पिछले दिनों मोदी मंत्रिमंडल के साथी रहे श्री मनोज सिन्हा को जम्मू कश्मीर का उपराज्यपाल नियुक्त किया गया।यह नियुक्ति राष्ट्रीय राजनीति की एक महत्वपूर्ण घटना है।यह एक अहम संवैधानिक दायित्व है जिसके लिए धोती कुर्ता और गमछा में साधारण से दिखने वाले असाधारण प्रतिभा सम्पन्न श्री सिन्हा को उपयुक्त समझा गया।राजनीतिक मंचों और सदन के पटल पर भाषा की शालीनता के माध्यम से अपनी जवाबदेही का एहसास कराने वाले श्री मनोज सिन्हा का व्यक्तित्व राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा के केंद्र में रहा है।भारतीय राजनेताओं को मोटे तौर पर दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है ।एक वह वर्ग जो विरासत को सम्हालते हुए राजनीति के मैदान में अपना दखल और दबदबा रखता है और अपनी राजनीतिक विरासत को आने वाली पीढ़ी को सुपुर्द करने का अभिलाषी है।दूसरा वह वर्ग है जो संघर्ष की कोख से पैदा हुआ है और राष्ट्रीय क्षितिज पर न केवल धूमकेतु की तरह दिखा और ओझल हो गया,बल्कि अपने काम की बदौलत स्वयं को हार जीत से आगे ले जाकर अपनी प्रासंगिकता बनाये हुए है।उसे अपने बच्चों को राजनीति में स्थापित करने की चिंता नहीं रहती।बेदाग छवि उसकी अपनी कमाई है।जनता से उसी की भाषा में सीधा,सहज संवाद स्थापित करना उसका राजनीतिक कौशल है।राजनीति को अपराधियों के चंगुल से मुक्त कराने का जिसका मिशन हो।कथनी और करनी में अंतर वाली राजनीतिक संस्कृति को समाप्त करने पर उसका पूरा जोर रहता हो।सीधे तौर पर कहा जाय कि राजनीति उनके लिए तिजारत नहीं सेवा का माध्यम है।इन खूबियों से युक्त कोई और नहीं वह मनोज सिन्हा ही हैं जिन्होंने अपने राजनीति की शुरुआत छात्र जीवन से की। उनके शिक्षक पिता पुत्र के राजनीति में प्रवेश से प्रसन्न नहीं थे परन्तु नियति को कौन जानता है? छात्र संघ का पहला चुनाव हारने के बाद वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के बैनर तले वर्ष 1982 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के छात्र संघ अध्यक्ष चुने गए और यही उनके राजनीति में उतरने का प्रस्थान विंदु बना।यद्यपि आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी ने वर्ष 1996 के लोकसभा चुनाव में श्री मनोज सिन्हा को गाजीपुर से प्रत्यासी के रूप में मैदान में उतारा और वे जीत दर्ज कर पहली बार सांसद बने।1999 में दुबारा गाजीपुर लोकसभा के लिए चुने गए और अपनी विकास निधि का जनहित के लिए भरपूर प्रयोग करने के अलावा तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी के संरक्षकत्व में राजनीति की अन्य बारीकियों के साथ दलगत सीमा से परे स्वीकार्यता का गुण सीखा।2004 का चुनाव भाजपा और श्री मनोज सिन्हा के लिए अनुकूल परिणाम नहीं दिया लिहाजा पार्टी सत्ता से बाहर हो गई।सत्ता का वनवास झेल रही भारतीय जनता पार्टी ने एक दशक बाद वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जोरदार वापसी की और मनोज जी भी गाजीपुर से चुनाव जीतकर मंत्रिमंडल में जगह बनाने में कामयाब हुए।उन्होंने भारत सरकार के संचार राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार और रेल राज्यमंत्री के रूप में पद और गोपनीयता की शपथ लेकर विभिन्न परियोजनाओं के माध्यम से राष्ट्रीय फलक पर काम करते हुए समूचे पूर्वांचल की तस्वीर बदलने का विशेष प्रयास आरम्भ किया जिसका परिणाम जल्द ही सतह पर दिखने लगा।फलतः मनोज सिन्हा एक जननेता और विकास पुरूष के रूप में लोगों के दिलोदिमाग पर छा गए। उनके काम को देखकर धुर राजनीतिक विरोधी भी भले ही उनकी आलोचना करते हों लेकिन उनके कामों की अनदेखी नहीं कर सकते। सबका साथ सबका विकास की थीम पर काम करते हुए जिस तरह से श्री सिन्हा ने भारत सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं को ईमानदारी से जमीन पर उतारने का प्रयास किया उससे वर्ष 2019 में गाजीपुर से मिली चुनावी असफलता के बावजूद केंद्रीय नेतृत्व का विश्वास और भरोसा बरकरार रखने में वे कामयाब रहे।