आज हिंदी दिवस है और इसे मनाने की परिपाटी देश में 14 सितम्बर 1953 से शुरू हुई ।हिंदी के हिमायती सभा संगोष्ठियों के माध्यम से इस दिन हिंदी का गुणानुवाद करते हुए इसे वैश्विक स्तर पर स्थापित करने की चर्चा करते हैं। पिछली बार के हिंदी दिवस से इस बार का आयोजन भिन्न होगा क्योंकि इस बार सबकुछ आभासी पटल पर होगा।वैश्विक महामारी कोरोना के कारण स्कूल,कॉलेज, रेल सब बंद हैं।कवि सम्मेलनों और संगोष्ठियों में लोगों का इस बार इकट्ठा होकर हिंदी के प्रति प्रेम और समर्थन प्रदर्शित करना सम्भव नहीं है।हिंदी के प्रसार के लिए कुछ न कुछ प्रयास निरन्तर चल रहा है लेकिन यह पर्याप्त नहीं है।इतना सब कुछ होने के बाद भी हिंदी को लेकर गम्भीर प्रयास और ठोस नीतियों की आवश्यकता है।हम आजादी के पचहत्तर साल मनाने की ओर अग्रसर हैं लेकिन राष्ट्र भाषा हिंदी को वह सम्मान नहीं दे पाए जिसकी वह अधिकारिणी है।तकनीक के प्रयोग ने हिंदी को विश्वव्यापी बनाने में अप्रतिम योगदान दिया है।इन दिनों ई पत्रिकाओं का प्रकाशन हो रहा है,वेबिनार का आयोजन हो रहा है ,फेसबुक और व्हाट्सएप द्वारा हिंदी में अभिव्यक्ति हो रही है तथा संचार माध्यमों के बल पर व्याख्यान का सजीव प्रसारण भी हो रहा है।हिंदी का प्रयोग निःसन्देह बढ़ा है लेकिन भाषा के स्तर में अत्यधिक गिरावट आई है। भाषा के प्रयोग से उसका प्रवाह बना रहता है लेकिन भाषा के मर्म को समझना अत्यंत आवश्यक है।किसी भी भाषा को पहचान और प्रतिष्ठा उस भाषा मे रचे गए साहित्य से प्राप्त होती है।हिंदी की साहित्य सम्पदा विशाल है और अभिव्यक्ति की सामर्थ अद्वितीय है।इसी कारण हिंदी ने विदेशी विद्वानों को अपनी ओर आकृष्ट किया।बेल्जियम के फादर कामिल बुल्के यहां आने के बाद हिंदी और हिंदुस्तान के हो कर रह गए।उन्होंने हिंदी के लिए जो कार्य किया वह मील का पत्थर साबित हुआ।वे 'राम कथा उतपत्ति और विकास' का चार भागों और इक्कीस अध्याय में सृजन कर अमरत्व को प्राप्त किये।भारत का हिंदी में विरचित सन्त साहित्य सदैव विदेशियों के आकर्षण का केंद्र रहा है।सुर, कबीर ,तुलसी ,मीरा ,जायसी, रसखान,रविदास, नानक, मलूक ,दादू फरीद सहित अनेक सगुण और निर्गुण धारा के कवियों ने हिंदी को ऊंचाई दी और ज्ञान भक्ति प्रेम का संदेश दिया ।आजमगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार और हिंदी सेवी श्री जगदीश प्रसाद बरनवाल ने विदेशी विद्वानों का हिंदी प्रेम शीर्षक से पुस्तक लिखी है जिसमें उन्होंने उनके अवदान को रेखांकित किया है।वर्ष 2008 में एक जर्मन युवक तिल लुगे ने शुभा मुद्गल द्वारा प्रस्तुत भजन से रीझ कर हिंदी में शोध की ठानी।अपने शोध के सिलसिले में वह गाजीपुर स्थित निर्गुनिया सन्तों की तपस्थली भुड़कुड़ा आ पहुंचा।वह युवक निर्गुनियां सन्त बूला, गुलाल और भीखा से बेहद प्रभावित था।कारण यह कि सन्त कवियों ने सही और खरी बातों को निर्भीकता के साथ समाज के सामने समय समय पर रखा है।उन्होंने बिगाड़ के डर से सत्य कहने से परहेज नहीं किया। जो लोग आज अपने को हिंदी सेवी कहते हैं उन्हें इस बात का अवश्य स्मरण रखना चाहिए कि निज भाषा के समर्थन में बोलने से अन्य भाषाभाषियों के प्रति विद्वेष ध्वनित न हो।देश के भीतर और बाहर गैर हिंदी भाषी क्षेत्र के लोगों संग आत्मीयता ,उनके साहित्य का हिंदी में रूपांतरण ,हिंदी में रचे गए साहित्य का उनकी भाषा में रूपांतरण एक दूसरे को नजदीक ले आएगा और आत्मीयता बढ़ेगी।