सिद्धपीठ हथियाराम के महन्थ ,पूज्यपाद, महामण्डलेश्वर भवानीनन्दन यति महाराज का अवतरण दिवस भादों मास के शुक्लपक्ष अष्टमी तिथि को समारोह पूर्वक मनाया जाता है।इस वर्ष कोरोना महामारी के कारण भिन्न प्रकार की परिस्थितियां हैं ।यद्यपि आपका जन्म देवभूमि उत्तराखंड में हुआ था किंतु पूर्व आश्रम में आपने वेद और व्याकरण की शिक्षा गुरुकुल पद्धति से काशी में रहकर प्राप्त की।हथियाराम मठ के तत्कालीन महन्थ स्वामी बालकृष्ण यति जी का सानिध्य और आशीर्वाद आपको प्राप्त हुआ। 26वें पीठाधीश्वर के रूप में सिद्धपीठ हथियाराम गाजीपुर की धरती पर 23 फरवरी 1996को आपका आगमन हुआ। भारतवर्ष में विभिन्न स्थानों पर ऋषियों मुनियों ने साधना की है।काशी परिक्षेत्र में स्थित यह आध्यात्मिक केंद्र भी लगभग आठ सौ वर्षों से अपनी आभा विखेर रहा है।समय समय पर यहां दिव्य आत्माओं का जगत कल्याणार्थ अभ्युदय हुआ और उन्होंने पारम्परिक तरीके से जन सामान्य के बीच जाकर सन्मार्ग पर चलने की शिक्षा दी।हमारे यहां ऋषि शब्द अत्यधिक प्रचलित है।ऋषि वह व्यक्ति है जिसने अनुभूति से जाना हो अर्थात रियलाइजेशन या साक्षात्कार किया हो ।भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार क्या करना है और क्या नहीं करना है इसके लिए शास्त्र प्रमाण हैं 'तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ' लेकिन शास्त्र के लिए प्रमाण अनुभूति है।जिन्हें अनुभूति नहीं हुई उनको बताने समझाने का कार्य ऋषियों ने और उनके द्वारा रचे गए शास्त्रों ने किया है।भवानीनन्दन यति जी एक सिद्ध साधक और अनुभोक्ता के रूप में धर्म संस्कृति को बचाये और बनाये रखने हेतु सतत प्रयत्नशील हैं।आप त्याग ,करुणा और श्रद्धा की त्रिवेणी हैं।आपने अथक परिश्रम से गौरवशाली परम्परा का निर्वहन करते हुए समाज को दिशा देने का यत्न किया है।उनका मानना है कि विद्वत्ता प्राप्त करने से ज्यादा महत्वपूर्ण है हम सज्जनता को अंगीकार करें।जिस कार्य को रावण शास्त्र का ज्ञाता होते हुए भी नहीं कर सका उसे शबरी ने सहज प्राप्त कर लिया।हिन्दू मान्यताओं के अनुसार आदि शंकराचार्य ने अखाड़ों को बनाया तथा साधुओं और सन्यासियों को कुछ अखाड़ों में बांटा गया।जूना अखाड़ा सबसे बड़ा अखाड़ा है ।इस अखाड़े में सन्यासियों की संख्या चार लाख से भी ज्यादा है।स्थापना के समय अखाड़ों का मुख्य उद्देश्य देश के प्राचीन मंदिरों और धार्मिक लोगों को अन्य धर्मों के आक्रमणकारियों से बचना था।भवानीनन्दन यति जी जूना अखाड़े के वरिष्ठ महामण्डलेश्वर के रूप में राम मंदिर आंदोलन की गतिविधियों से जुड़े रहे और आजदिन भी सनातन धर्म की ध्वजा लेकर धार्मिक अनुष्ठानों द्वारा देश के कोने कोने में भटके हुए लोगों को मानवता की राह दिखा रहे हैं।उनका अवतरण दिवस मठ के अनुयायियों के लिए एक उत्सव का दिन है।स्वामी भवानीनन्दन यति जी का आध्यात्मिक व्यक्तित्व अत्यंत प्रिय एवं विशाल है।ईश्वर एवं धर्म के प्रति रागात्मक वृत्ति बनाये रखने में इनका सानिध्य दीर्घ काल तक प्रेरणादायी बना रहे।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
असिस्टेन्ट प्रोफेसर, अंग्रेजी
श्री म. रा. दा.पी.जी.कालेज,भुड़कुड़ा, गाजीपुर
Wednesday, 26 August 2020
महामण्डलेश्वर स्वामी भवानीनन्दन यति का सिद्धपीठ हथियाराम में राधाष्टमी के दिन मनाया गया अवतरण दिवस
Wednesday, 12 August 2020
जम्मूकश्मीर में लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना होगी नवनियुक्त उपराज्यपाल की शीर्ष प्राथमिकता
