Wednesday, 23 August 2023

तुलसी सरनाम गुलाम है राम को, जाको रुचै सो कहै कछु ओऊ।


आज श्रीरामचरितमानस के रचयिता भक्त कवि तुलसीदास की जन्मजयंती है। तुलसी बाबा ने समाज को व्यावहारिक व्याकरण सिखाने के साथ ही लोकभाषा में भक्ति को खेतों खलिहानों तक पहुंचाया। वे कहते हैं कि "सुरसरि सम सबकर हित होई"।राजनीतिक स्वार्थ प्रेरित आलोचना से इस ग्रन्थ और इसके रचयिता पर कोई फर्क नहीं पड़ता। यह भारत का संविधान नहीं है कि इसके कुछ अंश को बहुमत के आधार पर संशोधित कर दिया जाएगा अथवा नया जोड़ दिया जाएगा। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के हिमायती कुपढों को भी तुलसी बाबा की अभिव्यक्ति को समझना चाहिए । यह एक ऐसा ग्रन्थ है जिसे भारत ही नहीं अपितु भारत के बाहर भी भारतवंशियों द्वारा श्रद्धा पूर्वक सहेज कर रखा गया।इस ग्रंथ के माध्यम से जिस रामराज्य की कल्पना की गई है वह निराधार नहीं है। उसके लिए उन्होने मानक तय किए हैं। जिसप्रकार से आज हम चर्चा करते हैं कि अच्छा शासन वहां है जहां कानून का राज हो, मृत्यु दर कम हो भुखमरी कुपोषण न हो, पर्यावरण ठीक हो आदि आदि। अगर हम गहनता से देखें तो "चलहीं स्वधर्म निरत श्रुत नीति " कह कर तुलसी बाबा कानून के राज की बात कहते हैं, "सब नर करहीं परस्पर प्रीति "के द्वारा समरस समाज की बात कहते हैं , "नहीं दरिद्र कोऊ दुखी न दीना "के माध्यम से भुखमरी कुपोषण रहित समाज की कल्पना की गई है,  "अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा " स्वास्थ्य एवम् मृत्यु दर सूचकांक को प्रदर्शित करता है,फुलहीं फलहीं सदा तरु कानन पर्यावरण की स्थिति का संकेत कर रहा है। मानस में  वर्णित "सब मम प्रिय सब मम उपजाए "के बाद भी अगर किसी को कवि की नीयत में खोट नजर आता है तो इससे तुलसी बाबा की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता।वास्तव में तुलसी बाबा का विरोध करने वाले राम विरोधी हैं, सनातन विरोधी हैं इसलिए उन्हे रामचरितमानस में खामी दिखाई दे रही है। यह ध्रुव सत्य है कि नज़रिया गलत होगा तो नजारा भी गलत ही दिखाई देगा। 

डॉ संतोष कुमार मिश्र

असिस्टेंट प्रोफ़ेसर अंग्रेजी

पी जी कालेज भुड़कुड़ा गाजीपुर 






 

Friday, 11 August 2023

मानवता के कल्याण का निमित्त हम बनें-डॉ. मोहन जी भागवत

       


