्तमान स्वरूप और कार्य को देखते हुए श्री गोलवलकर की श्रेष्ठता का मूल्यांकन सहज ही किया जा सकता है।सुप्रसिद्ध साहित्यकार और पत्रकार खुशवंत सिंह ने गोलवलकर उपख़्याय श्री गुरुजी के साथ अपनी मुलाकात के बारे में द इलेस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया में विस्तार से ज़िक्र किया है और माना है कि गुरुजी से मिलकर बहुत सारी शंकाओं का समाधान मिला।इंटरव्यू के बाद जब खुशवंत सिंह जाने की आज्ञा मांगने लगे तो उन्होंने उनके हाथ पकड़ लिए ताकि वे उनके चरण न छूने पाएं।लेख के अंत में खुशवंत सिंह ने लिखा ,क्या मैं उनसे प्रभावित था ?मैं स्वीकार करता हूँ,मैं(उनसे)प्रभावित था।खुशवंत सिंह की टिप्पणी बहुत कुछ कहती है साथ ही नकारात्मकता का प्रसार करने वालों के लिए एक सन्देश भी देती है।
श्री गुरुजी के बारे में दुष्प्रचार का आधार उनके द्वारा1939 में प्रकाशित पुस्तक "We, or Our Nationhood Defined " को भी बनाया जाता है।दरअसल भारतीय राजनीति में भी कुछ प्रचलित कर्मकांड हैं जिसके बिना राजनीतिक कार्यक्रम पूर्ण नहीं हो सकता।किसी भी व्यक्ति या संगठन को सांप्रदायिक घोषित करना भी उसी कर्मकांड का हिस्सा है।एक बार संसद में पूर्व प्रधानमंत्री श्री चन्द्रशेखर इस पुस्तक का उद्धरण देते हुए कह रहे थे कि इस पुस्तक में उल्लेख मिलता है कि-प्योरिटी ऑफ रेस का रास्ता हमको हिटलर ने बताया है भारत के लिए वह रास्ता देखने और समझने योग्य है। माइनारिटी को नागरिकता का अधिकार नहीं होगा,उसमें लिखा है कि वे हमारे देश में केवल एक अतिथि के रूप में हैं जितने दिन बहुमत के लोग चाहे रहें या उन्हें बाहर जाना होगा।इसके जवाब में तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने सदन को अवगत कराया कि उसके(पुस्तक के) लेखक ने ही उससे अपने को असम्बद्ध किया।श्री गुरुजी ने ही कहा कि मैं उससे सहमत नहीं हूं।अगर पुस्तक में लिखी बात को लेखक स्वयं नकार रहा हो तो उस अंश के आधार पर पुस्तक और लेखक को विवादित बनाना कहाँ तक उचित है? 5 जून 1973को श्री गुरुजी ने शरीर त्याग दिया।तैंतीस वर्षों तक अनवरत संघ कार्य करते रहने के पश्चात औरअपनी मृत्यु से पूर्व कुछ बातें कागज पर लिख कर उन्होंने देह त्यागा जो मरणोपरांत सार्वजनिक हुईं।उसमें लिखा था कि इस देश में जहां अपना नाम कैसे बड़ा होगा इसकी होड़ लगी है, मैं जीवमान हूँ इसलिए पद प्रतिष्ठा कैसे प्राप्त हो इसके लिए होड़ लगी रहती है,और मृत्यु के पश्चात कैसे अपने पुतले बिठाए जाएं इसकी होड़ मची है इसलिए मेरा स्मारक मत बनाइयेगा।जहां लोग पद, पैसा,प्रतिष्ठा या लाभ प्राप्ति हेतु प्रवृत्तिगत भाव से कार्य करते हैं वहीं उनका यह अंत समय का उद्गार राष्ट्र के प्रति निवृत्ति भाव से की गई सेवा भावना को दर्शाता है।ऐसे महापुरुष का पुण्य स्मरण उनके प्रति सच्ची कृतज्ञता होगी।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
श्री म. रा.दा.पी.जी.कालेज
भुड़कुड़ा, गाजीपुर।
Thursday, 4 June 2020
धरती का सौंदर्य जीवन का आधार
