Wednesday, 27 May 2020

परम्परा और आधुनिकता का समन्वय है पं.नेहरू का व्यक्तित्व

लोकतंत्र में वोट हासिल करने की राजनीतिक प्रतियोगिता से अलग हटकर आज विचार करने की आवश्यकता है।किसी व्यक्ति के समग्र व्यक्तित्व का मूल्यांकन किये बग़ैर उसे नायक या खलनायक घोषित करना उस व्यक्तित्व के साथ नाइंसाफी होगी।पं.नेहरू ने प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में देश की बागडोर सम्हाली।उनके सामने चुनौतियों का अंबार खड़ा था।आज़ादी के बाद भारत जैसे प्राचीन देश की विरासत को सम्हालते हुए दुनियां में हो रहे बदलावों को स्वीकारना वक्त की जरूरत थी।किसी भी परम्परागत समाज के सामने यह मुश्किल आना स्वाभाविक है कि आधुनिकता के साथ वो अपना रिश्ता कैसे कायम करे।एक तरीका तो यह है कि परम्परा के खण्डहरों पर आधुनिकता का महल बनाएं तथा दूसरा यह कि परम्परा को ही आधुनिकता का रूप दे दें।परम्परा और आधुनिकता का अद्भुत समन्वय पं.नेहरू के व्यक्तित्व में दिखाई देता है।उन्होंने अपनी नेतृत्व क्षमता से अपने दौर को प्रभावित किया।आज ही के दिन 1964 में उनका देहांत हुआ।राजनीति के गलियारे से निकलकर जिस तरह की चर्चा आज नेहरू के बारे में सोशल मीडिया में होती है वह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।
नेहरू का व्यक्तित्व,कार्यशैली, दूरदर्शिता और राष्ट्र के प्रति समर्पण सन्देह से परे 
है।भारतीय जनसंघ के नौजवान नेता, अटल बिहारी वाजपेयी ने 29 मई, 1964 को संसद में उन्हें कुछ इसप्रकार से श्रद्धांजलि दी जिसके आलोक में नेहरू के व्यक्तित्व का मूल्यांकन करना उनके कटु आलोचकों के लिए समीचीन होगा।

महोदय,

एक सपना था जो अधूरा रह गया, 

हर अँधेरे से लड़ता रहा और हमें रास्ता दिखाकर, एक प्रभात में निर्वाण को प्राप्त हो गया।

मृत्यु ध्रुव है, शरीर नश्वर है।हमारे जीवन की एक अमूल्य निधि लुट गई।

भारत माता आज शोकमग्ना है – उसका सबसे लाड़ला राजकुमार खो गया। 

मानवता आज खिन्नमना है – उसका पुजारी सो गया।

शांति आज अशांत है – उसका रक्षक चला गया।

विश्व के रंगमंच का प्रमुख अभिनेता अपना अंतिम अभिनय दिखाकर अन्तर्ध्यान हो गया।

वह शांति के पुजारी थे,

संसद में उनका अभाव कभी नहीं भरेगा। 

वह व्यक्तित्व, वह ज़िंदादिली, विरोधी को भी साथ ले कर चलने की वह भावना, वह सज्जनता, वह महानता शायद निकट भविष्य में देखने को नहीं मिलेगी।

मतभेद होते हुए भी उनके महान आदर्शों के प्रति, 

उनकी प्रामाणिकता के प्रति,

 उनकी देशभक्ति के प्रति,

और उनके अटूट साहस के प्रति हमारे हृदय में आदर के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं उस महान आत्मा के प्रति अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।

-अटल बिहारी वाजपेयी 29मई1964

No comments:

Post a Comment