Saturday, 3 October 2020

का बतलाईं कहै सुनै में सरम लगत हौ गांधी जी ...



(गांधी जयंती के विशेष संदर्भ में)जन्मजयंती के अवसर पर महात्मा गांधी का केवल स्मरण पर्याप्त नहीं है।आज गांधी को उसी तरह से जीने की जरूरत है जैसे उनको आज ही के दिन पैदा हुए पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने जिया।अगर हम सचमुच गांधी से प्रेम करते हैं तो उनके बताए मार्ग पर चलने की आवश्यकता है अर्थात सरल जीवन जीने की कठिन साधना करना होगा।गांधी के सिद्धांतों की दुहाई देते हुए उसके ठीक विपरीत व्यवहार करना और निजी स्वार्थ के लिए जानबूझकर उसकी गलत व्याख्या प्रस्तुत करना समाज को छलना है।गांधी ने प्राचीन धर्मग्रन्थों का गहनता से अध्ययन किया था।श्रीमद्भगवद्गीता उनकी प्रिय पुस्तक थी जिसका वे नियमित वाचन करते थे तथा निष्काम कर्मयोग के सिद्धांत को जीवन में आत्मसात कर लिया था।उन्होंने जीवनपर्यन्त अपनी संस्कृति को जानने की कोशिश की,त्याग के महात्म को समझा और उसे जिया।सेवा का वरण किया समीकरण बैठाने में अपनी ऊर्जा का उपयोग नहीं किया बल्कि सत्य का प्रयोग किया।इसके बाद भी अगर गांधी में कोई दोष ढूंढता है तो यही कहा जायेगा कि उसके पास ज्ञानचक्षु का अभाव है।सनातन धर्म में जो चीज गलत समझ में आयी उसके परिष्करण के लिए प्रयास किया लेकिन धर्मांतरण नहीं किया।सनातन धर्म की मर्यादा का अनुपालन करते हुए गांधी अन्य धर्मावलम्बियों को सहज स्वीकार थे तथा अन्य धर्मावलम्बी  गांधी को।देश को आजाद कराने के साथ वे समाज मे व्याप्त बुराइयों को समाप्त कर स्वस्थ समाज गढ़ने के लिए प्रयासरत रहे।विस्तीर्ण चिंतन के कारण वर्णाश्रम व्यवस्था में व्याप्त दोषों का निवारण उनका लक्ष्य था मगर वे वर्णाश्रम व्यवस्था को ही समाप्त कर देना नहीं चाहते थे।दुनियां में कोई भी व्यवस्था दोषरहित नहीं है।कुछ न कुछ कमियां होती हैं।उन कमियों को चिन्हित करके दूर करने की कोशिश करना चाहिए।उन्होंने आजादी दिलाने के अलावा जीवनभर भारतीय समाज की उन कमियों को चिन्हित करने और दूर करने का काम भी किया जो भारतीय समाज के माथे का कलंक थीं।जाति विहीन समाज की बात करने वाले गांधी का नाम तो जपते हैं लेकिन प्राचीन धर्मग्रंथों का विरोध करते हैं,संस्कृत भाषा का विरोध करते हैं,शास्त्रीय परम्पराओं का विरोध करते हैं और जातीय अस्मिता के आधार पर अपनी गोलबंदी भी जारी रखते हैं।समाज के ऐसे स्वार्थी तत्वों द्वारा लोक की बात करते हुए वेद का विरोध करना पाखंड नहीं है तो और क्या है।गांधी ने पाखंड का विरोध किया स्वस्थ परम्परा का नहीं।उन्होंने जाति आधारित भेदभाव मिटाने का यत्न किया जाति व्यवस्था समाप्त करना उनका लक्ष्य नहीं था। वे लोक और वेद को साथ साथ लेकर चलते थे क्योंकि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।गांधी के अनुसार 'अस्पृश्यता की बुराई से खीझकर वर्ण-व्यवस्था का ही नाश करना उतना ही गलत होगा ,जितना कि शरीर में कोई कुरूप-वृद्धि हो जाय तो शरीर का या फसल में ज्यादा घास-पात उगा हुआ दिखे तो फसल का ही नाश कर डालना।