         श्रद्धेय यति जी महाराज, उपस्थित अन्य सभी संत गण, इस परिसर के सभी नागरिक सज्जन, माता भगिनी! संतों की एक विशेषता होती है कि परम अणु, परमाणु को भी पहाड़ जैसा बड़ा बनाते हैं। परमाणु समझते हैं न; एटम। इतना सूक्ष्म भी किसी में मिल जाय.. थोड़ा सा तो उसको वो बड़ा करके हिमालय जैसा बताते हैं और अपने स्वयं को तो आत्म विलोकी ही रखते हैं। मेरे बारे में जो कुछ कहा गया है अब तक.... महाराज जी ने जो भी कहा है उसे ऐसा ही मानिए। यह संतो का स्वभाव होता है। क्योंकि ये सारे काम श्रीराम की प्रतिष्ठा आदि महाराज जी ने बताई, इसमें मैं अकेला थोड़े ही हूं, पूरा भारत वर्ष खड़ा हो गया, उसी का प्रताप है, संत महात्माओं का आशीर्वाद है, श्रीराम की इच्छा है। मुझे ऐसी जगह पर रख दिया है कि फोटो उठाएं तो मेरा ही उठता है। ब्रिटेन के एक प्रधानमन्त्री थे द्वितीय विश्वयुद्ध के समय चर्चिल। इंगलैंड विजई हो गया तो लोगों ने चर्चिल का अभिनंदन किया; सार्वजनिक अभिनंदन और उसमें उनका वर्णन करते समय एक वक्ता ने कहा कि He was the Lion of England (इंगलैंड के शेर थे)। अपने अभिनंदन का उत्तर देते समय चर्चिल ने कहा कि I was not the lion you were the lions.I only roared for you. मैं सिंह नहीं था असली सिंह तो आपलोग थे। आपके तरफ से गुर्राने का काम मुझे दिया था वो मैं किया। मुझे जहां बिठाया है आपने वहां मुझे गुर्राने का ही काम करना पड़ता है, शेरों के होते हुए, क्योंकि शेर व्यस्त रहते हैं। उनके पास गुर्राने का समय नहीं होता, वे काम करते हैं, बोलने का काम हम करते हैं। बस इतना ही है। वो जितना काम करते हैं वैसा ही हम बोल सकते हैं। इन सब बातों का जिनका वर्णन किया उसका श्रेय यदि किसी को है तो संतो के आशीर्वाद को है, उनके सहयोग को है, सभी कार्यकर्ताओं के परिश्रम को है और हमारे समाज की अमिट ऊर्जा को है क्योंकि मैंने कहा न कि श्रीराम की इच्छा। वास्तव में हमारे देश में तो यही माना जाता है कि उसकी इच्छा से ही सब कुछ होता है। योगी अरविंद ने कहा कि सनातन धर्म का उत्थान हो यह भगवान की इच्छा है और जब जब सनातन धर्म का उत्थान आवश्यक हो जाता है, हिन्दू राष्ट्र का, भारत वर्ष का उत्थान भगवान करते हैं। वह समय आया है इसलिए हिन्दू राष्ट्र का उत्थान अनिवार्य है। यह बातें वे सवा सौ साल पहले कह के गए। वह प्रक्रिया हम आज अनुभव करते हैं। ये सब कुछ हो रहा है और नियति के एक सूत्र के अनुसार हो रहा है।हमारी बहादुरी उसमें यह है कि नियति अपना काम कर रही है तो धर्म कार्य का, सद्कार्य का,मानवता के कल्याण का निमित्त हम बनें। हम हाथ पर हाथ धरे बैठे तमाशा न देखते रहें। हम भी जैसे उस सेतुबन्धन के कार्य में एक गिलहरी भी लगी थी। वैसे देखा जाय तो इतना बड़ा रामसेतु आज भी दिखता है समुद्र में पानी के अन्दर। ऐसा रामसेतु बनाने का वो महान काम उसमें गिलहरी ने क्या किया? दो चार कण लाकर डाल दिए। गिनती में वह काम छोटा हो सकता है लेकिन यदि गिलहरी बोल सकती तो अपने नाती पोतों को बताती, वो लोग अपने नाती पोतों को बताते और आज अगर उस गिलहरी के वंशज कहीं हैं तो उनके बच्चे बताते कि हमारा कुल वो है जिसने राम के कार्य में मदद की थी। जिसमें हम शामिल थे।... एक छोटा सा भी काम करने से या उसमें लगने से अपना पूरा जीवन सार्थक हो जाता है।