पिछले दिनों मोदी मंत्रिमंडल के साथी रहे श्री मनोज सिन्हा को जम्मू कश्मीर का उपराज्यपाल नियुक्त किया गया।यह नियुक्ति राष्ट्रीय राजनीति की एक महत्वपूर्ण घटना है।यह एक अहम संवैधानिक दायित्व है जिसके लिए धोती कुर्ता और गमछा में साधारण से दिखने वाले असाधारण प्रतिभा सम्पन्न श्री सिन्हा को उपयुक्त समझा गया।राजनीतिक मंचों और सदन के पटल पर भाषा की शालीनता के माध्यम से अपनी जवाबदेही का एहसास कराने वाले श्री मनोज सिन्हा का व्यक्तित्व राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा के केंद्र में रहा है।भारतीय राजनेताओं को मोटे तौर पर दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है ।एक वह वर्ग जो विरासत को सम्हालते हुए राजनीति के मैदान में अपना दखल और दबदबा रखता है और अपनी राजनीतिक विरासत को आने वाली पीढ़ी को सुपुर्द करने का अभिलाषी है।दूसरा वह वर्ग है जो संघर्ष की कोख से पैदा हुआ है और राष्ट्रीय क्षितिज पर न केवल धूमकेतु की तरह दिखा और ओझल हो गया,बल्कि अपने काम की बदौलत स्वयं को हार जीत से आगे ले जाकर अपनी प्रासंगिकता बनाये हुए है।उसे अपने बच्चों को राजनीति में स्थापित करने की चिंता नहीं रहती।बेदाग छवि उसकी अपनी कमाई है।जनता से उसी की भाषा में सीधा,सहज संवाद स्थापित करना उसका राजनीतिक कौशल है।राजनीति को अपराधियों के चंगुल से मुक्त कराने का जिसका मिशन हो।कथनी और करनी में अंतर वाली राजनीतिक संस्कृति को समाप्त करने पर उसका पूरा जोर रहता हो।सीधे तौर पर कहा जाय कि राजनीति उनके लिए तिजारत नहीं सेवा का माध्यम है।इन खूबियों से युक्त कोई और नहीं वह मनोज सिन्हा ही हैं जिन्होंने अपने राजनीति की शुरुआत छात्र जीवन से की। उनके शिक्षक पिता पुत्र के राजनीति में प्रवेश से प्रसन्न नहीं थे परन्तु नियति को कौन जानता है? छात्र संघ का पहला चुनाव हारने के बाद वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के बैनर तले वर्ष 1982 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के छात्र संघ अध्यक्ष चुने गए और यही उनके राजनीति में उतरने का प्रस्थान विंदु बना।यद्यपि आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी ने वर्ष 1996 के लोकसभा चुनाव में श्री मनोज सिन्हा को गाजीपुर से प्रत्यासी के रूप में मैदान में उतारा और वे जीत दर्ज कर पहली बार सांसद बने।1999 में दुबारा गाजीपुर लोकसभा के लिए चुने गए और अपनी विकास निधि का जनहित के लिए भरपूर प्रयोग करने के अलावा तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी के संरक्षकत्व में राजनीति की अन्य बारीकियों के साथ दलगत सीमा से परे स्वीकार्यता का गुण सीखा।2004 का चुनाव भाजपा और श्री मनोज सिन्हा के लिए अनुकूल परिणाम नहीं दिया लिहाजा पार्टी सत्ता से बाहर हो गई।सत्ता का वनवास झेल रही भारतीय जनता पार्टी ने एक दशक बाद वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जोरदार वापसी की और मनोज जी भी गाजीपुर से चुनाव जीतकर मंत्रिमंडल में जगह बनाने में कामयाब हुए।उन्होंने भारत सरकार के संचार राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार और रेल राज्यमंत्री के रूप में पद और गोपनीयता की शपथ लेकर विभिन्न परियोजनाओं के माध्यम से राष्ट्रीय फलक पर काम करते हुए समूचे पूर्वांचल की तस्वीर बदलने का विशेष प्रयास आरम्भ किया जिसका परिणाम जल्द ही सतह पर दिखने लगा।फलतः मनोज सिन्हा एक जननेता और विकास पुरूष के रूप में लोगों के दिलोदिमाग पर छा गए। उनके काम को देखकर धुर राजनीतिक विरोधी भी भले ही उनकी आलोचना करते हों लेकिन उनके कामों की अनदेखी नहीं कर सकते। सबका साथ सबका विकास की थीम पर काम करते हुए जिस तरह से श्री सिन्हा ने भारत सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं को ईमानदारी से जमीन पर उतारने का प्रयास किया उससे वर्ष 2019 में गाजीपुर से मिली चुनावी असफलता के बावजूद केंद्रीय नेतृत्व का विश्वास और भरोसा बरकरार रखने में वे कामयाब रहे।उपराज्यपाल के रूप में प्रशासनिक अनुभव वाले व्यक्ति का स्थानापन्न एक सुलझे राजनीतिक अनुभव वाले व्यक्ति को बनाना यह संकेत देता है कि घाटी में सामाजिक ,सांस्कृतिक और लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना की दिशा में केंद्रीय नेतृत्व बेहद गम्भीर है।