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| विश्व पर्यावरण दिवस आज |
Wednesday, 3 June 2020
विरोधी विचारों के साथ समन्वय का नाम जार्ज फर्नांडीज
डॉ.लोहिया के शिष्य प्रो.मधु दंडवते और मधु लिमये जैसी समाजवादी विभूतियों के समकालीन जार्ज फर्नांडीस कीआज जन्मजयंती है।जार्ज साहब का निष्कलुष जीवन अपने आप में एक मिसाल है।देश काल और परिस्थिति के अनुसार जनहित में निर्णय लेकर अड़िग रहना और जनता की सेवा के लिए सदैव तत्पर रहना उनकी ख़ासियत रही है।भारतीय राजनीति में गैर कांग्रेसवाद की शुरुवात लोहिया और जे पी के नेतृत्व में होने के बाद जार्ज फर्नांडीज भी इससे कालांतर में जुड़ गए और आपातकाल के दौरान काफी सक्रियता दिखाई।भारतीय राजनीति में गठबंधन युग की शुरुवात होने पर इसे अस्थिरता के दौर से उबारने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।जब भारतीय जनता पार्टी का राजनैतिक आधार बढ़ रहा था लेकिन वह इस स्थिति में नहीं पहुंच पा रही थी कि देश को एक स्थिर सरकार दे सके।उसके ऊपर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का पक्षधर तथा साम्प्रदायिक दल होने का लेबल लगा कर उसे राजनीतिक दृष्टि से अछूत घोषित कर दिया गया था। या यूं कहें कि उनदिनों भाजपा को सांप्रदायिक कहना राजनीतिक कर्मकांड का हिस्सा बन गया था तब देश की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए स्थिर सरकार देने के उद्देश्य से जार्ज साहब ने लोहिया और जेपी के सत्तालोलुप शिष्यों को दरकिनार करते हुए भाजपा की ओर हाथ बढ़ाया।यद्यपि अपने को धर्मनिरपेक्ष कहने वालों द्वारा आजदिन भी बदस्तूर यह प्रयास जारी तो है लेकिन बेअसर है।जब अटल सरकार में साझीदार घटक दल अपने राजनैतिक फायदे के मुताबिक सौदेबाजी करने में लगे थे तो वहीं दूसरी ओर जयप्रकाश नारायण की समग्र क्रांति की कोख से जन्मे नेता क्षेत्रीय जनाधार के बल पर अपने राजनीतिक मनसूबे को हवा दे रहे थे।ऐसे में जार्ज साहब ने राष्ट्रीय राजनीति में दखल देते हुए राजग के संयोजक के रूप में कमान सम्हाली और भाजपा की अगुवाई में बने गठबंधन के साथ मुस्तैदी से नायक की भूमिका में खड़े हुए।कामन मिनिमम प्रोग्राम का खाका तैयार हुआ और राजनीतिक अस्थिरता से देश को निजात मिली।प्रयोग सफल हुआ और पहली गैर कांग्रेसी सरकार ने अटल विहारी वाजपेई के नेतृत्व में अपना कार्यकाल पूरा किया साथ ही भाजपा राजनीतिक दृष्टि से अस्पृश्य नहीं रही। इस श्रेय के असली हकदार जार्ज फर्नांडीज ही हैं।इसी प्रयोग को आगे बढ़ाते हुए देश में 2014 से राजग का शासन है और 2019 में लगातार दूसरी बार मोदी के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत प्राप्त करने के बाद भी गठबंधन की सरकार बनी तथा छोटे दलों को भी सरकार में प्रतिनिधित्व मिला जिसने गत 31 मई को एक वर्ष का कार्यकाल पूरा किया। देशव्यापी प्रचंड जनादेश के पीछे मोदी जैसा नेता नीतियां और कार्यक्रम के अलावा गठबंधन में भागीदार छोटे बड़े दलों की संयुक्त शक्ति भी है जिसके द्वारा मतों के बिखराव को रोकने में सफलता मिली।