हमारा कर्तव्य यह बनता है कि नियति अपना काम करेगी, प्रकृति अपना चक्र पूरा करेगी, भगवान की इच्छा से जो होता है वह होगा। भगवान की इच्छा से जो हो रहा है उसमें अपना हाथ लग जाय...। ये काम हमको करना है इस बुद्धि से हम कर रहे हैं। इसलिए ऐसे स्थानों पर जब मैं जाता हूं तो पाथेय देने के लिए , मार्गदर्शन के लिए कत्तई नहीं जाता हूं । हम यहां से अपनी बैटरी चार्ज करके जाते हैं। ये धर्म के स्थान हैं, ये आध्यात्म के स्थान हैं केवल स्थान नहीं ऐसे स्थान हैं जहां पच्चीस पीढ़ियों की साधना  निरंतर चल रही है देश कार्य में, देव कार्य में, धर्म कार्य में। हमने तीन अलग अलग शब्द प्रयोग किए लेकिन हमारे यहां तीनों शब्दों के एक ही मायने हैं। भारत वर्ष मतलब सनातन धर्म, सनातन धर्म मतलब भगवान की इच्छा।तो देव,देश और धर्म हमारे यहां अलग अलग नहीं है और इन सब को हमारे यहां मानवता से जोड़ा गया है। हमारा धर्म दूसरों पर लादने के लिए नहीं है, मानवता को बढ़ाने के लिए है। भारत बड़ा होता है सारी दुनियां को अच्छे रास्ते पर बढ़ाने के लिए। भारत में भगवान की पूजा भगवान के लिए नहीं होती। भगवान को क्या जरूरत है? वो तो सर्व ऐश्वर्य संपन्न हैं लेकिन हम उनकी पूजा करके अपने आप को पुष्ट करते हैं, अपने स्व का अनुभव करते हैं, आत्मस्वरुप का दर्शन करते हैं। हमारी उनके साथ भक्ति हमको अंततोगत्वा उनके साथ कैसे एकरूप वास्तव में होना है यह बताती है। यह हथियाराम मठ है, यहां सिद्धिदात्री का निवास है,वो मृणमयी स्वरूप है यानी मिट्टी की मूर्ति है। मिट्टी क्या है?जो हमको बनाती भी है और हमको धारण भी करती है। मिट्टी का बना देह है हमारा। मिट्टी नहीं होगी तो हम खड़े नहीं होंगे और मिट्टी नहीं होगी तो हम बनेंगे भी नहीं। इसलिए यह सिद्धिदात्री भी हैं और जगतधात्री भी हैं।उसकी यहां आराधना होती है और आराधना करने वाले केवल मन्दिर में पूजा नहीं करते कुछ शिक्षा के कार्य, स्वास्थ्य के कार्य, राष्ट्र में जब जब कभी उत्थान का प्रसंग आता है उसमें समाज के साथ सहभाग उसमें सहयोग करते हैं।ये सारा कार्य पिछले पच्चीस पीढ़ी से करते आए हैं और आज भी वह तपस्या चल रही है।ऐसा जहां पर चलता रहता है वह प्रेरणा का जीवंत स्थान होता है। इसीलिए मैंने महाराज जी को कह दिया कि मैं आऊंगा। फिर महाराज जी का पत्र भी आ गया। मैंने निश्चित किया की जाऊंगा,अवश्य जाऊंगा। अनिल जी और रमेश जी से चर्चा किए क्योंकि उनका मन तो मेरे ही जैसा है। मेरा सौभाग्य है कि वह समय जल्दी आ गया और ऐसे समय पर आ गया जब महाराज श्री के इस पीठ पर पच्चीस वर्ष पूरा होकर छब्बीस वर्ष प्रारंभ हुआ,वह भी ऐसा दिन निकला जिस दिन हम देश के लिए प्राण अर्पण किए शहीदों की स्मृति में मना रहे है। यह इसलिए संभव हुआ कि मेरे कार्यकर्ताओं ने यह समय निकाला तथा महाराज श्री ने बुलाया। उनके प्रति मेरे मन में अपार कृतज्ञता है। मेरा जो लक्ष्य था बैटरी रिचार्ज करने जाना वह तिगुना सफल हो गया।आपसब लोगों के दर्शन उसके साथ हो गए। अपना देश है, अपने देश की भूमि है, जल जंगल, जानवर सब कुछ देखने लायक है। वास्तव में अपनत्व का भाव लेकर देश में कहीं भी जायेंगे तो जगतजननी का साक्षात्कार मिलेगा।

