Friday, 29 May 2020

सच्चे पत्रकार और साहित्यकार होते हैं वास्तविक जनप्रतिनिधि



  
साहित्य और पत्रकारिता का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है।यदि पत्रकारिता तथ्यों एवं विचारों को उदघाटित करती है तो साहित्य अमूर्त भावों और विचारों को अभिव्यक्ति देता है।दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।पत्रकारिता को साहित्य की एक विधा कहना गलत नहीं होगा।खुशवंत सिंह,कुलदीप नैयर,विद्यानिवास मिश्र,अज्ञेय, मनोहर श्याम जोशी और वर्तमान में हृदयनारायण दीक्षित ,वेदप्रताप वैदिक जैसे लोगों की लंबी परम्परा है जिन्होंने लेखक और पत्रकार के श्रेष्ठ दायित्वों का समान रूप से निर्वहन किया है।कुछ समय पूर्व तक पत्रकारिता में प्रवेश के लिए यह जरूरी था कि व्यक्ति का लगाव साहित्य की तरफ हो लेकिन आज ऐसा नहीं है।तकनीक के प्रयोग और पैसे की चमक ने पत्रकारिता को तुलनात्मक रूप से साहित्य से ज्यादा लोकप्रियता का माध्यम बना दिया।फलतःसाहित्य और पत्रकारिता के बीच पहले जैसा रिश्ता नहीं रहा।आज दोनों पर एक दूसरे की उपेक्षा का आरोप लगता है।
   प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के पूर्व से लेकर आजादी के बहत्तर साल बाद तक तमाम उतार चढ़ाव से गुजरते हुए हिंदी पत्रकारिता  194 वर्ष की हो गयी।लगभग इन दो सौ वर्षों में पत्रकारिता की दुनियां में बहुत कुछ घटित हुआ और समाज की बेहतरी के लिए बहुत कुछ करने की सम्भावना भी बाकी है।लोकतांत्रिक व्यवस्था का चौथा और महत्वपूर्ण स्तम्भ पत्रकारिता है।आजादी से पूर्व हिंदी पत्रकारिता के तीन लक्ष्य थे।पहला लक्ष्य था कलम को हथियार बनाकर आजादी हासिल करना,दूसरा साहित्यिक उत्थान और तीसरा समाज सुधार करना।पण्डित युगल किशोर शुक्ल द्वारा सम्पादित उदन्त मार्तण्ड को पहला अख़बार होने का श्रेय जाता है।कलकत्ता (कोलकाता)से 30 मई 1826 को इसका प्रकाशन शुरू हुआ।
    आजादी से पूर्व पत्रकारिता कर्म एक व्रत था और आजादी के बाद यह वृति में बदल गया।आज अर्थ के इस युग में देश और समाज के हित से पहले पत्रकारों के लिए निजी हित याअपने प्रतिष्ठान का हित सर्वोपरि है।यद्यपि कुछ निडर और निर्भीक पत्रकार आज भी खड़े हैं लेकिन जुनून के साथ जूझने के आलावा उनके पास कुछ भी नहीं।यहाँ तक कि परिवार के पालन पोषण का भी संकट है।पत्रकार या सम्पादक को इस बात का सदैव ध्यान रखना चाहिए कि समाचारों  या लेख की आड़ में किसी का प्रचार नहीं होना चाहिए साथ ही यह भी सुनिश्चित हो कि सरकार के प्रति नकारात्मकता फैलाने का यह माध्यम भी न बने।यह काम तलवार की धार पर चलने जैसा है। (We don't go into journalism to be popular.It is our job to seek the truth and put constant pressure on our leaders until we get answer- Helen Thomas)अर्थात पत्रकारिता का उद्देश्य लोकप्रियता बटोरना नहीं है।पत्रकार का काम है सत्य को तलाशना और जवाब पाने के लिए शासकों के ऊपर दबाव डालना।आज के प्रतिष्ठित अख़बारों से जुड़े कुछ नामचीन पत्रकारों ने अपनी निष्ठा को गिरवी रख दिया हैऔर सत्ता- सिंहासन के इर्द गिर्द डोलने बोलने को लक्ष्य बना आर्थिक हित साधने में लगे हैं।पत्रकारिता प्रसिद्धि का माध्यम बन गई है और इसका लक्ष्य सत्य तलाशने की जगह सत्ता में भागीदारी बन गया है।तिलक,गाँधी,डॉ राममनोहर लोहिया,बाबू बनारसीदास ,बद्री विशाल पित्ती,आचार्य नरेंद्र देव,पं.दीनदयाल उपाध्याय ,अटल बिहारी वाजपेयी सरीखे राजनीतिज्ञों ने अपने जीवनकाल में पत्रकारिता के मूल चरित्र को अक्षुण्य बनाये रखा। आज के दौर की पत्रकारिता रास्ते से भटक गयी है।
    समाज में जागरूकता लाना पत्रकार का पहला दायित्व है और इसका निर्वाह करने वाला ही सच्चा पत्रकार है।सच कहें तो हमारे तथाकथित जनप्रतिनिधि दलों की दलदल में फंसे होते हैं लेकिन सच्चे पत्रकार और साहित्यकार वास्तविक जनप्रतिनिधि होते हैं।आज के दौर की पत्रकारिता ने उद्योग का रूप ले लिया है।बड़े बड़े मीडिया हाऊस अस्तित्व में आ गए हैं।आंकड़ों पर गौर करें तो अनुमानतः सवा लाख करोड़ से अधिक का यह उद्योग बन चुका है।राष्ट्रीय एजेंडा निर्धारण में मीडिया की भूमिका भी बढ़ी है लेकिन आधुनिक दौर में संवैधानिक पदों पर आसीन लोगों से समाज की अपेक्षा है कि पत्रकारिता रूपी संस्था को कारोबारी नजरिये से हटकर ताकत मिलती रहे जिससे एक सौ तीस करोड़ का देश पूरी पारदर्शिता से प्रगति के पथ पर बढ़ता रहे।पत्रकारिता ही वह माध्यम था जिसने आजादी में जनचेतना का मार्ग प्रशस्त किया  और आजादी के बहत्तर साल बाद पुनःराष्ट्रीय व सामाजिक दायित्वों की पूर्ति के लिये  व्रती पत्रकारिता की आवश्यकता महसूस हो रही है।यदि समाज के ज्वलन्त मुद्दों पर पत्रकार की लेखनी छैनी का काम करेगी तभी भारतीय समाज को सुंदर आकार देने में सफल होगी।एक कहावत प्रचलित है कि पत्रकारिता सरकार की मां नहीं है जो पीछे से सहारा दे,वह सरकार का बच्चा भी नहीं है जिसे गोंद में बिठा के खिलाया जाए बल्कि पत्रकारिता तो सरकार का बाप है जो कान खींच के उसे रास्ता दिखाए।अगर आज पत्रकारिता यह कर पाने में समर्थ है तो उसे सार्थक माना जायेगा। चुनौतियों से जूझते हुए सत्य के साथ पत्रकार का खड़ा होनाऔर विमर्श को जिन्दा रखना समाज को समाधान देगा।हिंदी पत्रकारिता दिवस  की सुधी पाठकों और पत्रकार बन्धुओं को बधाई।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
श्री म. रा. दा.पी.जी.कालेज
भुड़कुड़ा, गाजीपुर।

