देश ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ से इसे न तो युध्द में झोंका जा सकता है न ही युध्द का न्यौता स्वीकार करना उचित होगा .सवाल यह है कि फ़िर किया क्या जाय ?समाधान स्थायी हो और नुकसान न्यूनतम हो इस फार्मूले पर कम करना होगा . शरीफ़ साहब अगर आतंकवाद से पीडित पाकिस्तान और पडोसी भारत के प्रति फिक्रमंद हैं तो अपनी ज़मीन पर फंडिंग बँद करना होगा नही तो यह समझा जयेगा कि यह प्रायोजित है .दोनो देश अपने आंतरिक सिस्टम को जब दुरुस्त कर लेंगे तो बिना लड़ाई के समस्या हल हो जयेगी .अन्यथा पाक सरकार प्रायोजक की भूमिका में समझी जयेगी भारत की सरकार को भी देश विरोधी ताकतों के आर्थिक उपक्रम पर प्रहार करना होगा .आतंकवाद को दी जाने वाली आर्थिक मदद को रोककर दोनो देश ही नहीं विश्व इस समस्या से बच सकता है .जोश में आकर देश और दुनियाँ को युध्द के हवाले करना कहीं से उचित नही होगा .शाल भेंट करना साथ साथ जन्मदिन में शरीक होना तभी सार्थक है जब दिल से तुला जाय .दोनो देश के लोग अमन पसंद हैं इसमे कोई शक नही लेकिन वक़्त आ गया है सरकारों को यह समझ आये .
No comments:
Post a Comment