हमारे देश मे राजनीतिक बिरादरी दो काम बड़ी खूबसूरती के साथ करती है।पहले राष्ट्रीय महत्व के किसी व्यक्ति को विवादास्पद बनाना और फिर लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से समय समय पर उसको हवा देते रहना।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सर संघ चालक माधव राव सदाशिव गोलवलकर के व्यक्तित्व को भी इसका शिकार बनाने का असफल प्रयास होता रहा है।राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या का आरोप गोडसे के ऊपर लगा लेकिन हत्या के षड़यंत्र कर्ता के रूप में 1फरवरी 1948 की आधी रात को श्री गोलवलकर नागपुर संघ कार्यालय से गिरफ्तार हो गए और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लग गया।किसी भी व्यक्ति या संगठन पर आरोप लगना एक बात है और सप्रमाण आरोप सिद्ध होना दूसरी बात।समय बीता बंटवारे और गांधी जी की हत्या के बाद की उथल पुथल थोड़ा शांत हुई तथा यह सिद्ध हुआ कि गांधी हत्या में संघ की संलिप्तता नहीं थी।निराधार आरोप के चलते गोलवलकर की गिरफ्तारी हुई है।11 जुलाई 1948को संघ के ऊपर से प्रतिबंध हटा ,संघ प्रमुख गोलवलकर जेल से बाहर आये और चीन से युद्ध के बाद 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में स्वयंसेवकों को पूर्ण गणवेष में घोष के साथ शामिल होने का आमंत्रण तत्कालीन प्रधानमंत्री पं.नेहरू द्वारा मिला।धीरे धीरे संघ को अखिलभारतीय स्तर पर सकारात्मक कार्यो के लिए जाना जाने लगा। एक गैर राजनीतिक संगठन के नेतृत्व में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का महा अभियान शुरू हुआ जो आज भी परम् वैभव सम्पन्न राष्ट्र का लक्ष्य लिए अग्रसर है।आज दुनिया में संघ सबसे विशाल संगठन के रूप में स्थापित है।संघ कार्य को अखिलभारतीय स्वरूप प्रदान करने में माधवराव सदाशिव गोलवलकर की महत्वपूर्ण भूमिका रही। लेकिन खटकने वाली बात यह है कि आज दिन भी इस देश में गाँधी हत्या की चर्चा के केंद्र में संघ के तत्कालीन प्रमुख का नाम जबरन घसीटा जाता है।
वास्तव में श्रेष्ठता की कसौटी क्या है इस पर विचार करने से ज्ञात होता है कि मनुष्य की भविष्यकाल पर छाया कितनी लम्बी है(The length of one's shadow on future) उससे उसकी श्रेष्ठता का निर्धारण किया जा सकता है।संघ के वर्तमान स्वरूप और कार्य को देखते हुए श्री गोलवलकर की श्रेष्ठता का मूल्यांकन सहज ही किया जा सकता है।सुप्रसिद्ध साहित्यकार और पत्रकार खुशवंत सिंह ने गोलवलकर उपख़्याय श्री गुरुजी के साथ अपनी मुलाकात के बारे में द इलेस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया में विस्तार से ज़िक्र किया है और माना है कि गुरुजी से मिलकर बहुत सारी शंकाओं का समाधान मिला।इंटरव्यू के बाद जब खुशवंत सिंह जाने की आज्ञा मांगने लगे तो उन्होंने उनके हाथ पकड़ लिए ताकि वे उनके चरण न छूने पाएं।लेख के अंत में खुशवंत सिंह ने लिखा ,क्या मैं उनसे प्रभावित था ?मैं स्वीकार करता हूँ,मैं(उनसे)प्रभावित था।खुशवंत सिंह की टिप्पणी बहुत कुछ कहती है साथ ही नकारात्मकता का प्रसार करने वालों के लिए एक सन्देश भी देती है।