यह जार्ज साहब के जमाने में हुए राजनीतिक प्रयोग को सूक्ष्म तरीके से व्यापक स्तर पर लागू करने का परिणाम है।आज सहयोगी दलों के साथ बेहतर समन्वय के साथ नरेंद्र मोदी के करिश्माई नेतृत्व में सरकार चल रही है और अपने ऐतिहासिक निर्णयों के साथ लोकप्रियता के शिखर पर है।अपने सक्रिय राजनीतिक जीवन में जार्ज फर्नांडीज ने विरोधी विचारों के साथ गज़ब का सन्तुलन और संयोजन स्थापित किया था।कहाँ दक्षिण पंथी कही जाने वाली भाजपा और कहाँ समाजवादी झंडाबरदार जार्ज फर्नाडीज।यह देखकर जार्ज साहब का राजनीतिक कौशल याद आ रहा है ।किसानों मजदूरों के हक़ के लिए लड़ने का जज़्बा उनको एक जननेता की पहचान दिलाता है।भारतीय राजनीति में सार्थक और सकारात्म योगदान के बावजूद उनको भुलाने का प्रयास सालता है ।जन्मदिन पर जार्ज फर्नांडीज को याद करने के साथ यह अपेक्षा भी है कि वर्तमान पीढ़ी और हमारे नेतागण आपसी समझ और समन्वय की राजनीति को तरजीह देंगे दम्भ, तोड़- फोड़ और खरीद- फ़रोख़्त को नहीं। भले ही जार्ज फर्नाडीज आज नहीं हैं लेकिन जब जब गठबंधन धर्म की बात होगी भारतीय राजनीति को कठिन दौर से उबारने की कोशिशों की चर्चा होगी, सादगी और सुचिता का जिक्र आएगा तब तब उनका बेदाग व्यक्तित्व और विचार रास्ता दिखाने का काम करेंगे।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
पी. जी.कालेज,भुड़कुड़ा,गाजीपुर
Friday, 29 May 2020
सच्चे पत्रकार और साहित्यकार होते हैं वास्तविक जनप्रतिनिधि
साहित्य और पत्रकारिता का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है।यदि पत्रकारिता तथ्यों एवं विचारों को उदघाटित करती है तो साहित्य अमूर्त भावों और विचारों को अभिव्यक्ति देता है।दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।पत्रकारिता को साहित्य की एक विधा कहना गलत नहीं होगा।खुशवंत सिंह,कुलदीप नैयर,विद्यानिवास मिश्र,अज्ञेय, मनोहर श्याम जोशी और वर्तमान में हृदयनारायण दीक्षित ,वेदप्रताप वैदिक जैसे लोगों की लंबी परम्परा है जिन्होंने लेखक और पत्रकार के श्रेष्ठ दायित्वों का समान रूप से निर्वहन किया है।कुछ समय पूर्व तक पत्रकारिता में प्रवेश के लिए यह जरूरी था कि व्यक्ति का लगाव साहित्य की तरफ हो लेकिन आज ऐसा नहीं है।तकनीक के प्रयोग और पैसे की चमक ने पत्रकारिता को तुलनात्मक रूप से साहित्य से ज्यादा लोकप्रियता का माध्यम बना दिया।फलतःसाहित्य और पत्रकारिता के बीच पहले जैसा रिश्ता नहीं रहा।आज दोनों पर एक दूसरे की उपेक्षा का आरोप लगता है।
प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के पूर्व से लेकर आजादी के बहत्तर साल बाद तक तमाम उतार चढ़ाव से गुजरते हुए हिंदी पत्रकारिता 194 वर्ष की हो गयी।लगभग इन दो सौ वर्षों में पत्रकारिता की दुनियां में बहुत कुछ घटित हुआ और समाज की बेहतरी के लिए बहुत कुछ करने की सम्भावना भी बाकी है।लोकतांत्रिक व्यवस्था का चौथा और महत्वपूर्ण स्तम्भ पत्रकारिता है।आजादी से पूर्व हिंदी पत्रकारिता के तीन लक्ष्य थे।पहला लक्ष्य था कलम को हथियार बनाकर आजादी हासिल करना,दूसरा साहित्यिक उत्थान और तीसरा समाज सुधार करना।पण्डित युगल किशोर शुक्ल द्वारा सम्पादित उदन्त मार्तण्ड को पहला अख़बार होने का श्रेय जाता है।कलकत्ता (कोलकाता)से 30 मई 1826 को इसका प्रकाशन शुरू हुआ।
