Friday, 24 April 2020

गाँव हमारे सामाजिक जीवन के केंद्र



आज 24 अप्रैल को भारत पंचायतीराज दिवस मनाता है।इसकी शुरुआत आज ही के दिन सन 1993 में 73वें संविधान संशोधन के साथ हुई।दरअसल बापू ने ग्राम स्वराज का सपना देखा था और वे मानते थे कि अगर देश के गांवों के ऊपर खतरा पैदा हुआ तो भारत को खतरा होगा।पंचायतीराज व्यवस्था को लागू करने के पीछे यही सोच काम कर रही थी।इसका मक़सद गांव को आत्मनिर्भर बनाना और पूर्ण स्वायत्तता देना था जिससे लोकतंत्र निचले स्तर पर भी पल्लवित पुष्पित हो।असली भारत तो यहां के गांवों में ही बसता है।ब्रिटिश शासक भारत के इन आत्मनिर्भरता के केंद्रों को पूर्णतया विनष्ट करना चाहते थे जिसका आधार बनी 1830 में गवर्नर जनरल सर चार्ल्स मेटकाफ की रिपोर्ट।चार्ल्स मेटकाफ के मुताबिक भारत के ग्राम समुदाय एक प्रकार के छोटे छोटे गणराज्य हैं जो अपने लिए आवश्यक सभी सामग्री की व्यवस्था कर लेते हैं तथा किसी प्रकार के बाहरी सम्पर्क से मुक्त हैं।इस बात को समझकर भारत के गांवों को तबाह करने में अंग्रेज काफी हद तक कामयाब रहे उनके जाने के बाद अपने को गांधी का अनुयायी मानने वाले सत्ता सम्हाले लेकिन गांव की बदहाली बनी रही।आज देश में पंचायती राज व्यवस्था लागू है।लगभग देश की सभी पंचायतें ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क से जुड़ गई हैं।गांव का सरपंच सीधे अपने प्रदेश या देश के नेतृत्व के साथ आज सहजता से संवाद स्थापित कर रहा है।अपने गांव की जरूरत के मुताबिक मुखिया केंद्र या प्रदेश नेतृत्व से परामर्श कर स्थानीय संसाधनों का सही और समुचित प्रयोग कर सकता है।आज बदलाव तो जरूर दिखाई दे रहा है लेकिन यह काफी नहीं है।गांव में शिक्षा, चिकित्सा,और रोजगार के अवसर का उचित प्रबंध करने की आवश्यकता है।आज सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता में गांव ही हैं।यह बात जरूर है कि गांव को भी अपने सरपंच या प्रधान  चुनने में तथा अपनी प्राथमिकता तय करते समय गांव की आत्मनिर्भरता और स्वायत्तता को ही प्रथम वरीयता देना होगा।हमारी ग्रामसभाएं राजनीति का अखाड़ा बन गई हैं जहां प्रधान या सरपंच का चुनाव लोकतंत्र का पर्व न होकर गांव पर कब्जा करने का अवसर बन जाया करता है।  जिस प्रकार ब्लाक प्रमुख और जिलापंचायत के अध्यक्ष का चुनाव सम्पन्न होता है वह किसी से छिपा नहीं है। उसे देखकर यह संशय पैदा होना स्वाभाविक है कि क्या यही परिकल्पना रही होगी पंचायतीराज व्यवस्था का ख़ाका तैयार करते समय?गांव खुशहाल हों,वाद का निबटारा संवाद से हो, आत्मनिर्भरता बढ़े और पलायन रुके इसी आकांक्षा के साथ सभी पंचायत प्रतिनिधियों को दिन विशेष की बधाई।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
पी.जी.कालेज,भुड़कुड़ा,गाजीपुर

Sunday, 19 April 2020

ग्रामीण भारत और प्रवासी मजदूरों की विशेष चिंता का समय

                                                 

