किसी भी मत,पंथ,दर्शन तथा साहित्य का मूल्यांकन उसके ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से होता है।धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से समृद्ध ऐसी ही एक निर्गुनिया सन्त परम्परा 'भुड़कुड़ा की सन्त परम्परा 'के रूप में जगत विख्यात है।भुड़कुड़ा गाजीपुर जिला मुख्यालय के पश्चिमी छोर पर जखनियां रेलवे स्टेशन से तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।सत्रहवीं शताब्दी में भुड़कुड़ा आज जैसा नहीं रहा होगा।यह वनों से आच्छादित एक छोटा सा गांव या पुरवा रहा होगा जहां लगभग सन 1687 के आसपास गुरु और शिष्य का आविर्भाव एक साथ हुआ।आचार्य रजनीश इसे गणित की भाषा में युगपत उत्तपत्ति कहते हैं।कालांतर में बूला, गुलाल,और भीखा की इस परम्परा के क्रम में दसवां नाम जुड़ा सन 1919 में जन्मे महन्थ श्री रामाश्रय दास का जिनका पदार्पण पन्द्रह वर्ष की आयु में इस क्षेत्र में हुआ।पुरानी पीढ़ी के कथनानुसार घर से नाराज होकर बालक रामाश्रय रेल मार्ग से काशी जा रहे थे।भूख प्यास से व्याकुल होकर जखनियां स्टेशन पर उतर गए और लोगों ने भुड़कुड़ा की ओर उनको भेज दिया। मठ के तत्कालीन महन्थ श्री रामवरन दास जी ने इन्हें मठ परिसर में आश्रय दिया और आगे चलकर शिष्यत्व भी प्रदान किया।सन 1969 में उनके समाधिस्थ होने के पश्चात श्री रामाश्रय दास इस साधना केंद्र रूपी तीर्थस्थल के पीठाधिपति हुए।
रामाश्रय दास जी के अंदर एक सिद्ध सन्त के सारे गुण विद्यमान थे।उनको संतत्व का बोध था।उनका व्यवहार प्रशंसा और निंदा से प्रभावित नहीं था।उनका ज्यादा जोर आत्मनिरीक्षण (Introspection) पर था जिसका प्रमाण उनके द्वारा दुहराई जाने वाली इस उक्ति से मिलता है-
मन चाहत बहु युक्ति है,देवैया को यान।
हरष विषाद मिटाइके, आतम परखो ज्ञान।।
संगीत के साथ वे मानस तथा स्थान के साहित्य के मनन चिंतन में गहरी रुचि रखते थे।श्रीरामचरितमानस में नवधा भक्ति का प्रसंग आता है जिसमें नौ प्रकार की भक्ति का वर्णन सन्त कवि तुलसीदास जी ने किया है।एक साधक के रूप में रामाश्रय दास जी ने मठ की परंपराओं का निर्वहन करते हुए नवधा भक्ति को साध लिया था।वे सत्संगऔर भगवत चिंतन में रत निरभिमानी मुखमण्डल,निष्कपट हृदय,इंद्रिय निग्रह,समता,सरलता जैसे गुणों से परिपूर्ण लोभरहित व्यक्तित्व के स्वामी थे। उनके मुखमण्डल पर निश्छल हँसी तैरती रहती थी और बातचीत के दौरान ताली बजाकर ठहाका लगाते थे।उनका साधारण रहन सहन उनके भीतर बैठी असाधारण आत्मा से जनसामान्य का परिचय और मेलजोल कराता था।स्वतः हारमोनियम बजाते हुए चतुर्भुज साहेब का यह भजन 'प्रभु जी सब विधि चूक हमारी,कीजै लाज सरन आये की ,गुन ऐगुन न बिचारी..'अक्सर गाया करते थे।मठ से इतर शिक्षण संस्थाओं के संचालन में उनकी भूमिका एक अविभावक की हुआ करती थी।सबकी बातों को तल्लीनता से सुनना और संस्था हित की बात लोगों से ही कहलवा लेना उनका विशेष गुण था।समूचा क्षेत्र उनके लिए परिवार जैसा था।सन1972 में अपने गुरु के द्वारा आरम्भ किये कार्य को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने भुड़कुड़ा महाविद्यालय की स्थापना कर ग्रामीण अंचल में रहने वाले अभावग्रस्त छात्रों के लिए उच्च शिक्षा का द्वार खोला।महाविद्यालय की स्थापना के पीछे उनके मन में धन या यश की कामना नहीं थी बल्कि समता,स्वतंत्रता और बन्धु भाव के मूल्य पर आधारित समाज की आधारशिला तैयार करना ही उनका उद्देश्य था।नदी और वृक्ष की भांति उन्होंने सदा समाज को देने का जतन किया समाज को इसका सुफल प्राप्त हो रहा है और दीर्घकाल तक इसकी निरन्तरता भी बनी रहेगी।उनके द्वारा रोपित यह महाविद्यालय सन2022 में पचास वर्ष की यात्रा पूरी करके अपनी स्वर्ण जयंती मनाएगा।दूरस्थ अंचल में रहने वाले लोगों के लिए यह संस्था किसी वरदान से कम नहीं है।महन्थ रामाश्रय दास जी 14 मई 2008 को चिर समाधि में चले गए।उनका निष्कलुष जीवन चरित्र पीढ़ियों को शिक्षा प्रदान करता रहेगा।लोक मंगल के लिए जीने वाले उस महात्मा का स्मरण उनके प्रति सच्ची कृतज्ञता होगी।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
श्री महन्थ रामाश्रय दास पी.जी.कालेज
भुड़कुड़ा,गाजीपुर।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
श्री महन्थ रामाश्रय दास पी.जी.कालेज
भुड़कुड़ा,गाजीपुर।

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