स्वर्गीय राजीव गाँधी को नजदीक से मध्यप्रदेश में विदिशा शहर के सम्राट अशोक टेक्निकल इंस्टीट्यूट ग्राउंड पर वर्ष 1991 में चुनावी रैली सम्बोधित करने के दौरान पहली और आखिरी बार देखा- सुना।उनदिनों उनका यह आगमन बतौर कांग्रेस नेता और पूर्व प्रधानमंत्री के तौर पर विदिशा में हुआ था लेकिन उस समय उमड़ी भीड़ का आलम देख उनकी तत्कालीन लोकप्रियता का अंदाजा मैं आज सहज ही लगा सकता हूँ।उनदिनों हमलोग विदिशा स्टेशन के पास शेरपुर मुहल्ले में बड़े पिताजी के साथ रहते थे।राजीव गाँधी अपने मित्र और कांग्रेस उम्मीदवार भानुप्रताप शर्मा का चुनाव प्रचार करने आये थे।
इम्तिहान देने के बाद गर्मी की छुट्टियां हुईं और छुट्टियों में हम गाँव आ गए थे।सायंकाल बीबीसी सुनना और सुबह रेडियो पर मानस पाठ और प्रादेशिक समाचार से दिन की शुरुआत हमारी आदत में था।हमलोगों को हत्या के एकदिन बाद 22 मई ,अलसुबह रेडियो के माध्यम से राजीव गांधी के बम धमाके में मारे जाने की मनहूस खबर प्राप्त हुई उसवक़्त हमलोग ट्रैक्टर की ट्राली में गोबर की खाद दरवाजे के सामने घूरे से भर रहे थे।समाचार सुनते ही सबलोग स्तब्ध रह गए थे।ऐसा लगा जैसे हमने किसी सगे सम्बन्धी या प्रियजन को खो दिया हो।आज भी 29 साल पहले घटित वह वाकया भूलता नहीं है।हमलोगों ने कामबंद कर दिया।धीरे धीरे इस खबर से शोकसंतप्त होकर आस पास के लोग इकट्ठा हो गए ।सारे लोग इस घटना से दुखी और मर्माहत होकर अपने अपने तरीके से अपनी शोक सम्वेदनाएँ प्रकट कर रहे थे।
आज लंबे अरसे बाद वह सब स्मरण आ रहा है।साथ ही यह भी समझ आ रहा है कि किसी का खात्मा करके उसको रास्ते से हटा सकते हैं लेकिन उसको मिटा नहीं सकते।देश के प्रधानमंत्री के तौर पर उनके लिए फैसले की खातिर उनको भुलाना नामुमकिन है।राजनीति की गलियां काज़ल की कोठरी हैं इन गलियों से गुजरने वाला कितना ही सयाना क्यों न हो एक लीक काज़ल की तो लग ही जाती है।राजनीति के चमचमाते सितारे के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ जो प्रचलित अर्थों में सयाना तो नहीं था लेकिन सयानों की सोहबत में राजनीति की गलियों से गुजरा और अपने दामन को बचा नहीं पाया। अगर चेहरे को पढ़कर सख्शियत का अंदाजा लगाया जाय तो यह कहा जा सकता है कि उनकी नीतियां बहस का विषय हो सकती हैं लेकिन उनकी नियति में खोट तो नहीं ही था।वे भारत को अत्याधुनिक तकनीक से लैस करने का सपना दिखाकर दुनियां को अलविदा कह गए।दूरसंचार क्रांति उसी सपने का हकीकत में रूपांतरण है।आज हम डिजिटल इंडिया के साथ आगे बढ़ रहे हैं।अट्ठारह वर्ष में मताधिकार की उम्रसीमा तय करके युवाओं को देश का जिम्मेदार नागरिक बनाया।देशभर में नवोदय विद्यालय की शुरुवात की।सन 1981 में छोटे भाई संजय की दुर्घटना में मौत के बाद हुए उपचुनाव में अमेठी का प्रतिनिधित्व करते हुए सक्रिय राजनीतिक पारी की शुरुवात करने वाले राजीव गांधी का राजनीतिक सफर प्रधानमंत्री की कुर्सी तक होते हुए 1991 में समाप्त हो गया।यद्यपि इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद प्रधानमंत्री की कुर्सी उनको विरासत में मिली थी लेकिन अपने व्यक्तित्व और कार्यशैली से लोगों के दिलोदिमाग पर छाप छोड़ने में वे कामयाब हुए। बेहद आकर्षक ,सौम्य ,जनप्रिय और मृदुभाषी राजनेता राजीव गाँधी को पुण्यतिथि पर सादर नमन!
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
श्री म.रा.दा.पी.जी.कालेज
भुड़कुड़ा, गाजीपुर।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
श्री म.रा.दा.पी.जी.कालेज
भुड़कुड़ा, गाजीपुर।

No comments:
Post a Comment