समाज बदल रहा है,देशकाल परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं।एक वायरस ने पूरी दुनियां बदल कर रख दिया।यह बदलाव दीर्घकालिक है।साहित्य भी इस बदलाव से अछूता नहीं है।नित नई चुनौतियों का सामना कर रहे मनुष्य की साहित्यिक अभिरुचि भी बहुत तेजी के साथ बदल रही है।आज पाठक पहले की तुलना में ज्यादा जिज्ञासु है । वह कपोलकल्पित विषयवस्तु की जगह तथ्यपरक सत्य का अभिलाषी है।अतीत काल से ही साहित्य मनोरंजक और लोकरंजक रहा है।संकट काल में समय समय पर साहित्य ने समाज की सेवा की है।कालजयी रचनाओं में लोकमंगल का स्वर फूटा है।लेकिन बाजारवाद से निकले साहित्य का उद्देश्य केवल मन बहलाव करके वाहवाही लूटना और धनार्जन हो गया था।समाज के यथार्थ चित्रण के नाम पर सतही,अगम्भीरऔर मनोरंजक विषयवस्तु कभी साहित्य का दर्जा नहीं प्राप्त कर सकती है।सच्चे साहित्यकार की सम्वेदना आम आदमी की सम्वेदना से बहुत गहरी होती है इसीलिए उसका सरोकार व्यापक और सृजन कालजयी होता है।आज का साहित्य जीवन की समस्याओं पर गहनता से विचार करते हुए उसे हल करने की कोशिश कर रहा है।उसे उन तमाम प्रश्नों से दिलचस्पी है जिनसे समाज या व्यक्ति प्रभावित होते हैं। जो कुछ लिख दिया जाय ,वह सब का सब साहित्य कदापि नहीं है।Literature is the written record of man's spirit,of his thoughts, emotions and aspirations. जिसमें दिल और दिमाग पर असर डालने का गुण हो वही साहित्य है।सच कहा जाय तो जीवन की सचाइयों का दर्पण ही साहित्य है।आधुनिक साहित्य में वस्तुस्थिति चित्रण की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है।रोजीरोटी के लिए रोजमर्रा की जद्दोजहद ,बसने का सपना लिए उजड़ती दुनियां,महामारी के कारण मौत के आंकड़ों पर संचार माध्यमों द्वारा निगाह गड़ाए समाज,और अभावों की मार के बावजूद जीने के लिए संघर्षरत मनुष्य की पीड़ा आजके साहित्यकारों को निश्चित रूप से उद्वेलित करेंगे।कुछ महीनों से भौतिक विकास का पहिया थमा जरूर है लेकिन इसका परिणाम यह है कि प्रकृति राहत की सांस ले रही है।कोरोना काल नए तरह के समाज और साहित्य का प्रसव काल है।इसकी कोख से जन्म लेने वाला साहित्य जाति,धर्म लिंग,क्षेत्र ,भाषा और भौगोलिक सीमा की संकीर्णता से बाहर निकलते आदमी की आदमियत का दस्तावेज़ होगा।रचनाएं चाहे जिस विधा में हों निकट भविष्य में उनका तेवर और कलेवर और भी बदलेगा।प्रत्यक्ष अनुभवों की सीमा को तोड़कर बाहर निकलना वर्तमान परिस्थितियों में साहित्यकार के लिए मुश्किल है लेकिन इस अनुभवजनित पीड़ा की अभिव्यक्ति अस्तव्यस्त जनजीवन को पुनः व्यवस्थित करने और नई उम्मीद के संचार का सामर्थ्य रखती है।हर्ष और विषाद के भावों का लेखनी द्वारा चित्रण साहित्य को संवेदना से जोड़ता है।हर आदमी की मनोवृत्ति और दृष्टिकोण अलग होता है।साहित्यकार की कुशलता इसी में है कि उसकी मनोवृति या दृष्टिकोण के साथ पाठक की सहमति या एकाकार हो जाय।
डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र
श्री म.रा. दा.पी.जी.कालेज
भुड़कुड़ा, गाजीपुर

समकालीन साहित्य की विषय वस्तु, उसका प्रारूप,चुनौती और दृष्टिगत सम्भवनाओं पर आपने सम्यक प्रकाश तो डाला ही है,साथ ही साथ उसके ऐतिहासिक महत्व को समझाकर सीमा विस्तार का श्लाघनीय कार्य किया है।सरल भाषा और सधी शैली आपकी चेरी बन गई है।सुन्दर और श्लाघनीय भी������
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