श्री गुरुजी के बारे में दुष्प्रचार का आधार उनके द्वारा1939 में प्रकाशित पुस्तक "We, or Our Nationhood Defined " को भी बनाया जाता है।दरअसल भारतीय राजनीति में भी कुछ प्रचलित कर्मकांड हैं जिसके बिना राजनीतिक कार्यक्रम पूर्ण नहीं हो सकता।किसी भी व्यक्ति या संगठन को सांप्रदायिक घोषित करना भी उसी कर्मकांड का हिस्सा है।एक बार संसद में पूर्व प्रधानमंत्री श्री चन्द्रशेखर इस पुस्तक का उद्धरण देते हुए कह रहे थे कि इस पुस्तक में उल्लेख मिलता है कि-प्योरिटी ऑफ रेस का रास्ता हमको हिटलर ने बताया है भारत के लिए वह रास्ता देखने और समझने योग्य है। माइनारिटी को नागरिकता का अधिकार नहीं होगा,उसमें लिखा है कि वे हमारे देश में केवल एक अतिथि के रूप में हैं जितने दिन बहुमत के लोग चाहे रहें या उन्हें बाहर जाना होगा।इसके जवाब में तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने सदन को अवगत कराया कि उसके(पुस्तक के) लेखक ने ही उससे अपने को असम्बद्ध किया।श्री गुरुजी ने ही कहा कि मैं उससे सहमत नहीं हूं।अगर पुस्तक में लिखी बात को लेखक स्वयं नकार रहा हो तो उस अंश के आधार पर पुस्तक और लेखक को विवादित बनाना कहाँ तक उचित है? 5 जून 1973को श्री गुरुजी ने शरीर त्याग दिया।तैंतीस वर्षों तक अनवरत संघ कार्य करते रहने के पश्चात औरअपनी मृत्यु से पूर्व कुछ बातें कागज पर लिख कर उन्होंने देह त्यागा जो मरणोपरांत सार्वजनिक हुईं।उसमें लिखा था कि इस देश में जहां अपना नाम कैसे बड़ा होगा इसकी होड़ लगी है, मैं जीवमान हूँ इसलिए पद प्रतिष्ठा कैसे प्राप्त हो इसके लिए होड़ लगी रहती है,और मृत्यु के पश्चात कैसे अपने पुतले बिठाए जाएं इसकी होड़ मची है इसलिए मेरा स्मारक मत बनाइयेगा।जहां लोग पद, पैसा,प्रतिष्ठा या लाभ प्राप्ति हेतु प्रवृत्तिगत भाव से कार्य करते हैं वहीं उनका यह अंत समय का उद्गार राष्ट्र के प्रति निवृत्ति भाव से की गई सेवा भावना को दर्शाता है।ऐसे महापुरुष का पुण्य स्मरण उनके प्रति सच्ची कृतज्ञता होगी।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
श्री म. रा.दा.पी.जी.कालेज
भुड़कुड़ा, गाजीपुर।
वास्तव में श्रेष्ठता की कसौटी क्या है इस पर विचार करने से ज्ञात होता है कि मनुष्य की भविष्यकाल पर छाया कितनी लम्बी है(The length of one's shadow on future) उससे उसकी श्रेष्ठता का निर्धारण किया जा सकता है।संघ के वर्तमान स्वरूप और कार्य को देखते हुए श्री गोलवलकर की श्रेष्ठता का मूल्यांकन सहज ही किया जा सकता है।सुप्रसिद्ध साहित्यकार और पत्रकार खुशवंत सिंह ने गोलवलकर उपख़्याय श्री गुरुजी के साथ अपनी मुलाकात के बारे में द इलेस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया में विस्तार से ज़िक्र किया है और माना है कि गुरुजी से मिलकर बहुत सारी शंकाओं का समाधान मिला।इंटरव्यू के बाद जब खुशवंत सिंह जाने की आज्ञा मांगने लगे तो उन्होंने उनके हाथ पकड़ लिए ताकि वे उनके चरण न छूने पाएं।लेख के अंत में खुशवंत सिंह ने लिखा ,क्या मैं उनसे प्रभावित था ?मैं स्वीकार करता हूँ,मैं(उनसे)प्रभावित था।खुशवंत सिंह की टिप्पणी बहुत कुछ कहती है साथ ही नकारात्मकता का प्रसार करने वालों के लिए एक सन्देश भी देती है।
