पूरी दुनिया कोरोना महामारी से त्राहि त्राहि कर रही है।भारत भी इस संकट से जूझ रहा है।सम्पूर्ण देश में लॉक डाउन है।कुछ लोग भययुक्त वातावरण में घरों में कैद हैं।तो वहीं अपने पसीने की बदौलत स्वयं भूखे रहकर औरों की भूख मिटाने वाले बेबस और बेघर लोग मारे मारे फिर रहे हैं।सपनों की तलाश में गांव से शहर आये इन लोगों को इस महामारी के कारण उपजी सामाजिक असुरक्षा की भावनाअपने गांव जाने हेतु प्रेरित कर रही है जिसके फलस्वरूप ये हत भाग्य नागरिक बन्धु राजनीतिक लोगों के छल का शिकार भी हो रहे हैं।अचानक बस स्टैंड या रेलवे स्टेशन पर जमा भीड़ इस बात का उदाहरण है।इनमें से कुछ राशन की दुकान पर तो कोई बैंक में लाइन लगाए खड़ा है।जनजीवन की सुरक्षा, उदरपूर्ति और बहाली सरकार के लिए चुनौती बनी है।जब कभी मजदूर यूनियन के आवाहन पर या विभिन्न संगठनों के आवाहन पर हड़ताल हुआ करती है तो होने वाले नुकसान का आंकलन किया जाता है तथा हड़ताल वापस कराने का प्रयास भी होता है।लॉक डाउन अपने नागरिकों को सुरक्षित रखने की दृष्टि से सरकार द्वारा समय पर उठाया गया अभूतपूर्व कदम है लेकिन इस लॉक डाउन के दौरान ही हमें इससे होने वाले नुकसान से उबरने के बारे में और इसके खिलाफ कारगर लड़ाई लड़ने की दिशा में गम्भीरता पूर्वक सोचना चाहिए तथा भविष्य का खाका भी तैयार करना होगा।हमें ही नहीं पूरे विश्व को अपनी भौगोलिक सीमाओं का विस्तार करने,भोग बिलास की वस्तुओं का अविष्कार करने ,सामूहिक नरसंहार के हथियार बनाने,खरीदने,बेंचने और शस्त्र निरस्त्रीकरण सन्धि से आगे जाकर विश्व ग्राम की अवधारणा के प्रकाश में मानवता के बारे में सोचने की जरूरत है।संयोग से देश दत्तोपंत ठेंगड़ी जैसे महान विचारक का जन्म-शताब्दी वर्ष भी मना रहा है।उनका चिंतन अमल में लाने की आवश्यकता है।अगर देश की सरकार इस बात का स्मरण रखते हुए नीतियों का निर्धारण करेगी कि 'जीविका के लिए जीवन रेहन न रखना पड़े,रोटी इंसान को न खाए 'तब जाकर हम कोरोना के दूरगामी कुप्रभाव से मुक्ति पाएंगे।देश के संसाधन मनुष्य की आवश्यकता पूर्ति के लिए हैं उसके लोभ की पूर्ति या आधिपत्य के लिए नहीं।समय कठिन और चुनौतीपूर्ण जरूर है लेकिन ठेंगड़ी जी के उपरोक्त कथन के केंद्र में जो वर्ग है उसका विशेष ध्यान सरकार को रखना होगा।यही वह वर्ग है जो देश को हमेशा सम्हालता है,आज भी सम्हाले है और आगे भी सम्हालने की कूबत रखता है।हमें बाजारवाद की अवधारणा ने स्वार्थी तरीके से इनके श्रम की शक्ति का बाजार हित मे प्रयोग करना सिखाया जिसके परिणाम स्वरूप इनकीआत्म निर्भरता समाप्त हुई और असन्तुलन बढ़ता गया।आज अवसर है कृतज्ञ भाव से इनको शोषण मुक्त कर इनका सहयोग किया जाय।इनके परिश्रम का सही मोल चुकाया जाय।आज यही वह वर्ग है जो सिर्फअपनी उदरपूर्ति की चिंता में नहीं डूबा है।वह महामारी की भयावहता से अनजान नहीं है लेकिन उसे इस बात की परवाह है कि येन केन प्रकारेण उसका भी पेट पर्दा चलता रहे और लोगों तक सब्जी अनाज दूध पहुंचता रहे।वह मास्क, सेनेटाइजर, और सोशल डिस्टेंसिग की बहसों में नहीं उलझा है और न ही वह पत्थरबाजी या कोरोना कैरियर बनने में मशरूफ है।उसे तकरीरों और जलसों से भी कुछ लेना देना नहीं है।उसे सम्पूर्ण जीवजगत की चिंता है लेकिन सूबे की सरकारें उन्हें प्रवासी मजदूर से ज्यादा नहीं देख या समझ पा रहीं।सरकार और समाज का यह दायित्व बनता है कि संकट काल मे ग्रामीण भारत और प्रवासी मजदूर की संज्ञा धारण करने वालों की विशेष चिंता करें जो ठोकरें खाकर,अपनी वास्तविक पहचान खो कर और अपमान का घूंट पीकर भी सड़क,पुल, भवन निर्माण में सतत संलग्न रहने वाले हैं और सदा उत्पाद- उपभोक्ता के बीच की कड़ी बनकर देश के लिए श्रेष्ठ योगदान दिया है।उनके प्रति संवेदनशील बने रहना लॉक डाउन के बाद की समस्या का समाधान बनेगा।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
पी.जी.कालेज,भुड़कुड़ा, गाजीपुर

एक व्यापक दृष्टिकोण का होना सरकार का मौलिक धर्म है।आपका सुझाव अत्यन्त सार्थक और उपयोगी है।
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