Wednesday, 27 May 2020

परम्परा और आधुनिकता का समन्वय है पं.नेहरू का व्यक्तित्व

लोकतंत्र में वोट हासिल करने की राजनीतिक प्रतियोगिता से अलग हटकर आज विचार करने की आवश्यकता है।किसी व्यक्ति के समग्र व्यक्तित्व का मूल्यांकन किये बग़ैर उसे नायक या खलनायक घोषित करना उस व्यक्तित्व के साथ नाइंसाफी होगी।पं.नेहरू ने प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में देश की बागडोर सम्हाली।उनके सामने चुनौतियों का अंबार खड़ा था।आज़ादी के बाद भारत जैसे प्राचीन देश की विरासत को सम्हालते हुए दुनियां में हो रहे बदलावों को स्वीकारना वक्त की जरूरत थी।किसी भी परम्परागत समाज के सामने यह मुश्किल आना स्वाभाविक है कि आधुनिकता के साथ वो अपना रिश्ता कैसे कायम करे।एक तरीका तो यह है कि परम्परा के खण्डहरों पर आधुनिकता का महल बनाएं तथा दूसरा यह कि परम्परा को ही आधुनिकता का रूप दे दें।परम्परा और आधुनिकता का अद्भुत समन्वय पं.नेहरू के व्यक्तित्व में दिखाई देता है।उन्होंने अपनी नेतृत्व क्षमता से अपने दौर को प्रभावित किया।आज ही के दिन 1964 में उनका देहांत हुआ।राजनीति के गलियारे से निकलकर जिस तरह की चर्चा आज नेहरू के बारे में सोशल मीडिया में होती है वह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।
नेहरू का व्यक्तित्व,कार्यशैली, दूरदर्शिता और राष्ट्र के प्रति समर्पण सन्देह से परे 
है।भारतीय जनसंघ के नौजवान नेता, अटल बिहारी वाजपेयी ने 29 मई, 1964 को संसद में उन्हें कुछ इसप्रकार से श्रद्धांजलि दी जिसके आलोक में नेहरू के व्यक्तित्व का मूल्यांकन करना उनके कटु आलोचकों के लिए समीचीन होगा।