इसलिए अस्पृश्यता का नाश तो जरूर करना है।सम्पूर्ण जाति(वर्ण)व्यवस्था को बचाना हो तो समाज में बढ़ी हुई इस हानिकारक बुराई को दूर करना ही होगा....ज्यों ही अस्पृश्यता नष्ट होगी,जाति व्यवस्था स्वयं शुद्ध हो जाएगी,..।'  उनको पारम्परिक तरीके के गांव प्रिय थे जो आत्मनिर्भर , स्वावलम्बी और स्वायत्तशासी हों।आज कोरोना की चपेट में आने पर गांवों ने ही देश को सम्हाला है।गांव की शक्ति का ,सामाजिक तानेबाने का बोध गांधी को बखूबी था।कुछ लोग उस समय भी गांव के स्वरूप को ठीक नहीं समझते थे क्योंकि एकांगी दृष्टि के कारण उन्हें गांव का सहकार और सौंदर्य नहीं दिखता था।उनका जोर शहरीकरण ,औद्योगिकरण पर था।उनका मानना था कि गांव समाप्त होंगे तो जाति अपने आप  समाप्त हो जाएगी।लेकिन अंधाधुंध शहरीकरण ने सहकार को समाप्त करके जीवन को अभिशप्त बना दिया यह भी किसी से छिपा नहीं है।शहरी जीवन में असमानता, भेदभाव भी खूब बढ़ा है।केवल जातिविहीन समाज बनाने के उद्देश्य से शहरीकरण की ओर उन्मुख होने वाला चिंतन सदैव अप्रासंगिक था।इस देश के लिए गांधी का मार्ग अपरिहार्य है।सामाजिक समरसता के लिए गांधी को अमल में लाने की आवश्यकता है।उनके अनुसार ,'इतिहास की दृष्टि से जाति प्रथा को भारतीय समाज की प्रयोगशाला में किया गया मनुष्य का ऐसा प्रयोग कहा जा सकता है,जिसका उद्देश्य समाज के विविध वर्गों का पारस्परिक अनुकूलन और संयोजन था।' जाति मिटाने की बात करने वाले  इस देश में जातियों के सम्मेलन करने लगे,संविधान में जातिगत आरक्षण का उल्लेख कहीं भी न होने के बावजूद जातिगत आरक्षण राजनीतिक स्वार्थ में बंटना शुरू हो गया और इसका नामकरण सामाजिक न्याय कर दिया गया।अपनी अपनी जाति के मतदाताओं को सहेजने का काम करने वाले सामाजिक न्याय के योद्धा हो गए।देश पीछे छूट गया।कैलाश गौतम के शब्दों में 'का बतलाईं कहै सुनै में सरम लगत हव गांधी जी/तोहरे घर क रामै मालिक सबै कहत हौ गांधी जी।' हत्या, बलात्कार, अपहरण, लूट,आगजनी, हिंसा जैसे अमानवीय कृत्य आएदिन हो रहे हैं।हाल में ही हाथरस की घटना ने समूचे देश को शर्मसार कर  दिया है।इस कठिन घड़ी में गांधी का याद आना स्वाभाविक है।मजे की बात यह भी है कि गांधी पर सबका दावा है,गांधी भी सबके हैं लेकिन गांधी का कोई नहीं ।प्रकृति के साथ जीवन जीना ही गांधी को जीना है तथा विकृति के साथ जीना मानवता के विरुद्ध जीना है,गांधी के विरुद्ध जाना है।गांधी मानवता के पुजारी थे। गांधी के जन्मदिन पर प्रकृति के साथ जीने का संकल्प कोरोना ही नहीं अन्य आपदाओं से लड़ने की शक्ति देगा तथा उनके विचारों की शक्ति बढ़ते वैमनस्य,हिंसा ,घृणा को दूर करेगी।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
असिस्टेन्ट प्रोफेसर, अंग्रेजी
श्री म. रा. दा.पी.जी.कालेज,भुड़कुड़ा,गाजीपुर

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