पूरी दुनिया कोरोना महामारी से त्राहि त्राहि कर रही है।भारत भी इस संकट से जूझ रहा है।सम्पूर्ण देश में लॉक डाउन है।कुछ लोग भययुक्त वातावरण में घरों में कैद हैं।तो वहीं अपने पसीने की बदौलत स्वयं भूखे रहकर औरों की भूख मिटाने वाले बेबस और बेघर लोग मारे मारे फिर रहे हैं।सपनों की तलाश में गांव से शहर आये इन लोगों को इस महामारी के कारण उपजी सामाजिक असुरक्षा की भावनाअपने गांव जाने हेतु प्रेरित कर रही है जिसके फलस्वरूप ये हत भाग्य नागरिक बन्धु राजनीतिक लोगों के छल का शिकार भी हो रहे हैं।अचानक बस स्टैंड या रेलवे स्टेशन पर जमा भीड़ इस बात का उदाहरण है।इनमें से कुछ राशन की दुकान पर तो कोई बैंक में लाइन लगाए खड़ा है।जनजीवन की सुरक्षा, उदरपूर्ति और बहाली सरकार के लिए चुनौती बनी है।जब कभी मजदूर यूनियन के आवाहन पर या विभिन्न संगठनों के आवाहन पर हड़ताल हुआ करती है तो होने वाले नुकसान का आंकलन किया जाता है तथा हड़ताल वापस कराने का प्रयास भी होता है।लॉक डाउन अपने नागरिकों को सुरक्षित रखने की दृष्टि से सरकार द्वारा समय पर उठाया गया अभूतपूर्व कदम है लेकिन इस लॉक डाउन के दौरान ही हमें इससे होने वाले नुकसान से उबरने के बारे में और इसके खिलाफ कारगर लड़ाई लड़ने की दिशा में गम्भीरता पूर्वक सोचना चाहिए तथा भविष्य का खाका भी तैयार करना होगा।हमें ही नहीं पूरे विश्व को अपनी भौगोलिक सीमाओं का विस्तार करने,भोग बिलास की वस्तुओं का अविष्कार करने ,सामूहिक नरसंहार के हथियार बनाने,खरीदने,बेंचने और शस्त्र निरस्त्रीकरण सन्धि से आगे जाकर विश्व ग्राम की अवधारणा के प्रकाश में मानवता के बारे में सोचने की जरूरत है।संयोग से देश दत्तोपंत ठेंगड़ी जैसे महान विचारक का जन्म-शताब्दी वर्ष भी मना रहा है।उनका चिंतन अमल में लाने की आवश्यकता है।अगर देश की  सरकार इस बात का स्मरण रखते हुए नीतियों का निर्धारण करेगी कि 'जीविका के लिए जीवन रेहन न रखना पड़े,रोटी इंसान को न खाए 'तब जाकर हम कोरोना के दूरगामी कुप्रभाव से मुक्ति पाएंगे।देश के संसाधन मनुष्य की आवश्यकता पूर्ति के लिए हैं उसके लोभ की पूर्ति या आधिपत्य के लिए नहीं।समय कठिन और चुनौतीपूर्ण जरूर है लेकिन ठेंगड़ी जी के उपरोक्त कथन के केंद्र में जो वर्ग है उसका विशेष ध्यान सरकार को रखना होगा।यही वह वर्ग है जो देश को हमेशा सम्हालता है,आज भी सम्हाले है और आगे भी सम्हालने की कूबत रखता है।हमें बाजारवाद की अवधारणा ने स्वार्थी तरीके से इनके श्रम की शक्ति का बाजार हित मे प्रयोग करना सिखाया जिसके परिणाम स्वरूप इनकीआत्म निर्भरता समाप्त हुई और असन्तुलन बढ़ता गया।आज अवसर है कृतज्ञ भाव से इनको शोषण मुक्त कर इनका सहयोग किया जाय।इनके परिश्रम का सही मोल चुकाया जाय।आज यही वह वर्ग है जो सिर्फअपनी उदरपूर्ति की चिंता में नहीं डूबा है।वह महामारी की भयावहता से अनजान नहीं है लेकिन उसे इस बात की परवाह है कि येन केन प्रकारेण उसका भी पेट पर्दा चलता रहे और लोगों तक सब्जी अनाज दूध पहुंचता रहे।वह मास्क, सेनेटाइजर, और सोशल डिस्टेंसिग की बहसों में  नहीं उलझा है और न ही वह पत्थरबाजी या कोरोना कैरियर बनने में मशरूफ है।उसे तकरीरों और जलसों से भी कुछ लेना देना नहीं है।उसे सम्पूर्ण जीवजगत की चिंता है लेकिन सूबे की सरकारें उन्हें प्रवासी मजदूर से ज्यादा नहीं देख या समझ पा रहीं।सरकार और समाज का यह दायित्व बनता है कि संकट काल मे ग्रामीण भारत और प्रवासी मजदूर  की संज्ञा धारण करने वालों की विशेष चिंता करें जो ठोकरें खाकर,अपनी वास्तविक पहचान खो कर और अपमान का घूंट पीकर भी सड़क,पुल, भवन निर्माण में सतत संलग्न रहने वाले हैं और सदा उत्पाद- उपभोक्ता के बीच की कड़ी बनकर  देश के लिए श्रेष्ठ योगदान दिया है।उनके प्रति संवेदनशील बने रहना लॉक डाउन के बाद की समस्या का समाधान बनेगा।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
पी.जी.कालेज,भुड़कुड़ा, गाजीपुर