महोदय,

एक सपना था जो अधूरा रह गया, 

हर अँधेरे से लड़ता रहा और हमें रास्ता दिखाकर, एक प्रभात में निर्वाण को प्राप्त हो गया।

मृत्यु ध्रुव है, शरीर नश्वर है।हमारे जीवन की एक अमूल्य निधि लुट गई।

भारत माता आज शोकमग्ना है – उसका सबसे लाड़ला राजकुमार खो गया। 

मानवता आज खिन्नमना है – उसका पुजारी सो गया।

शांति आज अशांत है – उसका रक्षक चला गया।

विश्व के रंगमंच का प्रमुख अभिनेता अपना अंतिम अभिनय दिखाकर अन्तर्ध्यान हो गया।

वह शांति के पुजारी थे,

संसद में उनका अभाव कभी नहीं भरेगा। 

वह व्यक्तित्व, वह ज़िंदादिली, विरोधी को भी साथ ले कर चलने की वह भावना, वह सज्जनता, वह महानता शायद निकट भविष्य में देखने को नहीं मिलेगी।

मतभेद होते हुए भी उनके महान आदर्शों के प्रति, 

उनकी प्रामाणिकता के प्रति,

 उनकी देशभक्ति के प्रति,

और उनके अटूट साहस के प्रति हमारे हृदय में आदर के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं उस महान आत्मा के प्रति अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।

