Friday, 17 April 2020

भूतपूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर के अनुसार जज्बातों को उभार कर देश की समस्याओं का समाधान नहीं किया जा सकता



अपनी बेबाकी के लिए मशहूर,बलिया के बाबूसाहब, अभूतपूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर जी की आज जन्मजयंती है।भारतीय राजनीति के इस पुरोधा को देश कभी भुला न सकेगा।उनके विचारों की रौशनी देश को रास्ता दिखाने की सामर्थ्य रखती है।साधारण परिवार में जन्मे असाधारण व्यक्तित्व के स्वामी चन्द्रशेखर को पक्ष और विपक्ष बड़े गौर से सुनता था और उनकी अहमियत भलीभांति समझता था।आज सार्वजनिक जीवन और संसदीय राजनीति में ऐसे व्यक्तित्व का अभाव खटकने वाला है।वर्तमान समय में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच की तल्खियां जग जाहिर हैं।संसद में खड़े होकर एक बार उन्होंने चेतावनी भरे लहज़े में  कहा था कि हम नहीं जानते कब किससे जनतंत्र में मदद लेनी पड़ जाय।किसी के चरित्र को गिरा देना आसान है,किसी के व्यक्तित्व को तोड़ देना आसान है लेकिन वैसा किरदार गढ़ना बेहद कठिन है।आज के परिवेश में उनकी कही बात को न केवल समझना होगा बल्कि अमल भी करना होगा।आज संकट के दौर में  राजनीतिक नेतृत्व की खामियां गिनाने और खूबियों का बखान करने में समय गंवाने का नहीं।कोरोना जैसी महामारी के खिलाफ प्रभावी लड़ाई लड़ने के लिए सम्पूर्ण देश को एकदूसरे की मदद के लिए आज खड़े रहने की आवश्यकता है।हमें यह समझना होगा कि राजनीति मुद्दों पर आधारित हो । व्यक्तिगत कटुता और प्रतिशोध के लिए उसमें स्थान नहीं होना चाहिए।कई बार हम जिन विचारों से सहमत नहीं होते हैं उनके नेक कार्यों की अवहेलना करते हुए तर्कहीन निंदा करना आरम्भ कर देते हैं।सम्भव है इससे क्षणिक लाभ मिल जाय लेकिन देश का दीर्घकालिक हित इससे नहीं सधेगा।जज्बातों को उभार कर सरकारें बनाई बिगाड़ी जा सकती हैं लेकिन समस्याओं को नहीं सुलझाया जा सकता ।।हमें अच्छे को अच्छा कहने की आदत डालनी होगी और गलत बातों के विरोध का साहस भी समय समय पर प्रदर्शित करना होगा।युवा तुर्क के लिए समाजवाद मुखौटा नहीं था ।चन्द्रशेखर जी समाजवाद की विचारधारा को जीने वाले व्यक्ति थे,धार्मिक ध्रुवीकरण की मुखालफत करते थे,उदारीकरण और स्वदेशी जैसे परस्पर विरोधी पहल पर सरकार से प्रश्न खड़ा करते थे लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेक कार्यो की सराहना से भी नहीं चूकते थे।उन्नीस सौ निन्यानबे में भरे सदन में खड़े होकर उन्होंने मुक्तकंठ से यह स्वीकार किया कि संघ से हमारा जितना भी विरोध हो वह संगठित,निष्ठावान,संकल्प वाले नवयुवकों का एक संगठन है। प्रधानमंत्री के तौर पर हिंदुत्व के बारे में अपने दृष्टिकोण को उन्होंने सार्वजनिक किया था । प्रतिपक्षी सांसद के रूप में उन्होंने सदन में कहा था कि मुझे इस बात का अभिमान है कि मैं हिन्दू हूँ।सच कहा जाय तो चन्द्रशेखर जी संघर्षों की पैदाइश थे।खुद से रास्ता बनाते हुए बढ़ते गए और राजनीति के शीर्ष पर पहुंचे।प्रधानमंत्री रहते हुए कभी भी वे प्रधानमंत्री निवास में सुख सुविधा भोगने के उद्देश्य से नहीं रहे।दिल्ली से दूर भोंडसी आश्रम ही उनका ठिकाना था।देश के प्रधानमंत्री के रूप में उन्हें अल्प अवधि के लिए सेवा का अवसर प्राप्त हुआ लेकिन कई कारणों से यह कार्यकाल काफी महत्वपूर्ण है। इब्राहीम पट्टी से दिल्ली की दूरी तय करना आसान काम नहीं था।जन्मदिन के अवसर पर सादगी पसन्द सच्चे समाजवादी नायक को कोटिशः नमन।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
पी.जी.कालेज,भुड़कुड़ा-गाजीपुर

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