आजादी से पूर्व पत्रकारिता कर्म एक व्रत था और आजादी के बाद यह वृति में बदल गया।आज अर्थ के इस युग में देश और समाज के हित से पहले पत्रकारों के लिए निजी हित याअपने प्रतिष्ठान का हित सर्वोपरि है।यद्यपि कुछ निडर और निर्भीक पत्रकार आज भी खड़े हैं लेकिन जुनून के साथ जूझने के आलावा उनके पास कुछ भी नहीं।यहाँ तक कि परिवार के पालन पोषण का भी संकट है।पत्रकार या सम्पादक को इस बात का सदैव ध्यान रखना चाहिए कि समाचारों या लेख की आड़ में किसी का प्रचार नहीं होना चाहिए साथ ही यह भी सुनिश्चित हो कि सरकार के प्रति नकारात्मकता फैलाने का यह माध्यम भी न बने।यह काम तलवार की धार पर चलने जैसा है। (We don't go into journalism to be popular.It is our job to seek the truth and put constant pressure on our leaders until we get answer- Helen Thomas)अर्थात पत्रकारिता का उद्देश्य लोकप्रियता बटोरना नहीं है।पत्रकार का काम है सत्य को तलाशना और जवाब पाने के लिए शासकों के ऊपर दबाव डालना।आज के प्रतिष्ठित अख़बारों से जुड़े कुछ नामचीन पत्रकारों ने अपनी निष्ठा को गिरवी रख दिया हैऔर सत्ता- सिंहासन के इर्द गिर्द डोलने बोलने को लक्ष्य बना आर्थिक हित साधने में लगे हैं।पत्रकारिता प्रसिद्धि का माध्यम बन गई है और इसका लक्ष्य सत्य तलाशने की जगह सत्ता में भागीदारी बन गया है।तिलक,गाँधी,डॉ राममनोहर लोहिया,बाबू बनारसीदास ,बद्री विशाल पित्ती,आचार्य नरेंद्र देव,पं.दीनदयाल उपाध्याय ,अटल बिहारी वाजपेयी सरीखे राजनीतिज्ञों ने अपने जीवनकाल में पत्रकारिता के मूल चरित्र को अक्षुण्य बनाये रखा। आज के दौर की पत्रकारिता रास्ते से भटक गयी है।
समाज में जागरूकता लाना पत्रकार का पहला दायित्व है और इसका निर्वाह करने वाला ही सच्चा पत्रकार है।सच कहें तो हमारे तथाकथित जनप्रतिनिधि दलों की दलदल में फंसे होते हैं लेकिन सच्चे पत्रकार और साहित्यकार वास्तविक जनप्रतिनिधि होते हैं।आज के दौर की पत्रकारिता ने उद्योग का रूप ले लिया है।बड़े बड़े मीडिया हाऊस अस्तित्व में आ गए हैं।आंकड़ों पर गौर करें तो अनुमानतः सवा लाख करोड़ से अधिक का यह उद्योग बन चुका है।राष्ट्रीय एजेंडा निर्धारण में मीडिया की भूमिका भी बढ़ी है लेकिन आधुनिक दौर में संवैधानिक पदों पर आसीन लोगों से समाज की अपेक्षा है कि पत्रकारिता रूपी संस्था को कारोबारी नजरिये से हटकर ताकत मिलती रहे जिससे एक सौ तीस करोड़ का देश पूरी पारदर्शिता से प्रगति के पथ पर बढ़ता रहे।पत्रकारिता ही वह माध्यम था जिसने आजादी में जनचेतना का मार्ग प्रशस्त किया और आजादी के बहत्तर साल बाद पुनःराष्ट्रीय व सामाजिक दायित्वों की पूर्ति के लिये व्रती पत्रकारिता की आवश्यकता महसूस हो रही है।