-अटल बिहारी वाजपेयी 29मई1964

Monday, 25 May 2020

नब्बे के दशक तक अंतर्देशीय और पोस्टकार्ड थे कुशलक्षेम के सशक्त माध्यम

संचार क्रांति के इस दौर में चिट्ठियों का चलन पहले जैसा नहीं रहा।नब्बे के दशक तक अन्तर्देशीय और पोस्टकार्ड कुशलक्षेम जानने के सशक्त माध्यम थे।फ़ेसबुक, व्हाट्सएप, ट्विटर, इंस्टाग्राम, जैसे विविध सोशल मीडिया प्लेटफार्म के ज़रिए हम दुनियां के किसी कोने में बैठे अपने सम्बन्धियों, सुपरिचितों और आभासी दुनियां के मित्रों से रूबरू  होकर हालचाल कर सकते हैं।यह सुविधा हर आम और ख़ास को आज प्राप्त है।अपने सगे संबंधियों को सन्देश भेजना और प्राप्त करना बेहद आसान हो गया है। इसकी आवृत्ति दिन में कई दफ़े हो जाया करती है।लेकिन आज से तीस पैंतीस साल पहले जनसामान्य के लिए अपने प्रियजनों के हाल जनाना इतना आसान नहीं था।बहुत तत्परता के साथ पत्रव्यवहार करने पर भी हालचाल जानने में महीना भर तो लग ही जाता था। कई बार लिखा हुआ पत्र पोस्ट करने में भी दो या चार दिन लग जाता था इसका कारण मनोभावों को कागज पर उतारने मात्र से प्राप्त होने वाली तसल्ली हो सकती थी।पत्रव्यवहार के लिए प्रयोग होने वाले अन्तर्देशीय, पोस्टकार्ड, लिफाफा जैसे माध्यमों से ही सूचनाओं का आदान प्रदान होता था जिससे हमारे आजके बच्चे परिचित नहीं हैं।पत्र भेजने की एक विधा को बैरन चिट्ठी के नाम से जानते थे जो निःशुल्क  भेजी जाती थी,जिसके पहुंचने की पूरी गारंटी होती थी लेकिन पत्र प्राप्त करने वाले से डाकिया कुछ शुल्क वसूल करता था।उस समय पत्र लिखने और पत्र पढ़ने में एक ख़ास तरह के आनंद की अनुभूति होती थी जो आज सूचनाओं के लेनदेन में शायद महसूस नहीं की जा सकती।ज्यादातर लोग किसी का संदेश किसी को फ़ॉरवर्ड करके एकप्रकार की औपचारिकता का निर्वाह भर कर रहे हैं।इसमें बनावटीपन के साथ गर्मजोशी  का अभाव है।या यूँ कहें कि आभासी दुनियां में की गई अभिव्यक्ति की तुलना में कागज पर की गई अभिव्यक्ति में ईमानदारी ज्यादा थी तो गलत नहीं होगा।
        विचारों और भावों को तारतम्य में बांधकर पत्र मे पिरोना आसान काम नहीं है।यह काम और भी कठिन हो जाता है जब किसी दूसरे के मनोभावों को शब्दबद्ध करके किसी दूसरे के लिए कागज पर उकेरना हो।कई बार इस तरह की कठिनाई का अनुभव अपने गाँव की एक बृद्ध महिला का अपने पुत्रों के लिए पत्राचार करने में मुझे भी महसूस हुआ।उनके द्वारा कही बातों को हूबहू उनके पुत्रों तक प्रेषित करना लिखने वाले के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण था।इसकार्य के लिए उस तरह की भावभूमि में उतरना होगा।पत्र द्वारा सन्देश का आदानप्रदान कई हिंदी फिल्मों और फिल्मी गीतों का आधार बना तो वहीं विक्टोरियन युग के प्रख्यात अंग्रेजी उपन्यासकार टामस हार्डी के उपन्यासों में पत्रों का बिलम्ब से पहुंचना कहानी की बुनावट का अहम हिस्सा है।पंडित नेहरू ने अपनी पुत्री इंदिरा को पत्र लिखे थे जो बाद में" पिता के पत्र पुत्री के नाम"से एक महत्वपूर्ण पुस्तक  रूप में 1929 में प्रकाशित हुए।
          हमने बचपन में अपनी दादी के संसर्ग में पत्र लिखना सीखा।वे कितना पढ़ी लिखी थीं यह तो मैं नहीं जानता लेकिन पत्र में भावों का सम्प्रेषण कैसे करना है ,सिलसिलेवार ढंग से सारी  बातें कैसे कहना है ,उस समय यह बारीकी मेरी नजर में  उनसे बेहतर शायद ही कोई जानता हो।घर का बुज़ुर्ग होने के नाते नियमित अंतराल पर वे सभी सगे सम्बन्धियों के साथ पत्राचार के लिए मुझे प्रेरित करती रहती थीं।उनदिनों सबके पत्रों का इंतजार भी हुआ करता था।घर में एक अलमारी पर कुछ पोस्टकार्ड और अन्तर्देशीय रखी रहती थी।पोस्टकार्ड थोड़ा सस्ता होता था लेकिन उसमें अभिव्यक्ति के सार्वजनिक होने का खतरा रहता था। पोस्टकार्ड का प्रयोग यदाकदा ही होता था।ज्यादातर लोगअंतर्देशीय ही प्रयोग करते थे।यह सब करने में मुझे मज़ा आता था और कब प्राईमरी का विद्यार्थी पत्र लिखना और जिम्मेदारी के साथ प्रतिउत्तर देना सीख गया पता ही नहीं चला। 26 जनवरी सन 1988 में दादी के दिवंगत होने के बाद भी मेरे द्वारा पत्राचार का सिलसिला मोबाइल फोन आने के पहले तक सभी सम्बन्धियों से निरन्तर चलता रहा। इसका जो सीधा लाभ मुझे प्राप्त हुआ उसका मूल्यांकन मैं आज सहज ही कर सकता हूँ।बातों को कागज के टुकड़े पर क्रमबद्ध रखने का सलीका सिखाने में दादी के निर्देशन में किया गया वह पत्रलेखन है ,जिसकी आदत आरम्भिक अवस्था में खेल खेल में ही पड़ गई थी।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
श्री म.रा. दा.पी.जी.कालेज 
भुड़कुड़ा,गाजीपुर।