Friday, 17 April 2020

भूतपूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर के अनुसार जज्बातों को उभार कर देश की समस्याओं का समाधान नहीं किया जा सकता



अपनी बेबाकी के लिए मशहूर,बलिया के बाबूसाहब, अभूतपूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर जी की आज जन्मजयंती है।भारतीय राजनीति के इस पुरोधा को देश कभी भुला न सकेगा।उनके विचारों की रौशनी देश को रास्ता दिखाने की सामर्थ्य रखती है।साधारण परिवार में जन्मे असाधारण व्यक्तित्व के स्वामी चन्द्रशेखर को पक्ष और विपक्ष बड़े गौर से सुनता था और उनकी अहमियत भलीभांति समझता था।आज सार्वजनिक जीवन और संसदीय राजनीति में ऐसे व्यक्तित्व का अभाव खटकने वाला है।वर्तमान समय में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच की तल्खियां जग जाहिर हैं।संसद में खड़े होकर एक बार उन्होंने चेतावनी भरे लहज़े में  कहा था कि हम नहीं जानते कब किससे जनतंत्र में मदद लेनी पड़ जाय।किसी के चरित्र को गिरा देना आसान है,किसी के व्यक्तित्व को तोड़ देना आसान है लेकिन वैसा किरदार गढ़ना बेहद कठिन है।आज के परिवेश में उनकी कही बात को न केवल समझना होगा बल्कि अमल भी करना होगा।आज संकट के दौर में  राजनीतिक नेतृत्व की खामियां गिनाने और खूबियों का बखान करने में समय गंवाने का नहीं।कोरोना जैसी महामारी के खिलाफ प्रभावी लड़ाई लड़ने के लिए सम्पूर्ण देश को एकदूसरे की मदद के लिए आज खड़े रहने की आवश्यकता है।हमें यह समझना होगा कि राजनीति मुद्दों पर आधारित हो । व्यक्तिगत कटुता और प्रतिशोध के लिए उसमें स्थान नहीं होना चाहिए।कई बार हम जिन विचारों से सहमत नहीं होते हैं उनके नेक कार्यों की अवहेलना करते हुए तर्कहीन निंदा करना आरम्भ कर देते हैं।सम्भव है इससे क्षणिक लाभ मिल जाय लेकिन देश का दीर्घकालिक हित इससे नहीं सधेगा।जज्बातों को उभार कर सरकारें बनाई बिगाड़ी जा सकती हैं लेकिन समस्याओं को नहीं सुलझाया जा सकता ।।हमें अच्छे को अच्छा कहने की आदत डालनी होगी और गलत बातों के विरोध का साहस भी समय समय पर प्रदर्शित करना होगा।युवा तुर्क के लिए समाजवाद मुखौटा नहीं था ।चन्द्रशेखर जी समाजवाद की विचारधारा को जीने वाले व्यक्ति थे,धार्मिक ध्रुवीकरण की मुखालफत करते थे,उदारीकरण और स्वदेशी जैसे परस्पर विरोधी पहल पर सरकार से प्रश्न खड़ा करते थे लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेक कार्यो की सराहना से भी नहीं चूकते थे।उन्नीस सौ निन्यानबे में भरे सदन में खड़े होकर उन्होंने मुक्तकंठ से यह स्वीकार किया कि संघ से हमारा जितना भी विरोध हो वह संगठित,निष्ठावान,संकल्प वाले नवयुवकों का एक संगठन है। प्रधानमंत्री के तौर पर हिंदुत्व के बारे में अपने दृष्टिकोण को उन्होंने सार्वजनिक किया था । प्रतिपक्षी सांसद के रूप में उन्होंने सदन में कहा था कि मुझे इस बात का अभिमान है कि मैं हिन्दू हूँ।सच कहा जाय तो चन्द्रशेखर जी संघर्षों की पैदाइश थे।खुद से रास्ता बनाते हुए बढ़ते गए और राजनीति के शीर्ष पर पहुंचे।प्रधानमंत्री रहते हुए कभी भी वे प्रधानमंत्री निवास में सुख सुविधा भोगने के उद्देश्य से नहीं रहे।दिल्ली से दूर भोंडसी आश्रम ही उनका ठिकाना था।देश के प्रधानमंत्री के रूप में उन्हें अल्प अवधि के लिए सेवा का अवसर प्राप्त हुआ लेकिन कई कारणों से यह कार्यकाल काफी महत्वपूर्ण है। इब्राहीम पट्टी से दिल्ली की दूरी तय करना आसान काम नहीं था।जन्मदिन के अवसर पर सादगी पसन्द सच्चे समाजवादी नायक को कोटिशः नमन।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
पी.जी.कालेज,भुड़कुड़ा-गाजीपुर