यदि समाज के ज्वलन्त मुद्दों पर पत्रकार की लेखनी छैनी का काम करेगी तभी भारतीय समाज को सुंदर आकार देने में सफल होगी।एक कहावत प्रचलित है कि पत्रकारिता सरकार की मां नहीं है जो पीछे से सहारा दे,वह सरकार का बच्चा भी नहीं है जिसे गोंद में बिठा के खिलाया जाए बल्कि पत्रकारिता तो सरकार का बाप है जो कान खींच के उसे रास्ता दिखाए।अगर आज पत्रकारिता यह कर पाने में समर्थ है तो उसे सार्थक माना जायेगा। चुनौतियों से जूझते हुए सत्य के साथ पत्रकार का खड़ा होनाऔर विमर्श को जिन्दा रखना समाज को समाधान देगा।हिंदी पत्रकारिता दिवस की सुधी पाठकों और पत्रकार बन्धुओं को बधाई।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
श्री म. रा. दा.पी.जी.कालेज
भुड़कुड़ा, गाजीपुर।
Wednesday, 27 May 2020
परम्परा और आधुनिकता का समन्वय है पं.नेहरू का व्यक्तित्व
Monday, 25 May 2020
नब्बे के दशक तक अंतर्देशीय और पोस्टकार्ड थे कुशलक्षेम के सशक्त माध्यम
Thursday, 21 May 2020
राजीव गांधी की पुण्यतिथि आज
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
श्री म.रा.दा.पी.जी.कालेज
भुड़कुड़ा, गाजीपुर।
Monday, 18 May 2020
कोरोना संकट नए तरह के समाज और साहित्य का प्रसवकाल
Thursday, 14 May 2020
प्रशंसा और निंदा से परे था निर्गुनिया सन्त श्री महन्थ रामाश्रयदास का व्यक्तित्व
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
श्री महन्थ रामाश्रय दास पी.जी.कालेज
भुड़कुड़ा,गाजीपुर।
Thursday, 7 May 2020
सरल जीवन की संहिता है बुद्ध का जीवन
Friday, 24 April 2020
गाँव हमारे सामाजिक जीवन के केंद्र
आज 24 अप्रैल को भारत पंचायतीराज दिवस मनाता है।इसकी शुरुआत आज ही के दिन सन 1993 में 73वें संविधान संशोधन के साथ हुई।दरअसल बापू ने ग्राम स्वराज का सपना देखा था और वे मानते थे कि अगर देश के गांवों के ऊपर खतरा पैदा हुआ तो भारत को खतरा होगा।पंचायतीराज व्यवस्था को लागू करने के पीछे यही सोच काम कर रही थी।इसका मक़सद गांव को आत्मनिर्भर बनाना और पूर्ण स्वायत्तता देना था जिससे लोकतंत्र निचले स्तर पर भी पल्लवित पुष्पित हो।असली भारत तो यहां के गांवों में ही बसता है।ब्रिटिश शासक भारत के इन आत्मनिर्भरता के केंद्रों को पूर्णतया विनष्ट करना चाहते थे जिसका आधार बनी 1830 में गवर्नर जनरल सर चार्ल्स मेटकाफ की रिपोर्ट।चार्ल्स मेटकाफ के मुताबिक भारत के ग्राम समुदाय एक प्रकार के छोटे छोटे गणराज्य हैं जो अपने लिए आवश्यक सभी सामग्री की व्यवस्था कर लेते हैं तथा किसी प्रकार के बाहरी सम्पर्क से मुक्त हैं।इस बात को समझकर भारत के गांवों को तबाह करने में अंग्रेज काफी हद तक कामयाब रहे उनके जाने के बाद अपने को गांधी का अनुयायी मानने वाले सत्ता सम्हाले लेकिन गांव की बदहाली बनी रही।आज देश में पंचायती राज व्यवस्था लागू है।लगभग देश की सभी पंचायतें ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क से जुड़ गई हैं।