
श्रद्धेय यति जी महाराज, उपस्थित अन्य सभी संत गण, इस परिसर के सभी नागरिक सज्जन, माता भगिनी! संतों की एक विशेषता होती है कि परम अणु, परमाणु को भी पहाड़ जैसा बड़ा बनाते हैं। परमाणु समझते हैं न; एटम। इतना सूक्ष्म भी किसी में मिल जाय.. थोड़ा सा तो उसको वो बड़ा करके हिमालय जैसा बताते हैं और अपने स्वयं को तो आत्म विलोकी ही रखते हैं। मेरे बारे में जो कुछ कहा गया है अब तक.... महाराज जी ने जो भी कहा है उसे ऐसा ही मानिए। यह संतो का स्वभाव होता है। क्योंकि ये सारे काम श्रीराम की प्रतिष्ठा आदि महाराज जी ने बताई, इसमें मैं अकेला थोड़े ही हूं, पूरा भारत वर्ष खड़ा हो गया, उसी का प्रताप है, संत महात्माओं का आशीर्वाद है, श्रीराम की इच्छा है। मुझे ऐसी जगह पर रख दिया है कि फोटो उठाएं तो मेरा ही उठता है। ब्रिटेन के एक प्रधानमन्त्री थे द्वितीय विश्वयुद्ध के समय चर्चिल। इंगलैंड विजई हो गया तो लोगों ने चर्चिल का अभिनंदन किया; सार्वजनिक अभिनंदन और उसमें उनका वर्णन करते समय एक वक्ता ने कहा कि He was the Lion of England (इंगलैंड के शेर थे)। अपने अभिनंदन का उत्तर देते समय चर्चिल ने कहा कि I was not the lion you were the lions.I only roared for you. मैं सिंह नहीं था असली सिंह तो आपलोग थे। आपके तरफ से गुर्राने का काम मुझे दिया था वो मैं किया। मुझे जहां बिठाया है आपने वहां मुझे गुर्राने का ही काम करना पड़ता है, शेरों के होते हुए, क्योंकि शेर व्यस्त रहते हैं। उनके पास गुर्राने का समय नहीं होता, वे काम करते हैं, बोलने का काम हम करते हैं। बस इतना ही है। वो जितना काम करते हैं वैसा ही हम बोल सकते हैं। इन सब बातों का जिनका वर्णन किया उसका श्रेय यदि किसी को है तो संतो के आशीर्वाद को है, उनके सहयोग को है, सभी कार्यकर्ताओं के परिश्रम को है और हमारे समाज की अमिट ऊर्जा को है क्योंकि मैंने कहा न कि श्रीराम की इच्छा। वास्तव में हमारे देश में तो यही माना जाता है कि उसकी इच्छा से ही सब कुछ होता है। योगी अरविंद ने कहा कि सनातन धर्म का उत्थान हो यह भगवान की इच्छा है और जब जब सनातन धर्म का उत्थान आवश्यक हो जाता है, हिन्दू राष्ट्र का, भारत वर्ष का उत्थान भगवान करते हैं। वह समय आया है इसलिए हिन्दू राष्ट्र का उत्थान अनिवार्य है। यह बातें वे सवा सौ साल पहले कह के गए। वह प्रक्रिया हम आज अनुभव करते हैं। ये सब कुछ हो रहा है और नियति के एक सूत्र के अनुसार हो रहा है।हमारी बहादुरी उसमें यह है कि नियति अपना काम कर रही है तो धर्म कार्य का, सद्कार्य का,मानवता के कल्याण का निमित्त हम बनें। हम हाथ पर हाथ धरे बैठे तमाशा न देखते रहें। हम भी जैसे उस सेतुबन्धन के कार्य में एक गिलहरी भी लगी थी। वैसे देखा जाय तो इतना बड़ा रामसेतु आज भी दिखता है समुद्र में पानी के अन्दर। ऐसा रामसेतु बनाने का वो महान काम उसमें गिलहरी ने क्या किया? दो चार कण लाकर डाल दिए। गिनती में वह काम छोटा हो सकता है लेकिन यदि गिलहरी बोल सकती तो अपने नाती पोतों को बताती, वो लोग अपने नाती पोतों को बताते और आज अगर उस गिलहरी के वंशज कहीं हैं तो उनके बच्चे बताते कि हमारा कुल वो है जिसने राम के कार्य में मदद की थी। जिसमें हम शामिल थे।... एक छोटा सा भी काम करने से या उसमें लगने से अपना पूरा जीवन सार्थक हो जाता है।