Tuesday, 14 April 2020

डॉ. अम्बेडकर को विचारों की ताकत के लिए याद करता है जनमानस-डॉ. सन्तोष


कोरोना महामारी के प्रकोप के चलते सम्पूर्ण देश में लॉक डाउन  लागू है।ऐसे में सोशल डिस्टेंसिग  का पालन करते हुए सादगी के साथ राष्ट्र नायक बाबा साहेब अम्बेडकर को जन्मदिवस पर स्वामी रामकृष्ण इंटर कालेज जाहीं, झोटना, गाज़ीपुर के प्रांगण में आदर पूर्वक याद किया गया।कार्यक्रम को डॉ.इंदीवर रत्न पाठक,जिला प्रमुख अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद गाजीपुर ने वीडियो कांफ्रेंसिंग के द्वारा सम्बोधित किया।अपने सम्बोधन में उन्होंने कहा कि डॉ. अम्बेडकर सच्चे राष्ट्र भक्त थे।उनके विचार राष्ट्र और समाज को दिशा देने में उपयोगी साबित हो सकते हैं लेकिन संकुचित राजनीतिक लाभ के लिए उसकी गलत व्याख्या समाज में दूरी पैदा करेगी।कुछ नासमझ लोग उनको केवल दलित नायक और हितैषी के रूप में प्रचारित करने में लगे हैं जबकि वे सच्चे राष्ट्र नायक  थे।डॉ. अम्बेडकर स्त्री शिक्षा के विशेष हिमायती थे।शिक्षा ही वह माध्यम है जिससे सामाजिक असमानता को दूर कर स्वस्थ समाज की परिकल्पना साकार हो सकती है।कार्यक्रम को पी.जी.कालेज भुड़कुड़ा में प्राध्यापक और चिंतक डॉ. सन्तोष मिश्र ने भी सम्बोधित किया।डॉ. मिश्र ने बाबा साहेब अंबेडकर को समता और स्वतंत्रता का प्रबल पैरोकार बताया।लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि अपने आपको उनका अनुयायी कहने वाले लोग उनके सिद्धान्तों से विमुख होकर जातिगत गोलबंदी, धार्मिक कट्टरता और परिवारवाद में उलझकर रह गए हैं।राजनीति से जुड़े लोग अम्बेडकर को सिर्फ इसलिए याद करते हैं कि उनके नाम के पीछे वोट की ताकत है लेकिन आम जनमानस उनको उनके विचारों की ताकत के कारण याद करता है।जिनका लक्ष्य उनके नाम का प्रयोग कर चुनाव में मत हासिल कर सत्ता हथियाना मात्र रह गया है वे लोग देश की दुर्दशा का कारण बने हैं तथा उनके व्यक्तित्व के साथ सरासर अन्याय कर रहे हैं।हम शिक्षित,संगठित और संघर्षोन्मुख होकर राष्ट्र निर्माता डॉ. अम्बेडकर के सपनों को साकार कर सकते हैंऔर जन्मदिवस पर यही उनको सच्ची श्रद्धांजलि होगी। इस अवसर पर संघ के स्वयं सेवक अमित गिरी ,विपिन गिरी ,अनिल शर्मा,नारायण गिरी आदि उपस्थित थे।कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ ग्रामवासी  सूर्यभान गिरी ने किया।