संचार क्रांति के इस दौर में चिट्ठियों का चलन पहले जैसा नहीं रहा।नब्बे के दशक तक अन्तर्देशीय और पोस्टकार्ड कुशलक्षेम जानने के सशक्त माध्यम थे।फ़ेसबुक, व्हाट्सएप, ट्विटर, इंस्टाग्राम, जैसे विविध सोशल मीडिया प्लेटफार्म के ज़रिए हम दुनियां के किसी कोने में बैठे अपने सम्बन्धियों, सुपरिचितों और आभासी दुनियां के मित्रों से रूबरू होकर हालचाल कर सकते हैं।यह सुविधा हर आम और ख़ास को आज प्राप्त है।अपने सगे संबंधियों को सन्देश भेजना और प्राप्त करना बेहद आसान हो गया है। इसकी आवृत्ति दिन में कई दफ़े हो जाया करती है।लेकिन आज से तीस पैंतीस साल पहले जनसामान्य के लिए अपने प्रियजनों के हाल जनाना इतना आसान नहीं था।बहुत तत्परता के साथ पत्रव्यवहार करने पर भी हालचाल जानने में महीना भर तो लग ही जाता था। कई बार लिखा हुआ पत्र पोस्ट करने में भी दो या चार दिन लग जाता था इसका कारण मनोभावों को कागज पर उतारने मात्र से प्राप्त होने वाली तसल्ली हो सकती थी।पत्रव्यवहार के लिए प्रयोग होने वाले अन्तर्देशीय, पोस्टकार्ड, लिफाफा जैसे माध्यमों से ही सूचनाओं का आदान प्रदान होता था जिससे हमारे आजके बच्चे परिचित नहीं हैं।पत्र भेजने की एक विधा को बैरन चिट्ठी के नाम से जानते थे जो निःशुल्क भेजी जाती थी,जिसके पहुंचने की पूरी गारंटी होती थी लेकिन पत्र प्राप्त करने वाले से डाकिया कुछ शुल्क वसूल करता था।उस समय पत्र लिखने और पत्र पढ़ने में एक ख़ास तरह के आनंद की अनुभूति होती थी जो आज सूचनाओं के लेनदेन में शायद महसूस नहीं की जा सकती।ज्यादातर लोग किसी का संदेश किसी को फ़ॉरवर्ड करके एकप्रकार की औपचारिकता का निर्वाह भर कर रहे हैं।इसमें बनावटीपन के साथ गर्मजोशी का अभाव है।या यूँ कहें कि आभासी दुनियां में की गई अभिव्यक्ति की तुलना में कागज पर की गई अभिव्यक्ति में ईमानदारी ज्यादा थी तो गलत नहीं होगा।
विचारों और भावों को तारतम्य में बांधकर पत्र मे पिरोना आसान काम नहीं है।यह काम और भी कठिन हो जाता है जब किसी दूसरे के मनोभावों को शब्दबद्ध करके किसी दूसरे के लिए कागज पर उकेरना हो।कई बार इस तरह की कठिनाई का अनुभव अपने गाँव की एक बृद्ध महिला का अपने पुत्रों के लिए पत्राचार करने में मुझे भी महसूस हुआ।उनके द्वारा कही बातों को हूबहू उनके पुत्रों तक प्रेषित करना लिखने वाले के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण था।इसकार्य के लिए उस तरह की भावभूमि में उतरना होगा।पत्र द्वारा सन्देश का आदानप्रदान कई हिंदी फिल्मों और फिल्मी गीतों का आधार बना तो वहीं विक्टोरियन युग के प्रख्यात अंग्रेजी उपन्यासकार टामस हार्डी के उपन्यासों में पत्रों का बिलम्ब से पहुंचना कहानी की बुनावट का अहम हिस्सा है।पंडित नेहरू ने अपनी पुत्री इंदिरा को पत्र लिखे थे जो बाद में" पिता के पत्र पुत्री के नाम"से एक महत्वपूर्ण पुस्तक रूप में 1929 में प्रकाशित हुए।
हमने बचपन में अपनी दादी के संसर्ग में पत्र लिखना सीखा।वे कितना पढ़ी लिखी थीं यह तो मैं नहीं जानता लेकिन पत्र में भावों का सम्प्रेषण कैसे करना है ,सिलसिलेवार ढंग से सारी बातें कैसे कहना है ,उस समय यह बारीकी मेरी नजर में उनसे बेहतर शायद ही कोई जानता हो।घर का बुज़ुर्ग होने के नाते नियमित अंतराल पर वे सभी सगे सम्बन्धियों के साथ पत्राचार के लिए मुझे प्रेरित करती रहती थीं।उनदिनों सबके पत्रों का इंतजार भी हुआ करता था।घर में एक अलमारी पर कुछ पोस्टकार्ड और अन्तर्देशीय रखी रहती थी।पोस्टकार्ड थोड़ा सस्ता होता था लेकिन उसमें अभिव्यक्ति के सार्वजनिक होने का खतरा रहता था। पोस्टकार्ड का प्रयोग यदाकदा ही होता था।ज्यादातर लोगअंतर्देशीय ही प्रयोग करते थे।यह सब करने में मुझे मज़ा आता था और कब प्राईमरी का विद्यार्थी पत्र लिखना और जिम्मेदारी के साथ प्रतिउत्तर देना सीख गया पता ही नहीं चला। 26 जनवरी सन 1988 में दादी के दिवंगत होने के बाद भी मेरे द्वारा पत्राचार का सिलसिला मोबाइल फोन आने के पहले तक सभी सम्बन्धियों से निरन्तर चलता रहा। इसका जो सीधा लाभ मुझे प्राप्त हुआ उसका मूल्यांकन मैं आज सहज ही कर सकता हूँ।बातों को कागज के टुकड़े पर क्रमबद्ध रखने का सलीका सिखाने में दादी के निर्देशन में किया गया वह पत्रलेखन है ,जिसकी आदत आरम्भिक अवस्था में खेल खेल में ही पड़ गई थी।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
श्री म.रा. दा.पी.जी.कालेज
भुड़कुड़ा,गाजीपुर।

No comments:
Post a Comment