Thursday, 21 May 2020

राजीव गांधी की पुण्यतिथि आज

स्वर्गीय राजीव गाँधी को नजदीक से मध्यप्रदेश में विदिशा शहर के सम्राट अशोक टेक्निकल इंस्टीट्यूट ग्राउंड पर वर्ष 1991 में चुनावी रैली सम्बोधित करने के दौरान पहली और आखिरी बार देखा- सुना।उनदिनों उनका यह आगमन बतौर कांग्रेस नेता और पूर्व प्रधानमंत्री के तौर पर विदिशा में हुआ था लेकिन उस समय उमड़ी भीड़ का आलम देख उनकी तत्कालीन लोकप्रियता का अंदाजा मैं आज सहज ही लगा सकता हूँ।उनदिनों हमलोग विदिशा स्टेशन के पास शेरपुर मुहल्ले में बड़े पिताजी के साथ रहते थे।राजीव गाँधी अपने मित्र और कांग्रेस उम्मीदवार भानुप्रताप शर्मा का चुनाव प्रचार करने आये थे।
      इम्तिहान देने के बाद गर्मी की छुट्टियां हुईं और छुट्टियों में हम गाँव आ गए थे।सायंकाल बीबीसी सुनना और सुबह रेडियो पर मानस पाठ और प्रादेशिक समाचार से दिन की शुरुआत हमारी आदत में था।हमलोगों को हत्या के एकदिन बाद 22 मई ,अलसुबह रेडियो के माध्यम से राजीव गांधी के बम धमाके में मारे जाने की मनहूस खबर प्राप्त हुई उसवक़्त हमलोग ट्रैक्टर की ट्राली में गोबर की खाद दरवाजे के सामने घूरे से भर रहे थे।समाचार सुनते ही सबलोग स्तब्ध रह गए थे।ऐसा लगा जैसे हमने किसी सगे सम्बन्धी या प्रियजन को खो दिया हो।आज भी 29 साल पहले घटित वह वाकया भूलता नहीं है।हमलोगों ने कामबंद कर दिया।धीरे धीरे इस खबर से शोकसंतप्त होकर आस पास के लोग इकट्ठा हो गए ।सारे लोग इस घटना से दुखी और मर्माहत होकर अपने अपने तरीके से अपनी शोक सम्वेदनाएँ प्रकट कर रहे थे।
     आज लंबे अरसे बाद वह सब स्मरण आ रहा है।साथ ही यह भी समझ आ रहा है कि किसी का खात्मा करके उसको रास्ते से हटा सकते हैं लेकिन उसको मिटा नहीं सकते।देश के प्रधानमंत्री के तौर पर उनके लिए फैसले  की खातिर उनको भुलाना नामुमकिन है।राजनीति की गलियां काज़ल की कोठरी हैं इन गलियों से गुजरने वाला कितना ही सयाना क्यों न हो एक लीक काज़ल की तो लग ही जाती है।राजनीति के चमचमाते सितारे के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ जो प्रचलित अर्थों में  सयाना तो नहीं था लेकिन सयानों की सोहबत में राजनीति की गलियों से गुजरा और अपने दामन को बचा नहीं पाया। अगर चेहरे को पढ़कर सख्शियत का अंदाजा लगाया जाय तो यह कहा जा सकता है कि उनकी नीतियां बहस का विषय हो सकती हैं लेकिन उनकी नियति में खोट तो नहीं ही था।वे भारत को अत्याधुनिक तकनीक से लैस करने का सपना दिखाकर दुनियां को अलविदा कह गए।दूरसंचार क्रांति उसी सपने का हकीकत में रूपांतरण है।आज हम डिजिटल इंडिया के साथ आगे बढ़ रहे हैं।अट्ठारह वर्ष में मताधिकार की उम्रसीमा तय करके युवाओं को देश का जिम्मेदार नागरिक बनाया।देशभर में नवोदय विद्यालय की शुरुवात की।सन 1981 में छोटे भाई संजय की दुर्घटना में मौत के बाद हुए उपचुनाव में अमेठी का प्रतिनिधित्व करते हुए सक्रिय राजनीतिक पारी की शुरुवात करने वाले राजीव गांधी का राजनीतिक सफर प्रधानमंत्री की कुर्सी तक होते हुए 1991 में समाप्त हो गया।यद्यपि इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद प्रधानमंत्री की कुर्सी उनको विरासत में मिली थी लेकिन अपने व्यक्तित्व और कार्यशैली से  लोगों के दिलोदिमाग पर छाप छोड़ने में वे कामयाब हुए। बेहद आकर्षक ,सौम्य ,जनप्रिय और मृदुभाषी राजनेता राजीव गाँधी को पुण्यतिथि पर सादर नमन!
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
श्री म.रा.दा.पी.जी.कालेज
भुड़कुड़ा, गाजीपुर।