गांव का सरपंच सीधे अपने प्रदेश या देश के नेतृत्व के साथ आज सहजता से संवाद स्थापित कर रहा है।अपने गांव की जरूरत के मुताबिक मुखिया केंद्र या प्रदेश नेतृत्व से परामर्श कर स्थानीय संसाधनों का सही और समुचित प्रयोग कर सकता है।आज बदलाव तो जरूर दिखाई दे रहा है लेकिन यह काफी नहीं है।गांव में शिक्षा, चिकित्सा,और रोजगार के अवसर का उचित प्रबंध करने की आवश्यकता है।आज सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता में गांव ही हैं।यह बात जरूर है कि गांव को भी अपने सरपंच या प्रधान चुनने में तथा अपनी प्राथमिकता तय करते समय गांव की आत्मनिर्भरता और स्वायत्तता को ही प्रथम वरीयता देना होगा।हमारी ग्रामसभाएं राजनीति का अखाड़ा बन गई हैं जहां प्रधान या सरपंच का चुनाव लोकतंत्र का पर्व न होकर गांव पर कब्जा करने का अवसर बन जाया करता है। जिस प्रकार ब्लाक प्रमुख और जिलापंचायत के अध्यक्ष का चुनाव सम्पन्न होता है वह किसी से छिपा नहीं है। उसे देखकर यह संशय पैदा होना स्वाभाविक है कि क्या यही परिकल्पना रही होगी पंचायतीराज व्यवस्था का ख़ाका तैयार करते समय?गांव खुशहाल हों,वाद का निबटारा संवाद से हो, आत्मनिर्भरता बढ़े और पलायन रुके इसी आकांक्षा के साथ सभी पंचायत प्रतिनिधियों को दिन विशेष की बधाई।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
पी.जी.कालेज,भुड़कुड़ा,गाजीपुर
Sunday, 19 April 2020
ग्रामीण भारत और प्रवासी मजदूरों की विशेष चिंता का समय
पूरी दुनिया कोरोना महामारी से त्राहि त्राहि कर रही है।भारत भी इस संकट से जूझ रहा है।सम्पूर्ण देश में लॉक डाउन है।कुछ लोग भययुक्त वातावरण में घरों में कैद हैं।तो वहीं अपने पसीने की बदौलत स्वयं भूखे रहकर औरों की भूख मिटाने वाले बेबस और बेघर लोग मारे मारे फिर रहे हैं।सपनों की तलाश में गांव से शहर आये इन लोगों को इस महामारी के कारण उपजी सामाजिक असुरक्षा की भावनाअपने गांव जाने हेतु प्रेरित कर रही है जिसके फलस्वरूप ये हत भाग्य नागरिक बन्धु राजनीतिक लोगों के छल का शिकार भी हो रहे हैं।अचानक बस स्टैंड या रेलवे स्टेशन पर जमा भीड़ इस बात का उदाहरण है।इनमें से कुछ राशन की दुकान पर तो कोई बैंक में लाइन लगाए खड़ा है।जनजीवन की सुरक्षा, उदरपूर्ति और बहाली सरकार के लिए चुनौती बनी है।जब कभी मजदूर यूनियन के आवाहन पर या विभिन्न संगठनों के आवाहन पर हड़ताल हुआ करती है तो होने वाले नुकसान का आंकलन किया जाता है तथा हड़ताल वापस कराने का प्रयास भी होता है।लॉक डाउन अपने नागरिकों को सुरक्षित रखने की दृष्टि से सरकार द्वारा समय पर उठाया गया अभूतपूर्व कदम है लेकिन इस लॉक डाउन के दौरान ही हमें इससे होने वाले नुकसान से उबरने के बारे में और इसके खिलाफ कारगर लड़ाई लड़ने की दिशा में गम्भीरता पूर्वक सोचना चाहिए तथा भविष्य का खाका भी तैयार करना होगा।