आज श्रीरामचरितमानस के रचयिता भक्त कवि तुलसीदास की जन्मजयंती है। तुलसी बाबा ने समाज को व्यावहारिक व्याकरण सिखाने के साथ ही लोकभाषा में भक्ति को खेतों खलिहानों तक पहुंचाया। वे कहते हैं कि "सुरसरि सम सबकर हित होई"।राजनीतिक स्वार्थ प्रेरित आलोचना से इस ग्रन्थ और इसके रचयिता पर कोई फर्क नहीं पड़ता। यह भारत का संविधान नहीं है कि इसके कुछ अंश को बहुमत के आधार पर संशोधित कर दिया जाएगा अथवा नया जोड़ दिया जाएगा। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के हिमायती कुपढों को भी तुलसी बाबा की अभिव्यक्ति को समझना चाहिए । यह एक ऐसा ग्रन्थ है जिसे भारत ही नहीं अपितु भारत के बाहर भी भारतवंशियों द्वारा श्रद्धा पूर्वक सहेज कर रखा गया।इस ग्रंथ के माध्यम से जिस रामराज्य की कल्पना की गई है वह निराधार नहीं है। उसके लिए उन्होने मानक तय किए हैं। जिसप्रकार से आज हम चर्चा करते हैं कि अच्छा शासन वहां है जहां कानून का राज हो, मृत्यु दर कम हो भुखमरी कुपोषण न हो, पर्यावरण ठीक हो आदि आदि। अगर हम गहनता से देखें तो "चलहीं स्वधर्म निरत श्रुत नीति " कह कर तुलसी बाबा कानून के राज की बात कहते हैं, "सब नर करहीं परस्पर प्रीति "के द्वारा समरस समाज की बात कहते हैं , "नहीं दरिद्र कोऊ दुखी न दीना "के माध्यम से भुखमरी कुपोषण रहित समाज की कल्पना की गई है, "अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा " स्वास्थ्य एवम् मृत्यु दर सूचकांक को प्रदर्शित करता है,फुलहीं फलहीं सदा तरु कानन पर्यावरण की स्थिति का संकेत कर रहा है। मानस में वर्णित "सब मम प्रिय सब मम उपजाए "के बाद भी अगर किसी को कवि की नीयत में खोट नजर आता है तो इससे तुलसी बाबा की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता।वास्तव में तुलसी बाबा का विरोध करने वाले राम विरोधी हैं, सनातन विरोधी हैं इसलिए उन्हे रामचरितमानस में खामी दिखाई दे रही है। यह ध्रुव सत्य है कि नज़रिया गलत होगा तो नजारा भी गलत ही दिखाई देगा।
डॉ संतोष कुमार मिश्र
असिस्टेंट प्रोफ़ेसर अंग्रेजी
पी जी कालेज भुड़कुड़ा गाजीपुर
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