श्री गुरुजी के बारे में दुष्प्रचार का आधार उनके द्वारा1939 में प्रकाशित पुस्तक "We, or Our Nationhood Defined " को भी बनाया जाता है।दरअसल भारतीय राजनीति में भी कुछ प्रचलित कर्मकांड हैं जिसके बिना राजनीतिक कार्यक्रम पूर्ण नहीं हो सकता।किसी भी व्यक्ति या संगठन को सांप्रदायिक घोषित करना भी उसी कर्मकांड का हिस्सा है।एक बार संसद में पूर्व प्रधानमंत्री श्री चन्द्रशेखर इस पुस्तक का उद्धरण देते हुए कह रहे थे कि इस पुस्तक में उल्लेख मिलता है कि-प्योरिटी ऑफ रेस का रास्ता हमको हिटलर ने बताया है भारत के लिए वह रास्ता देखने और समझने योग्य है। माइनारिटी को नागरिकता का अधिकार नहीं होगा,उसमें लिखा है कि वे हमारे देश में केवल एक अतिथि के रूप में हैं जितने दिन बहुमत के लोग चाहे रहें या उन्हें बाहर जाना होगा।इसके जवाब में तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने सदन को अवगत कराया कि उसके(पुस्तक के) लेखक ने ही उससे अपने को असम्बद्ध किया।श्री गुरुजी ने ही कहा कि मैं उससे सहमत नहीं हूं।अगर पुस्तक में लिखी बात को लेखक स्वयं नकार रहा हो तो उस अंश के आधार पर पुस्तक और लेखक को विवादित बनाना कहाँ तक उचित है? 5 जून 1973को श्री गुरुजी ने शरीर त्याग दिया।तैंतीस वर्षों तक अनवरत संघ कार्य करते रहने के पश्चात औरअपनी मृत्यु से पूर्व कुछ बातें कागज पर लिख कर उन्होंने देह त्यागा जो मरणोपरांत सार्वजनिक हुईं।उसमें लिखा था कि इस देश में जहां अपना नाम कैसे बड़ा होगा इसकी होड़ लगी है, मैं जीवमान हूँ इसलिए पद प्रतिष्ठा कैसे प्राप्त हो इसके लिए होड़ लगी रहती है,और मृत्यु के पश्चात कैसे अपने पुतले बिठाए जाएं इसकी होड़ मची है इसलिए मेरा स्मारक मत बनाइयेगा।जहां लोग पद, पैसा,प्रतिष्ठा या लाभ प्राप्ति हेतु प्रवृत्तिगत भाव से कार्य करते हैं वहीं उनका यह अंत समय का उद्गार राष्ट्र के प्रति निवृत्ति भाव से की गई सेवा भावना को दर्शाता है।ऐसे महापुरुष का पुण्य स्मरण उनके प्रति सच्ची कृतज्ञता होगी।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
श्री म. रा.दा.पी.जी.कालेज
भुड़कुड़ा, गाजीपुर।

यथार्थ विश्लेषण है, दरअसल राजनीतिक दलों के बीच 'मूल विचारों' की लड़ाई है। यही कारण है कि जिसके कंधे पर पार्टी का दायित्व होता है वो निशाने पर होता है। गांधी हो या वीर सावरकर, नेहरू हों या कांशीराम सबको लेकर उठे विवादों के बवंडर में मूल बात यही है। दूसरे दलों के विचारों को दूषित बताकर अपनी बात स्थापित करना किसी विचारधारा वाली पार्टी के अस्तित्व की लड़ाई है! जब तक राजनीति रहेगी तब तक लोग इन्हीं खेमे में बंटे रहेंगे। यही सोच उस पार्टी का कैडर बनाती है। फिर भी ऐतिहासिक महापुरुषों के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।
ReplyDeleteजनता अपनी सोच और फायदे के मुताबिक विचारधारा स्वीकार करती है। ये पसंद ना पसंद पब्लिक च्वाइस है। जैसे दो किनारों में बंधकर नदी बहती है वैसे ही राजनीतिक दल इस बहाव को दो किनारों के बीच विचार'धारा'को नियंत्रित करते हैं! बिना किनारे का वो राजनीति पोखर होती है या फिर समुद्र!! ऐसा समर्थक तय कर सकते है।
Very good
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