हमें ही नहीं पूरे विश्व को अपनी भौगोलिक सीमाओं का विस्तार करने,भोग बिलास की वस्तुओं का अविष्कार करने ,सामूहिक नरसंहार के हथियार बनाने,खरीदने,बेंचने और शस्त्र निरस्त्रीकरण सन्धि से आगे जाकर विश्व ग्राम की अवधारणा के प्रकाश में मानवता के बारे में सोचने की जरूरत है।संयोग से देश दत्तोपंत ठेंगड़ी जैसे महान विचारक का जन्म-शताब्दी वर्ष भी मना रहा है।उनका चिंतन अमल में लाने की आवश्यकता है।अगर देश की सरकार इस बात का स्मरण रखते हुए नीतियों का निर्धारण करेगी कि 'जीविका के लिए जीवन रेहन न रखना पड़े,रोटी इंसान को न खाए 'तब जाकर हम कोरोना के दूरगामी कुप्रभाव से मुक्ति पाएंगे।देश के संसाधन मनुष्य की आवश्यकता पूर्ति के लिए हैं उसके लोभ की पूर्ति या आधिपत्य के लिए नहीं।समय कठिन और चुनौतीपूर्ण जरूर है लेकिन ठेंगड़ी जी के उपरोक्त कथन के केंद्र में जो वर्ग है उसका विशेष ध्यान सरकार को रखना होगा।यही वह वर्ग है जो देश को हमेशा सम्हालता है,आज भी सम्हाले है और आगे भी सम्हालने की कूबत रखता है।हमें बाजारवाद की अवधारणा ने स्वार्थी तरीके से इनके श्रम की शक्ति का बाजार हित मे प्रयोग करना सिखाया जिसके परिणाम स्वरूप इनकीआत्म निर्भरता समाप्त हुई और असन्तुलन बढ़ता गया।आज अवसर है कृतज्ञ भाव से इनको शोषण मुक्त कर इनका सहयोग किया जाय।इनके परिश्रम का सही मोल चुकाया जाय।आज यही वह वर्ग है जो सिर्फअपनी उदरपूर्ति की चिंता में नहीं डूबा है।वह महामारी की भयावहता से अनजान नहीं है लेकिन उसे इस बात की परवाह है कि येन केन प्रकारेण उसका भी पेट पर्दा चलता रहे और लोगों तक सब्जी अनाज दूध पहुंचता रहे।वह मास्क, सेनेटाइजर, और सोशल डिस्टेंसिग की बहसों में नहीं उलझा है और न ही वह पत्थरबाजी या कोरोना कैरियर बनने में मशरूफ है।उसे तकरीरों और जलसों से भी कुछ लेना देना नहीं है।उसे सम्पूर्ण जीवजगत की चिंता है लेकिन सूबे की सरकारें उन्हें प्रवासी मजदूर से ज्यादा नहीं देख या समझ पा रहीं।सरकार और समाज का यह दायित्व बनता है कि संकट काल मे ग्रामीण भारत और प्रवासी मजदूर की संज्ञा धारण करने वालों की विशेष चिंता करें जो ठोकरें खाकर,अपनी वास्तविक पहचान खो कर और अपमान का घूंट पीकर भी सड़क,पुल, भवन निर्माण में सतत संलग्न रहने वाले हैं और सदा उत्पाद- उपभोक्ता के बीच की कड़ी बनकर देश के लिए श्रेष्ठ योगदान दिया है।उनके प्रति संवेदनशील बने रहना लॉक डाउन के बाद की समस्या का समाधान बनेगा।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
पी.जी.कालेज,भुड़कुड़ा, गाजीपुर
Friday, 17 April 2020
भूतपूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर के अनुसार जज्बातों को उभार कर देश की समस्याओं का समाधान नहीं किया जा सकता