अपनी कार्यशैली से श्री मनोज सिन्हा ने हमेशा अपनी उपयोगिता साबित की है और विषम परिस्थितियों में भी यह सिद्ध किया है कि चुनौतियों से निपटना उन्हें भलीभांति आता है।जब जब उनके जीवन में ठहराव की स्थिति बनी और राजनीतिक पंडितों ने उनके पारी को समाप्त माना तब तब उन्होंने सारे अनुमान को झुठलाते हुए न केवल जोरदार वापसी की बल्कि आशातीत परिणाम भी दिए।उनको नजदीक से जानने वाले मानते हैं कि वे हार मानने वाले व्यक्ति नहीं हैं।स्वाभाविक रूप से राजनीति में नई जिम्मेदारी अपने साथ नई चुनौतियां भी लेकर आती है।धारा 370 समाप्त हुए एक वर्ष का समय बीत गया है तथा समरसता का वातावरण निर्मित करने के लिए इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत के सिद्धांत को अमलीजामा पहनाने का श्री सिन्हा के पास सुनहरा अवसर है।घाटी में अमन चैन स्थापित करना श्री सिन्हा के लिए शीर्ष प्राथमिकता होगी।इस उद्देश्य की प्राप्ति लोकतांत्रिक तरीके से ही सम्भव है।अलगाववादियों के मंसूबे को नाकाम करते हुए लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बहाली में उनका लंबा राजनीतिक अनुभव सहायक सिद्ध होगा।केशर की क्यारी कहा जाने वाला कश्मीर बम ,बंदूक और ख़ून ख़राबा से मुक्त होगा।लम्बे समय से भययुक्त वातावरण में अभिशप्त जीवन जी रहे कश्मीरी नागरिकों को भयमुक्त कराने का जिम्मा श्री मनोज सिन्हा का होगा जिनके सरपरस्ती में कश्मीरी नागरिक अपनी लोकतांत्रिक शक्तियों का प्रयोग करते हुए अपने सपनों में रंग भर सकेंगे।उम्मीद यही है कि राजनीतिक स्वार्थ के कारण दोजख हो चुकी आम कश्मीरी की जिंदगी नए बगवां के हाथों में पुनः जन्नत बनेगी।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
असिस्टेन्ट प्रोफेसर, अंग्रेजी
श्री म.रा. दा. पी.जी.कॉलेज, भुड़कुड़ा,गाजीपुर
Tuesday, 11 August 2020
Lord Krishna:An Apotheosis of Love and Bliss
Wishing you all a very happy Shri Krishna Janmashtami.According to our religious belief,Lord Krishna was born in the month of Bhadrapad on Ashtami Tithi .It was a rainy season.We are well acquainted with the story of Lord krishna and his birth in jail.He is a very popular Hindu God all over the world and is known by several names as Madhav, Yogeshvar,Kanha, Gopala Keshav, Muralidhar, Nandlala etc.His early childhood fascinates saints, creative artists, poets and authors ,and his heroic deeds are the source of religious faith and inspiration to his devotees.We get the glimpse of Krishna in every child.The reason is that every child is innocent and full of love.Krishna is described as a 'Navneet Chore’.His preaching to Arjuna in the battlefield of Kurukshetra shows the path and removes all the confusion of mankind.He is against renunciation and gives emphasis on 'Karama'.He is a symbol of egolessness.His personality is multidimensional because of which he is called the master of sixty- four Kalas.He is a charioteer, cowman,musician, politician , philosopher, great lover,and saviour of mankind.Krishna is the embodiment of the virtue and Kansha is the embodiment of vice .The conflict between vice and virtue is inseperable in this world and finally ,virtue becomes victorious.'Dharma Sansthapanarthaya' means for the establishment of religious values Gods incarnate upon the earth in every age . May Lord Krishna shower his blessings upon us all and fulfill our aspirations in our life.We are the seekers of pleasure and Krishna is another name for perpetual pleasure (परमानंद).All the lovers of Lord Krishna can attain permanent pleasure in their life with a pure heart.Once again a very happy Janmashtami to each and all.