(प.पू.सरसंघचालक डॉ मोहनराव भागवत जी द्वारा दिनांक 23/03/2022 को सिद्धपीठ हथियाराम मठ में दिए गए संबोधन का संपादित अंश)

डॉ. संतोष कुमार मिश्र

असिस्टेंट प्रोफ़ेसर अंग्रेजी

पी.जी.कालेज भुड़कुड़ा, गाजीपुर 


Friday, 13 May 2022

फकीराना तबियत थी मिले जो बांट देते थे



उत्तर भारत के साढ़े चार सौ वर्ष प्रचीन निर्गुनिया सन्त परम्परा की महत्वपूर्ण कड़ी सिद्धपीठ भुड़कुड़ा से जुड़ी है।आचार्य रजनीश ने यहाँ के सन्तों द्वारा विरचित पदों की विस्तार से व्याख्या की है जो झरत दसहुँ दिस मोती,गुरु परताप साधु की संगत,बिग्सयो कमल फूल्यो काया बन, अजहूँ चेत गंवार ,सपना यह संसार जैसी पुस्तकों के रूप में संकलित है।साहित्य और अध्यात्म के प्रति अभिरुचि रखने वाले लोगों के लिए यह स्थान विशेष महत्व का है।यहाँ के दसवें पीठाधीश्वर श्री महन्थ रामश्रयदास को स्थूल शरीर का त्याग कर ब्रह्मलीन हुए चौदह वर्ष बीत गए।14 मई उनके महाप्रयाण या ब्रह्मलीन होने की तिथि है।भूख से भटकते हुए बालक रामश्रयदास का आगमन भुड़कुड़ा मठ में सन 1934 के आस पास हुआ ।उस समय यही कोई चौदह पन्द्रह वर्ष की अवस्था रही होगी।यहाँ आगमन के बाद बूला-गुलाल-भीखा की तपस्थली से ऐसा नेह जुड़ा कि कुल, गोत्र, गांव, जंवार ,परिवार सब पीछे छूट गए और  मन रम गया फकीरी में।"गुरु समाना शिष्य में /शिष्य ने कर लिया नेह/बिलगाए बिलगे नहीं /एक प्राण दुई देह " फिर क्या था,तत्कालीन महन्थ श्री रामवरन दास से दीक्षा लेकर विधिवत सन्यास आश्रम में प्रवेश ले लिया और सन1969 में मठ के महन्थ चुने गए।उन्होंने साधना का मार्ग चुना और गुरु के बताए मार्ग का अनुसरण करते हुए जीवनपर्यन्त सतनामी सद्गुरुओं की भूमि भुड़कुड़ा को सींचते रहे।वे मठ में आने जाने वाले श्रद्धालुओं से जन भाषा में संवाद करते हुए बड़ी ही आत्मीयता के साथ सन्त साहित्य और श्रीरामचरितमानस के गूढ़ रहस्यों का विवेचन विश्लेषण किया करते थे।कभी कभार मन हुआ तो हारमोनियम लेकर भजन गाना शुरू कर देते थे और ढोलक पर थाप देते थे भुड़कुड़ा गांव के प्रज्ञा चक्षु विजई ।बालसुलभ खिलखिलाहट उनके चेहरे पर सदैव उपस्थित रहती थी। वे सहज तो इतना थे कि कबीर के शब्दों में "जहँ जहँ डोलौं सो परिकरमा/जो कुछ करौं सो पूजा/जब सोवौं तब करौं दण्डवत भाव मिटाओं दूजा।"अपनी इसी सहजता के कारण ही श्री महन्थ रामश्रयदास अपने जीवन काल में असहज परिस्थितियों का सामना भी हंसते खिलखिलाते हुए किया करते थे।वास्तव में सहजता ही परम आनंद का स्रोत है यह रहस्य सन्तजन से बेहतर कौन जानता है?महन्थ जी इस रहस्य को जानते थे और कबीर साहेब की कथनी के अनुरूप अपनी दिनचर्या को ढाल लिए थे।"भक्ति नारदी मगन शरीरा/यह विधि भवतरि कहैं कबीरा।" साधारण भोजन ,अति साधारण रहन सहन लेकिन  हमेशा आध्यात्मिक ऊंचाई के शिखर पर आसनस्थ दिखाई देते थे। लोग मंदिर जाते हैं ,परिक्रमा करते हैं।परमात्मा की परिक्रमा एक भाव है।यह एक प्रार्थनापूर्ण हृदय का भाव है।इसलिए जरा भी हिलना डुलना उसकी परिक्रमा है ,जो भी किया जा रहा है वह उसका ही काम है,वही पूजा है।अलग से मंदिर जाकर क्या साष्टांग लेटना?रात को जब सोने जाय बिस्तर पर तो वही दण्डवत है।भावभजन करते करते सन 1972 में महन्थ जी ने अपने गुरु का अनुसरण करते हुए उच्चशिक्षा का प्रसार करने के उद्देश्य से इस दूरस्थ क्षेत्र में डिग्री कॉलेज की स्थापना किये जो आगामी सितम्बर माह में पचास वर्ष पूर्ण कर  स्वर्ण जयंती वर्ष मनाएगा।गाजीपुर जनपद के पश्चिमी छोर पर स्थिति यह महाविद्यालय उनकी  साधना और त्याग का प्रसाद है।आज दिन भी गाजीपुर या आस पास ही नहीं वरन पूर्वांचल के कई जिले इस ज्ञानकेन्द्र से लाभान्वित हो रहे हैं। भौतिकता की चकाचौंध भरी इस दुनियां में श्री महन्थ रामश्रयदास जी का स्थूल शरीर हमारे बीच नहीं है लेकिन उनकी यशः काया मानवता के सन्ताप का क्षय करती रहेगी और अंत में "फकीराना तबियत थी मिले जो बांट देते थे.."के साथ पुण्य स्मरण करते हुए  महन्थ जी की सूक्ष्म उपस्थिति को साहेब सतनाम!

डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र

असिस्टेंट प्रोफेसर,अंग्रेजी

श्री म.रा. दा. पी.जी.कालेज

भुड़कुड़ा,गाजीपुर

Friday, 24 December 2021

समानता के बिना आजादी निरर्थक है,अधूरी है,बेकार है-श्री मनोज सिन्हा


इन दिनों जम्बू कश्मीर के महामहिम उपराज्यपाल श्री मनोज सिन्हा अपने गृहजनपद गाजीपुर( लहुरी काशी )में तीन दिन के प्रवास पर हैं।24 दिसम्बर को उन्होंने उत्थान फाउंडेशन द्वारा आयोजित "विकसित वैभवशाली भारत निर्माण में समाज के अंतिम व्यक्ति की अनिवार्य सहभागिता"विषयक संगोष्ठी को सम्बोधित किया तथा 25 दिसम्बर को जखनियां में एक विद्यालय के वार्षिकोत्सव में भाग लेने के उपरांत सिद्धपीठ हथियाराम मठ पर मां वृद्धम्बिका का दर्शन पूजन करेंगे।इसके पश्चात मठ के महन्थ और जूना अखाड़ा के वरिष्ठ महामंडलेश्वर स्वामी भवानीनन्दन यति महाराज का आशीर्वाद प्राप्त करके दिल्ली के लिए प्रस्थान करेंगे।मोहनपुरवा से महामहिम बनने की उनकी यात्रा अत्यंत संघर्षो भरी रही है।जिले से लेकर राष्ट्रीय राजनीति तक का तेवर और कलेवर तो बदला लेकिन एक चीज में कोई परिवर्तन नहीं हुआ,और वह है श्री मनोज सिन्हा की राजनीतिक प्रतिबद्धता।गृह जनपद हो,दिल्ली हो या जम्बू कश्मीर ऐसा प्रतीत होता है कि मानस के रचयिता सन्त कवि तुलसीदास की यह उक्ति  "निसिचर हीन करहुँ महि भुज उठाय प्रण कीन्ह" श्री सिन्हा के राजनीतिक जीवन का ध्येय बन गया है।जिले का प्रतिनिधित्व करते हुए उन्होंने राजनीति को अपराधियों के चंगुल से मुक्त कराने की दिशा में न्यायालय और जनता के न्यायालय दोनों जगह निर्भीक तरीके से निरन्तर प्रयास किया जिसके परिणामस्वरूप अब गाजीपुर का वातावरण बदलने लगा है।2018 में जिस विश्वामित्र मेडिकल कालेज की आधारशिला रखी गई थी अब उसका लोकार्पण हो चुका है।गाजीपुर से पटना ग्रीन फील्ड एक्सप्रेस वे बनाने का काम शुरू हो चुका है।ये बड़े बदलाव के कुछ उदाहरण हैं।उनके चरित्रबल,आत्मविश्वास, रचनाधर्मिता का संज्ञान लेकर केंद्रीय नेतृत्व ने उन्हें 2020 में गुरूतर दायित्व सौंपा जिसे स्वीकार करते हुए वे स्वयं को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकास यज्ञ में गाजीपुर का सिपाही बताते हुए पूरी निष्ठा और क्षमता से अहर्निश लगे हुए हैं।उत्थान फाउंडेशन में संगोष्ठी को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा की वे देश में जहां भी होते हैं गाजीपुर का गर्जन हैं।उनके अंदर जो चिन्गारी निरन्तर जलती है,वास्तव में वह गाजीपुर की है।मेरे लिए इससे बड़ा कोई परिचय नहीं है कि मैं आपका अपना हूँ और चालीस लाख के परिवार का एक सदस्य हूँ।निष्ठा, प्रेम,साहस,विनम्रता,और सहिष्णुता गाजीपुर की मिट्टी के साथ मेरे शरीर में इस तरह चिपकी है कि तमाम कठिनाइयों के बावजूद मेरा कदम एक पल भी कहीं डगमगाया नहीं।वर्ष 2014 में जनता के कारण एक बड़ा परिवर्तन देश में हुआ।ऐसा लगता है कि यह परिवर्तन देश के गरीबों के कारण हुआ।समानता के बिना आजादी निरर्थक है,अधूरी है,बेकार है।सामाजिक न्याय और आर्थिक न्याय के बिना समानता का कोई अर्थ नहीं है।डॉ. लोहिया को उधृत करते हुए वे अपने सम्बोधन में कहते हैं कि सांप को छेड़ना नहीं चाहिए और छेड़ दिया तो छोड़ना नहीं चाहिए।इस देश में चंद लोगों ने जरूरी मुद्दों को छेड़ा तो लेकिन छोड़ भी दिया।विकास की कतार में खड़े आखिरी व्यक्ति तक पहुंचने की सिर्फ नारेबाजी हुई।अपने वक्तव्य के अंत में याददाश्त को कमजोर बताते हुए आगाह करना नहीं भूले कि लक्ष्य बड़ा होने पर समाज को छोटे छोटे स्वार्थों की तिलांजलि देना सीखना होगा अन्यथा पीढ़ियों को दुष्परिणाम भुगतना पड़ेगा। आज जन आकांक्षाओं पर खरा उतरने की कोशिश करते हुए श्री सिन्हा आतंकवाद की समाप्ति के लिए पूर्णतया प्रतिबद्ध हैं और विकास की पटकथा लिखते हुए आगे बढ़ रहे हैं।जनता का विश्वास जीतना उन्हें आता है।संवाद की शक्ति को वे भलीभांति जानते हैं तथा स्थानीय लोगों से रिश्ता बनाने के क्रम में कश्मीरी भी सीख रहे हैं।आज सामान्य आदमी के लिए भी राजभवन के दरवाजे खुले हुए हैं तो इसका श्रेय श्री मनोज सिन्हा को जाता है।

डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र 

असिस्टेंट प्रोफेसर (अंग्रेजी)

पी जी कालेज भुड़कुड़ा,गाजीपुर


Tuesday, 23 November 2021

शहीद किसी गांव या परिवार के नहीं अपितु राष्ट्र भारत की संपत्ति हैं:स्वामी भवानीनन्दन यति




स्वाधीनता की 75वीं वर्षगांठ सम्पूर्ण देश में अमृतमहोत्सव के रूप में मनाई जा रही है।इस उपलक्ष्य में विविध कार्यक्रमो के माध्यम से मां भारती के लिए शहीद हुए रणबाकुरों को समाज द्वारा श्रद्धापूर्वक याद करने का क्रम चल रहा है।इसी कड़ी में अदम्य साहस,शौर्य तथा पराक्रम से दुश्मन को परास्त करने वाले महावीरचक्र विजेता शहीद रामउग्रह पांडेय का पचासवाँ बलिदान दिवस शहीद पार्क एमाबंशी में सिद्धपीठ हथियाराम मठ के पूज्य महन्थ स्वामी भवानीनन्दन यति जी की अध्यक्षता में आदर और सम्मान के साथ मनाया गया।अमृतमहोत्सव आयोजन समिति काशी के सह संयोजक डॉ.सन्तोष कुमार सिंह यादव ने अपने सम्बोधन में देश के लिए बलिदान होने की भारतीय संस्कृति का उल्लेख विस्तारपूर्वक करते हुए बंगाल के सन्यासी आंदोलन का जिक्र किया।अंग्रेजों के दमन और शोषण के विरुद्ध भारत के सन्यासियों ने लोगों को एकत्रित करके प्रतिकार किया और स्वाधीनता आंदोलन की पीठिका तैयार किये।सन्त महात्माओं ने एकांतिक जीवन जीते हुए केवल भजन ही नहीं किया है अपितु आवश्यकता पड़ने पर राष्ट्र और समाज के सरोकारों से सदैव स्वयं को जोड़ा है और नेतृत्व भी प्रदान किया है।उन्होंने कहा कि समाज का यह दायित्व है कि शहीद के सम्मान में आयोजित होने वाले कार्यक्रम को विशेष प्राथमिकता देते हुए हजार काम छोड़कर प्रतिभाग करे।कुछ अविभावक अपने उन बच्चों के जन्मदिन और विवाह की वर्षगांठ मनाने के नाम पर धन का दुरपयोग करते हैं जिनकी दिनचर्या में शराब  शामिल है।अपसंस्कृति को बढ़ावा देने तथा धन का अपव्यय करने से श्रेयष्कर है कि देश के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले शहीदों का जन्मदिन और शहादत दिवस हम मिलकर मनाएँ।कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए पी जी कालेज भुड़कुड़ा के अंग्रेजी विभागाध्यक्ष  डॉ. सन्तोष मिश्र ने कहा कि हम राम और कृष्ण के वंशज हैं।हम रणक्षेत्र में पीठ नहीं दिखाते।रघुवंश की परंपरा का जिक्र करते हुए महाकवि तुलसीदास जी कहते हैं कि जिन्ह के लहहिं न रिपु रन पीठी।शहीद रामउग्रह पांडेय ने युद्धभूमि में पीठ नहीं दिखते हुए अपना शीश वार दिया और मातृभूमि की रक्षा की।कार्यक्रम में सेना की ओर से शहीद रामउग्रह पांडेय की प्रतिमा पर पुष्पचक्र अर्पित कर पूरे सैन्य सम्मान के साथ सलामी दी गई।मुख्य अतिथि के रूप में राज्य सूचना आयुक्त उत्तर प्रदेश सरकार श्रीमती किरणबाला चौधरी,प्रदेश सरकार में मंत्री डॉ. संगीता बलवंत,दर्जाप्राप्त मंत्री श्री प्रभुनाथ चौहान ने पुष्प अर्पित कर शासन की ओर से शहीद परिवार के प्रति कृतज्ञता व्यक्त किया तथा अपने सम्बोधन में शहीद परिवार की समस्याओं के निराकरण का आश्वासन भी दिया।इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक श्री कमलेश जी,श्रीमान सुरेश जी, कन्या महाविद्यायल हथियाराम के प्राचार्य डॉ. रत्नाकर त्रिपाठी,अभयानंद जी,सर्वेश पांडेय,अशोक चौहान,विजयबहादुर सिंह,भुल्लन सिंह,विवेकानंद गिरी,चन्द्रिका चौबे,डॉ विनोद पांडेय,संजय सिंह आदि उपस्थित थे।कार्यक्रम का संचालन श्रीराम जायसवाल ने किया।महाराजश्री के अध्यक्षीय उदबोधन के उपरान्त राष्ट्रगान द्वारा कार्यक्रम का समापन हुआ।

