देश के प्रधानमंत्री भले ही यू.पी .से चुने गये हैं लेकिन मूलतः गुजरात उनका गृह प्रदेश है .गुजरात का चुनावी मुकाबला धीरे धीरे रंग पकड़ रहा है .इसके परिणाम देश की राजनीति के लिये काफी मायने रखते हैं. एक तरफ़ विपक्ष पूरा दम लगा रहा है तो वहीं सत्ता पक्ष के लिये यह बेहद अहम चुनाव हो गया है .भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी गुजरात से आते हैं .सत्ताधारी दल गुजरात की अस्मिता को ढाल बनाने की कोशिश में है तो राहुल गाँधी बदले तेवर और सधे अंदाज़ में हमलावर हैं .कोई भी पार्टी वोटरों की गोलबंदी का मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहती है .विकास का एजेंडा सेट करते करते अब बहस इस बात पर हो रही है कि असली हिन्दू कौन लोकतंत्र के लिये यह हास्यास्पद और चिंताजनक है .असल मुद्दों से भटक कर चुनाव धार्मिक आधार पर लड़ने की कोशिश हो रही है .कोई जनेऊ दिखा रहा है तो कोई सात पुश्त का हवाला दे रहा है .क्या इससे सूबे का भला होगा ?अगर नहीं तो इस तरह की राजनीति के मायने क्या हैं ?
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