Monday, 18 May 2020

कोरोना संकट नए तरह के समाज और साहित्य का प्रसवकाल



समाज बदल रहा है,देशकाल परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं।एक वायरस ने पूरी दुनियां बदल कर रख दिया।यह बदलाव दीर्घकालिक है।साहित्य भी इस बदलाव से अछूता नहीं है।नित नई चुनौतियों का सामना कर रहे मनुष्य की साहित्यिक अभिरुचि भी बहुत तेजी के साथ बदल रही है।आज पाठक पहले की तुलना में ज्यादा जिज्ञासु है । वह कपोलकल्पित विषयवस्तु की जगह तथ्यपरक सत्य का अभिलाषी है।अतीत काल से ही  साहित्य मनोरंजक और लोकरंजक रहा है।संकट काल में समय समय पर साहित्य ने समाज की सेवा की है।कालजयी रचनाओं में लोकमंगल का स्वर फूटा है।लेकिन बाजारवाद से निकले साहित्य का उद्देश्य  केवल मन बहलाव करके वाहवाही लूटना और धनार्जन  हो गया था।समाज के यथार्थ चित्रण के नाम पर सतही,अगम्भीरऔर मनोरंजक  विषयवस्तु कभी साहित्य का दर्जा नहीं प्राप्त कर सकती है।सच्चे साहित्यकार की सम्वेदना आम आदमी की सम्वेदना से बहुत गहरी होती है इसीलिए उसका सरोकार व्यापक और सृजन कालजयी होता है।आज का साहित्य जीवन की समस्याओं पर गहनता से विचार करते हुए  उसे हल करने की कोशिश कर रहा है।उसे उन तमाम प्रश्नों से दिलचस्पी है जिनसे समाज या व्यक्ति प्रभावित होते हैं। जो कुछ लिख दिया जाय ,वह सब का सब साहित्य कदापि नहीं है।Literature is the written record of man's spirit,of his thoughts, emotions and aspirations. जिसमें दिल और दिमाग पर असर डालने का गुण हो वही साहित्य है।सच कहा जाय तो जीवन की सचाइयों का दर्पण ही साहित्य है।आधुनिक साहित्य में वस्तुस्थिति चित्रण की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है।रोजीरोटी के लिए रोजमर्रा की जद्दोजहद ,बसने का सपना लिए उजड़ती दुनियां,महामारी के कारण मौत के आंकड़ों  पर संचार माध्यमों द्वारा निगाह गड़ाए समाज,और अभावों की मार के बावजूद जीने के लिए  संघर्षरत मनुष्य की पीड़ा आजके साहित्यकारों को निश्चित रूप से उद्वेलित करेंगे।कुछ महीनों से भौतिक विकास का पहिया थमा जरूर है लेकिन इसका परिणाम यह है कि प्रकृति राहत की सांस ले रही है।कोरोना काल नए तरह के समाज और साहित्य का प्रसव काल है।इसकी कोख से जन्म लेने वाला साहित्य जाति,धर्म लिंग,क्षेत्र ,भाषा और भौगोलिक सीमा की संकीर्णता से बाहर निकलते आदमी की आदमियत का दस्तावेज़ होगा।रचनाएं चाहे जिस विधा में हों निकट भविष्य में उनका तेवर और कलेवर और भी बदलेगा।प्रत्यक्ष अनुभवों की सीमा को तोड़कर बाहर निकलना वर्तमान परिस्थितियों में साहित्यकार के लिए मुश्किल है लेकिन इस अनुभवजनित पीड़ा की अभिव्यक्ति अस्तव्यस्त जनजीवन को पुनः व्यवस्थित करने  और नई उम्मीद के संचार का सामर्थ्य रखती है।हर्ष और विषाद के भावों का लेखनी द्वारा चित्रण साहित्य को संवेदना से जोड़ता है।हर आदमी की मनोवृत्ति और दृष्टिकोण अलग होता है।साहित्यकार की कुशलता इसी में है कि उसकी मनोवृति या दृष्टिकोण के साथ पाठक की सहमति या एकाकार हो जाय।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
श्री म.रा. दा.पी.जी.कालेज
भुड़कुड़ा, गाजीपुर