Saturday, 2 October 2021

मनुष्यता के मार्ग पर चलने का मंत्र हैं महात्मा गांधी


 


भारत वर्ष में पञ्चांग के अनुसार क्वार मास अत्यंत महत्वपूर्ण है।इस मास केआरम्भिक पन्द्रह दिनों को पुरखों का स्मरण करते हुए अर्पण तर्पण के साथ पिण्डदान कर पितृपक्ष के रूप में मनाया जाता है।राष्ट्रपिता महात्मा गांधी इस देश के धर्मपरायण पुरखा हैं।पितृपक्ष में अपने इस पुरखे का स्मरण करना हमारा धर्म बनता है।वे नियमित रूप से मन्दिर जाते थे,गीता का पाठ भी किया करते थे तथा कर्मयोग के सन्देश को जीवन का पाथेय बनाया। इस वर्ष उनकी जन्मजयंती पितृपक्ष में ही पड़ रही है।उनके सामाजिक राजनीतिक क्रियाकलापों की चर्चा प्रत्येक व्यक्ति द्वारा सम्पूर्ण देश में होती है।राजनीतिक मंच से तो गांधी का नाम लिए बिना बात ही पूरी और पुष्ट नहीं हो पाती है।परन्तु गांधी पर लच्छेदार बकबक से ज्यादा आवश्यक है कि हम उनके सिद्धान्तों को जीवन में उतारें।कथनी और करनी के अंतर को मिटा न पाएं,तो कम करने का प्रयास करें।स्वयं गांधी का यह विचार था कि लंबे लंबे भाषणों से से कहीं अधिक मूल्यवान है इंचभर कदम बढ़ाना।कोई गांधी को मजबूरी का नाम कहता है ,कोई मजबूती का नाम महात्मा गांधी कहता है,कोई उन्हें अतीत बताता है तो कोई भविष्य कहता है ।वास्तव में महात्मा गांधी मनुष्यता के मार्ग पर चलने का मंत्र हैं।भारत ही नहीं वरन आधुनिक विश्व को इस मन्त्र की आवश्यकता है।मोटे तौर पर कुछ लोग गांधी के विचारों से सहमत होंगे और कुछ असहमत भी होंगे लेकिन गांधी के व्यक्तित्व को अनदेखा नहीं किया जा सकता।विज्ञान अपने अविष्कारों से जनता को अनेक सुविधाएं प्रदान कर सकता है।वह अनेक प्रकार की भौतिक सुख सुविधाएं प्रदान कर सकता है परन्तु उसमें यह सामर्थ नहीं है कि वह मनुष्य के नैतिक स्तर को ऊंचा उठा दे।आज धन की सत्ता सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त है।विश्व का कौन सा अनर्थ है जो आज अर्थ के बल पर और अर्थ के लिए नहीं किया जाता है?अन्याय,शोषण,हिंसा ,भ्रष्टाचार,आतंकवाद, विस्तारवाद और वर्चस्ववाद स्थापित करने की जड़ में पैसा है।अर्थ की प्रधानता के कारण आधुनिक मनुष्य अपना लक्ष्य,दायित्व और कर्तव्य भूल गया है।अर्थ के कारण ही हमारी दृष्टि में श्रम की प्रतिष्ठा न के बराबर रह गई है।पीड़ित मनुष्यता की सभी समस्याओं का समाधान गांधी के पास है।गांधी प्रतिशोध के माध्यम से शक्ति का क्षरण नहीं करते हैं क्योंकि उन्हें प्रतिरोध की शक्ति पर पूर्ण विश्वास है।शोषण,अन्याय,अत्याचार के विरुद्ध अहिंसात्मक प्रतिरोध तथा सत्य की पक्षधरता ने मोहनदास करमचंद गांधी को महात्मा गांधी बना दिया।टिकट लेकर यात्रा के दौरान चलती ट्रेन के डिब्बे से सामान सहित फेंके जाने के बाद उन्होंने ऐसा प्रतिरोध दर्ज कराया कि अंग्रेजों को भारत से दुम दबाकर भागना पड़ा।सन1939 में गांधी ने हिटलर को एक पत्र लिखा कि तुम लड़ाई मत करो और चर्चिल को भी पत्र लिखकर अस्त्रशस्त्र फेंकने के लिए कहा।दुनियां के दो शक्तिशाली राष्ट्राध्यक्षों को पत्र के द्वारा शांति और अहिंसा का पाठ पढ़ाने की कोशिश को उस समय लोगों ने गांधी का पागलपन तक कह डाला लेकिन यह पागलपन नहीं अपितु उनके उच्च नैतिक स्तर और मानवता प्रेमी होने का उदाहरण है।आजकल तो एक ओर शस्त्र निरस्त्रीकरण सन्धि हो रही है तो दूसरी तरफ हथियारों का सौदा भी हो रहा है।गांधी के देश में ही गांधी के नाम का कसीदा पढ़ने वालों द्वारा धार्मिक उन्माद, पक्षपात,वैमनस्य और जाति आधारित राजनीति का बीजारोपण कर चुनावी फसल काटने की लगातार कोशिश हो रही है।वोट बटोरने की गरज से मन्दिर की देहरी पर जाने का प्रचलन शुरू हो गया है।भारत में अपने को कार्ल मार्क्स का अनुयायी बताने वाले भी गांधी के व्यक्तित्व के आगे शरणागत हैं।आत्मा की आवाज को अनसुना करके आडम्बर को अपनाकर क्षणिक सफलता तो प्राप्त किया जा सकता है परन्तु साधन की पवित्रता के बिना सुख,शांति और समरसता का भाव नहीं आ सकता।सबको सन्मति दें भगवान की प्रार्थना के साथ जन्मजयंती के अवसर पर गांधी के प्रति सच्ची श्रद्धा और कृतज्ञता । 

डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र 

असिस्टेंट प्रोफेसर(अंग्रेजी) 

पी.जी.कालेज भुड़कुड़ा, गाजीपुर

Tuesday, 21 September 2021

Comrades Ko Murti Puja Nahin Aati: A review of a newly published and released poetic collection

 



 Today's man is living a life 0 conflict in which he does not have the leisure to think for himself. If someone is engaged in giving direction to the life of the common man, then this is a big task. Madhav Krishna, a budding writer, thinker and also a poet full of possibilities, has taken the lead in this big work by making writing a medium. The first condition of being a poet or a literary artist is to be a human being. The meaning of being a human being is greater than anything else. The literary creation done from the narrowness of caste, religion, gender, language, region and debate by keeping humanity on the throne is not good for the whole society .When a person is sensitized by the events around him and the writing becomes active with a spontaneous spirit, he will be able to show the way to the creation society. At the same time, the name of a perfect person and poet full of feelings is Madhav Krishna, whose effort is to see the world from Kabir's point of view and to inspire the society to grow on the path of life by imbibing Krishna's Karmayoga. He is averse to bargaining of sweat and hard work(Paseene Aur Mehanat Ke Molbhav Se ...) and in the eyes of the poet, "Dharma Palayan Nahin , Dharma Nishkam Karma Aur Sumiran". He considers Nirguna and Saguna not competitive or antagonistic but complementary. Introducing the poet's impeccable personality, knowledge of the past and insights of the future, the collection presents an account of contemporary activities where much is being written to write, but if something worth reading is written, it will be nothing less than a gift and achievement for the reader. The ideal reader is in the role of a critic. No work is good or bad, interesting or distasteful for him. A concerted effort is being made to mislead, cautioning that the poet says that 'Puch Agar Kuch Galat Dikh Raha, Uttar Apane Thop Nahin Samajh Jara Sandarbhon Ko Bhi, Jhuthe Lal Salam Na Kar'(Ask if something is wrong / do not impose your answer / understand even the references / do not do false red salam). These days, Hindi Diwas week and fortnight is being celebrated across the country, it is the season to read the ballads to establish Hindi on the global stage, but if anyone is causing maximum harm to Hindi, then they are the stage poets of Hindi who, apart from reading poetry, do everything. They do what are unexpected from the platform and are taking Hindi to the trough. Meaningless stage presentation just for the sake of money will neither enhance the value of Hindi nor will it get worldwide recognition. Agyeya says that write less, don't write without knowing. Reading the collection of poetry, it can be said that the poet Madhav has expressed with the help of symbols after knowing and understanding the situation of the country. The newly published poetic collection 'Comrades Ko Murti Puja Nahi Aati' is a set of various expressions that will delight the literary lovers as well as show the way to the society. In the end, an invitation to a continuous struggle against social evils Hearty congratulations to the rich poet Madhav Krishna of multi-faceted personality on the release of this useful work with the lines 'Yodhdha Parajit Ho Bhale, Ladana Nahin Par Band Ho (Warrior may be defeated / yet fight not stop).

 Dr. Santosh Kumar Mishra

Assistant Professor (English)

 PG College Bhudkuda, Ghazipur