इससे भाषाई समझ विकसित होने के साथ राष्ट्र भाषा के विकास में सहायता मिलेगी।हिंदी के बढ़ते प्रभाव का ही परिणाम है कि धोती,कुर्ता,पायजामा जैसे बहुत से शब्द अंग्रेजी भाषा में शामिल कर लिए गए हैं और स्टेशन, बैंक, प्लेटफॉर्म जैसे अंग्रेजी भाषा के शब्दों का हिन्दीकरण हो गया है।अगर हिन्दी भाषियों के व्यवहार में अन्य भाषाभाषियों के प्रति दुराग्रह,घृणा,विद्वेष का भाव ध्वनित होगा तो इससे हिंदी की स्वीकार्यता को नुकसान होगा।एक तरफ हिंदी को वैश्विक मंच पर समृद्ध साहित्यिक विरासत के आधार पर स्थापित करने की वकालत हो रही है तो वहीं अपने ही देश में हिन्दी मानस को दो धड़ों में बांट कर एक दूसरे के खिलाफ खड़ा कर लड़ाने का प्रयास भी खूब चल रहा है।मानवीय मूल्यों से युक्त सर्वकालिक श्रेष्ठ साहित्य को आलोचना और प्रगतिशीलता के नाम पर कुंठा की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया जा रहा है।वर्तमान में सगुण साहित्य और साहित्यकारों पर दलित विरोधी,स्त्री विरोधी,साम्प्रदायिक होने का आरोप लगाकर निर्गुण साहित्य और साहित्यकारों को ढाल या मुखौटा के रूप में स्वार्थी तत्वों द्वारा अपने समर्थन में प्रयोग किया जा रहा है।कबीर ने रूढ़ियों के खिलाफ आवाज बुलंद की उसमें क्या हिन्दू और क्या मुसलमान,सब बराबर हैं उनकी दृष्टि में।लेकिन कबीर का नाम लेकर सगुण सन्त साहित्य की आलोचना करने वाले रूढ़ियों के खिलाफ न बोलकर आस्था पर प्रहार करते दिखते हैं।जिस ग्रन्थ में 'परहित सरिस धरम नहिं भाई' का स्वर सुनाई देता हो उसे कैसे लांछित किया जा सकता है?अगर हम स्वार्थ और संकीर्णता से बाहर निकलकर सोचेंगे तो हिंदी का विकास तय है।अन्यथा प्राचीन साहित्यिक विरासत को नए लेखकों और आलोचकों द्वारा अमान्य घोषित करना हिंदी के प्रसार में बाधक बनेगा।यह तर्क बेबुनियाद है कि स्त्री स्त्री के बारे ,में दलित दलित के बारे में, हिंदी पढ़ने पढ़ाने बोलने वाला हिंदी के बारे में सटीक अभिव्यक्ति कर सकता है।ऐसी सोच रखने वाले लेखक हिंदी के साथ छल कर रहे हैं।अगर साहित्य मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति है तो इसके लिए स्त्री ,पुरुष ,दलित ,गैर दलित, हिंदी बोलने समझने वाला ,गैर हिन्दी भाषी की जगह मनुष्य होना पर्याप्त है।मुंशी प्रेमचंद का कायस्थ होना दलित सम्वेदनाओं की अभिव्यक्ति में कैसे बाधक हो सकता है भला?उनका कथा साहित्य उनकी गहन अंतर्दृष्टि और संवेदना का जीवंत उदाहरण है ।आधुनिक युग मे हरिवंशराय बच्चन और रघुवीर सहाय का नामोल्लेख करना समीचीन होगा।उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी का अध्यापन किया और हिदी की सेवा किये।डॉ. रामविलास शर्मा अंग्रेजी से एम. ए. थे और हिंदी साहित्य का सबसे प्रामाणिक इतिहास उन्होंने लिखा।अज्ञेय एक प्रगतिशील कवि और लेखक के रूप जाने जाते हैं लेकिन उन्होंने अंग्रेजी विषय मे परास्नातक की उपाधि प्राप्त की थी।उन्होंने पत्रकारिता,सम्पादन और लेखन हिंदी में किया।हिंदी को सिर्फ हिंदी पट्टी या हिंदी बोलने वालों तक सीमित करके देखना इसके विकास में बाधक तो है ही इसके साथ अन्याय भी होगा।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
असिस्टेन्ट प्रोफेसर,अंग्रेजी
श्री म. रा. दा. पी.जी.कालेज भुड़कुड़ा, गाजीपुर।

No comments:
Post a Comment