Thursday, 14 May 2020

प्रशंसा और निंदा से परे था निर्गुनिया सन्त श्री महन्थ रामाश्रयदास का व्यक्तित्व

किसी भी मत,पंथ,दर्शन तथा साहित्य का मूल्यांकन उसके ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से होता है।धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से समृद्ध ऐसी ही एक निर्गुनिया सन्त परम्परा 'भुड़कुड़ा की सन्त परम्परा 'के रूप में जगत विख्यात है।भुड़कुड़ा गाजीपुर जिला मुख्यालय के पश्चिमी छोर पर जखनियां रेलवे स्टेशन से तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।सत्रहवीं शताब्दी में भुड़कुड़ा आज जैसा नहीं रहा होगा।यह वनों से आच्छादित एक छोटा सा गांव या पुरवा रहा होगा जहां लगभग सन 1687 के आसपास गुरु और शिष्य का आविर्भाव एक साथ हुआ।आचार्य रजनीश इसे गणित की भाषा में युगपत उत्तपत्ति कहते हैं।कालांतर में बूला, गुलाल,और भीखा की इस परम्परा के क्रम में दसवां नाम जुड़ा सन 1919 में जन्मे महन्थ श्री रामाश्रय दास का जिनका पदार्पण पन्द्रह वर्ष की आयु में इस क्षेत्र में हुआ।पुरानी पीढ़ी के कथनानुसार घर से नाराज होकर बालक रामाश्रय रेल मार्ग से काशी जा रहे थे।भूख प्यास से व्याकुल होकर जखनियां स्टेशन पर उतर गए और लोगों ने भुड़कुड़ा की ओर उनको भेज दिया। मठ के तत्कालीन महन्थ श्री रामवरन दास जी ने इन्हें मठ परिसर में आश्रय दिया और आगे चलकर शिष्यत्व भी प्रदान किया।सन 1969 में उनके समाधिस्थ होने के पश्चात श्री रामाश्रय दास इस साधना केंद्र रूपी तीर्थस्थल के पीठाधिपति हुए। रामाश्रय दास जी के अंदर एक सिद्ध सन्त के सारे गुण विद्यमान थे।उनको संतत्व का बोध था।उनका व्यवहार प्रशंसा और निंदा से प्रभावित नहीं था।उनका ज्यादा जोर आत्मनिरीक्षण (Introspection) पर था जिसका प्रमाण उनके द्वारा दुहराई जाने वाली इस उक्ति से मिलता है- मन चाहत बहु युक्ति है,देवैया को यान। हरष विषाद मिटाइके, आतम परखो ज्ञान।। संगीत के साथ वे मानस तथा स्थान के साहित्य के मनन चिंतन में गहरी रुचि रखते थे।श्रीरामचरितमानस में नवधा भक्ति का प्रसंग आता है जिसमें नौ प्रकार की भक्ति का वर्णन सन्त कवि तुलसीदास जी ने किया है।एक साधक के रूप में रामाश्रय दास जी ने मठ की परंपराओं का निर्वहन करते हुए नवधा भक्ति को साध लिया था।वे सत्संगऔर भगवत चिंतन में रत निरभिमानी मुखमण्डल,निष्कपट हृदय,इंद्रिय निग्रह,समता,सरलता जैसे गुणों से परिपूर्ण लोभरहित व्यक्तित्व के स्वामी थे। उनके मुखमण्डल पर निश्छल हँसी तैरती रहती थी और बातचीत के दौरान ताली बजाकर ठहाका लगाते थे।उनका साधारण रहन सहन उनके भीतर बैठी असाधारण आत्मा से जनसामान्य का परिचय और मेलजोल कराता था।स्वतः हारमोनियम बजाते हुए चतुर्भुज साहेब का यह भजन 'प्रभु जी सब विधि चूक हमारी,कीजै लाज सरन आये की ,गुन ऐगुन न बिचारी..'अक्सर गाया करते थे।मठ से इतर शिक्षण संस्थाओं के संचालन में उनकी भूमिका एक अविभावक की हुआ करती थी।सबकी बातों को तल्लीनता से सुनना और संस्था हित की बात लोगों से ही कहलवा लेना उनका विशेष गुण था।समूचा क्षेत्र उनके लिए परिवार जैसा था।सन1972 में अपने गुरु के द्वारा आरम्भ किये कार्य को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने भुड़कुड़ा महाविद्यालय की स्थापना कर ग्रामीण अंचल में रहने वाले अभावग्रस्त छात्रों के लिए उच्च शिक्षा का द्वार खोला।महाविद्यालय की स्थापना के पीछे उनके मन में धन या यश की कामना नहीं थी बल्कि समता,स्वतंत्रता और बन्धु भाव के मूल्य पर आधारित समाज की आधारशिला तैयार करना ही उनका उद्देश्य था।नदी और वृक्ष की भांति उन्होंने सदा समाज को देने का जतन किया समाज को इसका सुफल प्राप्त हो रहा है और दीर्घकाल तक इसकी निरन्तरता भी बनी रहेगी।उनके द्वारा रोपित यह महाविद्यालय सन2022 में पचास वर्ष की यात्रा पूरी करके अपनी स्वर्ण जयंती मनाएगा।दूरस्थ अंचल में रहने वाले लोगों के लिए यह संस्था किसी वरदान से कम नहीं है।महन्थ रामाश्रय दास जी 14 मई 2008 को चिर समाधि में चले गए।उनका निष्कलुष जीवन चरित्र पीढ़ियों को शिक्षा प्रदान करता रहेगा।लोक मंगल के लिए जीने वाले उस महात्मा का स्मरण उनके प्रति सच्ची कृतज्ञता होगी।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
श्री महन्थ रामाश्रय दास पी.जी.कालेज
भुड़कुड़ा,गाजीपुर।