अपनी बेबाकी के लिए मशहूर,बलिया के बाबूसाहब, अभूतपूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर जी की आज जन्मजयंती है।भारतीय राजनीति के इस पुरोधा को देश कभी भुला न सकेगा।उनके विचारों की रौशनी देश को रास्ता दिखाने की सामर्थ्य रखती है।साधारण परिवार में जन्मे असाधारण व्यक्तित्व के स्वामी चन्द्रशेखर को पक्ष और विपक्ष बड़े गौर से सुनता था और उनकी अहमियत भलीभांति समझता था।आज सार्वजनिक जीवन और संसदीय राजनीति में ऐसे व्यक्तित्व का अभाव खटकने वाला है।वर्तमान समय में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच की तल्खियां जग जाहिर हैं।संसद में खड़े होकर एक बार उन्होंने चेतावनी भरे लहज़े में कहा था कि हम नहीं जानते कब किससे जनतंत्र में मदद लेनी पड़ जाय।किसी के चरित्र को गिरा देना आसान है,किसी के व्यक्तित्व को तोड़ देना आसान है लेकिन वैसा किरदार गढ़ना बेहद कठिन है।आज के परिवेश में उनकी कही बात को न केवल समझना होगा बल्कि अमल भी करना होगा।आज संकट के दौर में राजनीतिक नेतृत्व की खामियां गिनाने और खूबियों का बखान करने में समय गंवाने का नहीं।कोरोना जैसी महामारी के खिलाफ प्रभावी लड़ाई लड़ने के लिए सम्पूर्ण देश को एकदूसरे की मदद के लिए आज खड़े रहने की आवश्यकता है।हमें यह समझना होगा कि राजनीति मुद्दों पर आधारित हो । व्यक्तिगत कटुता और प्रतिशोध के लिए उसमें स्थान नहीं होना चाहिए।कई बार हम जिन विचारों से सहमत नहीं होते हैं उनके नेक कार्यों की अवहेलना करते हुए तर्कहीन निंदा करना आरम्भ कर देते हैं।सम्भव है इससे क्षणिक लाभ मिल जाय लेकिन देश का दीर्घकालिक हित इससे नहीं सधेगा।जज्बातों को उभार कर सरकारें बनाई बिगाड़ी जा सकती हैं लेकिन समस्याओं को नहीं सुलझाया जा सकता ।।हमें अच्छे को अच्छा कहने की आदत डालनी होगी और गलत बातों के विरोध का साहस भी समय समय पर प्रदर्शित करना होगा।युवा तुर्क के लिए समाजवाद मुखौटा नहीं था ।चन्द्रशेखर जी समाजवाद की विचारधारा को जीने वाले व्यक्ति थे,धार्मिक ध्रुवीकरण की मुखालफत करते थे,उदारीकरण और स्वदेशी जैसे परस्पर विरोधी पहल पर सरकार से प्रश्न खड़ा करते थे लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेक कार्यो की सराहना से भी नहीं चूकते थे।उन्नीस सौ निन्यानबे में भरे सदन में खड़े होकर उन्होंने मुक्तकंठ से यह स्वीकार किया कि संघ से हमारा जितना भी विरोध हो वह संगठित,निष्ठावान,संकल्प वाले नवयुवकों का एक संगठन है। प्रधानमंत्री के तौर पर हिंदुत्व के बारे में अपने दृष्टिकोण को उन्होंने सार्वजनिक किया था । प्रतिपक्षी सांसद के रूप में उन्होंने सदन में कहा था कि मुझे इस बात का अभिमान है कि मैं हिन्दू हूँ।सच कहा जाय तो चन्द्रशेखर जी संघर्षों की पैदाइश थे।खुद से रास्ता बनाते हुए बढ़ते गए और राजनीति के शीर्ष पर पहुंचे।प्रधानमंत्री रहते हुए कभी भी वे प्रधानमंत्री निवास में सुख सुविधा भोगने के उद्देश्य से नहीं रहे।दिल्ली से दूर भोंडसी आश्रम ही उनका ठिकाना था।देश के प्रधानमंत्री के रूप में उन्हें अल्प अवधि के लिए सेवा का अवसर प्राप्त हुआ लेकिन कई कारणों से यह कार्यकाल काफी महत्वपूर्ण है। इब्राहीम पट्टी से दिल्ली की दूरी तय करना आसान काम नहीं था।जन्मदिन के अवसर पर सादगी पसन्द सच्चे समाजवादी नायक को कोटिशः नमन।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
पी.जी.कालेज,भुड़कुड़ा-गाजीपुर

