उपराज्यपाल के रूप में प्रशासनिक अनुभव वाले व्यक्ति का स्थानापन्न एक सुलझे राजनीतिक अनुभव वाले व्यक्ति को बनाना यह संकेत देता है कि घाटी में सामाजिक ,सांस्कृतिक और लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना की दिशा में केंद्रीय नेतृत्व बेहद गम्भीर है।अपनी कार्यशैली से श्री मनोज सिन्हा ने हमेशा अपनी उपयोगिता साबित की है और विषम परिस्थितियों में भी यह सिद्ध किया है कि चुनौतियों से निपटना उन्हें भलीभांति आता है।जब जब उनके जीवन में ठहराव की स्थिति बनी और राजनीतिक पंडितों ने उनके पारी को समाप्त माना तब तब उन्होंने सारे अनुमान को झुठलाते हुए न केवल जोरदार वापसी की बल्कि आशातीत परिणाम भी दिए।उनको नजदीक से जानने वाले मानते हैं कि वे हार मानने वाले व्यक्ति नहीं हैं।स्वाभाविक रूप से राजनीति में नई जिम्मेदारी अपने साथ नई चुनौतियां भी लेकर आती है।धारा 370 समाप्त हुए एक वर्ष का समय बीत गया है तथा समरसता का वातावरण निर्मित करने के लिए इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत के सिद्धांत को अमलीजामा पहनाने का श्री सिन्हा के पास सुनहरा अवसर है।घाटी में अमन चैन स्थापित करना श्री सिन्हा के लिए शीर्ष प्राथमिकता होगी।इस उद्देश्य की प्राप्ति लोकतांत्रिक तरीके से ही सम्भव है।अलगाववादियों के मंसूबे को नाकाम करते हुए लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बहाली में उनका लंबा राजनीतिक अनुभव सहायक सिद्ध होगा।केशर की क्यारी कहा जाने वाला कश्मीर बम ,बंदूक और ख़ून ख़राबा से मुक्त होगा।लम्बे समय से भययुक्त वातावरण में अभिशप्त जीवन जी रहे कश्मीरी नागरिकों को भयमुक्त कराने का जिम्मा श्री मनोज सिन्हा का होगा जिनके सरपरस्ती में कश्मीरी नागरिक अपनी लोकतांत्रिक शक्तियों का प्रयोग करते हुए अपने सपनों में रंग भर सकेंगे।उम्मीद यही है कि राजनीतिक स्वार्थ के कारण दोजख हो चुकी आम कश्मीरी की जिंदगी नए बगवां के हाथों में पुनः जन्नत बनेगी।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
असिस्टेन्ट प्रोफेसर, अंग्रेजी
श्री म.रा. दा. पी.जी.कॉलेज, भुड़कुड़ा,गाजीपुर

डॉक्टर साहब धन्य है आपकी लेखनी आपने एक प्रखर साहित्यकार की भांति अपने इस आलेख में माननीय मनोज सिन्हा जी के संपूर्ण जीवन चरित्र की ओजस्विता को अत्यंत सारगर्भित रूप में प्रस्तुत कर दिया है निसंदेह श्री सिन्हा जी जैसे दक्ष एवं कुशल नेतृत्व के मार्गदर्शन में कश्मीर के कंटकाकींर्ण मार्ग को शीघ्रातिशीघ्र निशकंटक स्वरूप प्रदान कर दिया जाएगा। क्योंकि मोदी जी के मन में उत्पन्न हुए( मनोज का शाब्दिक अर्थ) इस संकल्प को मूर्त रूप प्रदान करने का अति महत्वपूर्ण दायित्व श्री मनोज सिन्हा जी को देना नितांत ही समीचीन है। इसे मात्र संयोग ही नहीं कहा जा सकता इधर बहुप्रतीक्षित मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी और उधर श्री मनोज सिन्हा जी का कश्यप ऋषि के आश्रम अर्थात कश्मीर की ओर प्रस्थान प्रस्थान गोस्वामी जी की इसी पंक्ति की ओर संकेत करता है 'हनुमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम-राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम'
ReplyDeleteएक सारगर्भित परिचय उस व्यक्तित्व का जिसने ग़ाज़ीपुर के विकास का श्रीगणेश ही नहीं किया अपितु विकास का पर्याय बनाया।साधुवाद आपको जो आपने एक कर्मठ व्यक्ति पहचान और योगदान को अपनी सक्षम लेखनी का विषय बनाया।
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