Thursday, 7 May 2020

सरल जीवन की संहिता है बुद्ध का जीवन




आज बुद्ध पूर्णिमा है।भारत वर्ष में धार्मिक व सांस्कृतिक दृष्टि से पूर्णिमा तिथि विशेष महत्व रखती है।बौद्ध धर्म प्रवर्तक गौतम बुद्ध का जन्मदिवस बैसाख मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है।वास्तव में गौतम बुद्ध का जीवन अपने आपमें सरल जीवन जीने की संहिता है जिसमें कर्मकाण्ड का कोई महत्व नहीं है।हमारे धर्मशास्त्र और साहित्य श्रेष्ठ विचारों से भरे पड़े हैं।हमारे महापुरुषों ने अपने जीवन में प्रयोग करके विचारों को प्रतिपादित किया,गौतम बुद्ध  भी उन महापुरुषों में एक हैं।हम उनके विचारों की बात तो करते हैं, किंतु व्यवहारिक जीवन में उसका प्रयोग दूसरों को नीचा दिखाने या ढाल के रूप मेंअपनी गलतियों पर आवरण डालने के लिए करते हैं। उसपर अमल नहीं करते हैं।भगवान बुद्ध के अनुसार जितनी हानि शत्रु-शत्रु की या बैरी-बैरी की करता है उससे कहीं अधिक हानि बुरे मार्ग पर लगा हुआ चित्त करता है (Whatever harm an enemy may do to an enemy or a hater to a hater, an ill-directed mind inflicts on oneself a greater harm.)आज के कठिन समय में घायल और लहूलुहान मानवता के लिए उनके सन्देश बहुत उपयोगी हैं।उनके अप्प दीपो भव का संदेश नई मनुष्यता के जन्म लेने में सहायक हो सकता है।हमें विचारों के आवरण की नहीं बल्कि विचारों के बीज की आवश्यकता है जिससे बीजांकुर फूटे और नई कोंपले बाहर निकलें।बुद्ध ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा तथा तात्विक ज्ञान के साथ नैतिकता का समावेश करके मनुष्यों का पथ प्रदर्शन किया।उनके विचारों ने भारत की भौगोलिक सीमा लांघ कर विदेशों में भी लोगों को प्रभावित किया।श्रीलंका, जावा, सुमात्रा, फिलीपींस,जापान और चीन में लोगों ने बौद्ध धर्म को अपनाया।आधुनिक भारत के ख्याति लब्ध दार्शनिकआचार्य रजनीश ने बुद्ध के सन्देश की बहुत     व्यवहारिक व्याख्या की है ।यूरोप और अमरीका में बौद्ध दर्शन से लोगों को परिचित कराया तो वहीं दूसरी तरफ अपने देश में कुछ लोग उन्हें विष्णु के अवतार के रूप में देखते हैं।बाबा साहेब अंबेडकर उनके सिद्धान्तों पर चलकर बहुजन मुक्ति का मार्ग तलाशते हैं । कुलमिलाकर सबकी अपनी अपनी दृष्टि है और बुद्ध को देखने का सबका अपना नजरिया है लेकिन उनकी स्वीकार्यता के केंद्र में अप्प दीपो भव और अहिंसा परमो धर्म का सिद्धांत है।यह बात जरूर है कि बुद्ध और अम्बेडकर को राजनीतिक दृष्टि से अपनाने वाले लोगों को अन्य भारतीय मतावलम्बियों का बुद्ध के प्रति प्रेम आपत्तिजनक लगता है। यह विचार कि मुझे गाली दी,मुझे मारा, मुझे हरा दिया,मुझे लूट लिया ऐसी बातें जो सोचते हैं और मन में बांधे रखते हैं उनका बैर कभी शांत नहीं होता।प्रेम करुणा दया अहिंसा और ज्ञान पुंज के समुच्चय भगवान बुद्ध के जन्मदिवस पर शुभकामनाएं।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
असिस्टेन्ट प्रोफेसर(अंग्रेजी)
श्री म. रा. दा. पी.जी.कालेज,भुड़कुड़ा
गाज़ीपुर।