हमारा कर्तव्य यह बनता है कि नियति अपना काम करेगी, प्रकृति अपना चक्र पूरा करेगी, भगवान की इच्छा से जो होता है वह होगा। भगवान की इच्छा से जो हो रहा है उसमें अपना हाथ लग जाय...। ये काम हमको करना है इस बुद्धि से हम कर रहे हैं। इसलिए ऐसे स्थानों पर जब मैं जाता हूं तो पाथेय देने के लिए , मार्गदर्शन के लिए कत्तई नहीं जाता हूं । हम यहां से अपनी बैटरी चार्ज करके जाते हैं। ये धर्म के स्थान हैं, ये आध्यात्म के स्थान हैं केवल स्थान नहीं ऐसे स्थान हैं जहां पच्चीस पीढ़ियों की साधना निरंतर चल रही है देश कार्य में, देव कार्य में, धर्म कार्य में। हमने तीन अलग अलग शब्द प्रयोग किए लेकिन हमारे यहां तीनों शब्दों के एक ही मायने हैं। भारत वर्ष मतलब सनातन धर्म, सनातन धर्म मतलब भगवान की इच्छा।तो देव,देश और धर्म हमारे यहां अलग अलग नहीं है और इन सब को हमारे यहां मानवता से जोड़ा गया है। हमारा धर्म दूसरों पर लादने के लिए नहीं है, मानवता को बढ़ाने के लिए है। भारत बड़ा होता है सारी दुनियां को अच्छे रास्ते पर बढ़ाने के लिए। भारत में भगवान की पूजा भगवान के लिए नहीं होती। भगवान को क्या जरूरत है? वो तो सर्व ऐश्वर्य संपन्न हैं लेकिन हम उनकी पूजा करके अपने आप को पुष्ट करते हैं, अपने स्व का अनुभव करते हैं, आत्मस्वरुप का दर्शन करते हैं। हमारी उनके साथ भक्ति हमको अंततोगत्वा उनके साथ कैसे एकरूप वास्तव में होना है यह बताती है। यह हथियाराम मठ है, यहां सिद्धिदात्री का निवास है,वो मृणमयी स्वरूप है यानी मिट्टी की मूर्ति है। मिट्टी क्या है?जो हमको बनाती भी है और हमको धारण भी करती है। मिट्टी का बना देह है हमारा। मिट्टी नहीं होगी तो हम खड़े नहीं होंगे और मिट्टी नहीं होगी तो हम बनेंगे भी नहीं। इसलिए यह सिद्धिदात्री भी हैं और जगतधात्री भी हैं।उसकी यहां आराधना होती है और आराधना करने वाले केवल मन्दिर में पूजा नहीं करते कुछ शिक्षा के कार्य, स्वास्थ्य के कार्य, राष्ट्र में जब जब कभी उत्थान का प्रसंग आता है उसमें समाज के साथ सहभाग उसमें सहयोग करते हैं।ये सारा कार्य पिछले पच्चीस पीढ़ी से करते आए हैं और आज भी वह तपस्या चल रही है।ऐसा जहां पर चलता रहता है वह प्रेरणा का जीवंत स्थान होता है। इसीलिए मैंने महाराज जी को कह दिया कि मैं आऊंगा। फिर महाराज जी का पत्र भी आ गया। मैंने निश्चित किया की जाऊंगा,अवश्य जाऊंगा। अनिल जी और रमेश जी से चर्चा किए क्योंकि उनका मन तो मेरे ही जैसा है। मेरा सौभाग्य है कि वह समय जल्दी आ गया और ऐसे समय पर आ गया जब महाराज श्री के इस पीठ पर पच्चीस वर्ष पूरा होकर छब्बीस वर्ष प्रारंभ हुआ,वह भी ऐसा दिन निकला जिस दिन हम देश के लिए प्राण अर्पण किए शहीदों की स्मृति में मना रहे है। यह इसलिए संभव हुआ कि मेरे कार्यकर्ताओं ने यह समय निकाला तथा महाराज श्री ने बुलाया। उनके प्रति मेरे मन में अपार कृतज्ञता है। मेरा जो लक्ष्य था बैटरी रिचार्ज करने जाना वह तिगुना सफल हो गया।आपसब लोगों के दर्शन उसके साथ हो गए। अपना देश है, अपने देश की भूमि है, जल जंगल, जानवर सब कुछ देखने लायक है। वास्तव में अपनत्व का भाव लेकर देश में कहीं भी जायेंगे तो जगतजननी का साक्षात्कार मिलेगा।
(प.पू.सरसंघचालक डॉ मोहनराव भागवत जी द्वारा दिनांक 23/03/2022 को सिद्धपीठ हथियाराम मठ में दिए गए संबोधन का संपादित अंश)
डॉ. संतोष कुमार मिश्र
असिस्टेंट प्रोफ़ेसर अंग्रेजी
पी.जी.कालेज भुड़कुड़ा, गाजीपुर